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विश्वगुरू के रूप में भारत संपादकीय

विश्वगुरू के रूप में भारत-31

इन नास्तिकों की बात तो कहीं तक ठीक थी कि राजनीति और साम्प्रदायिकता को अलग करो, परंतु इनसे दो भूले हुईं-एक तो यह कि ये लोग साम्प्रदायिकता और धार्मिकता को एक ही समझ बैठे-उनमें ये अंतर नहीं कर पाये। इसलिए इन लोगों ने संसार के लिए परमावश्यक धार्मिकता को भी गोली मारने और गाली मारने की नीति अपना ली। इनके अपरिपक्व चिंतन ने समस्या का समाधान न देकर उसे और उलझा दिया है। उन्होंने मजहब को धर्म मानकर, धर्म को अफीम की संज्ञा दे दी। आज कम्युनिस्ट देशों में भी एक पार्टी की तानाशाही है और विश्व के सबसे अधिकजनसंख्या वाले देश चीन में भी लोगों को अपना नेता चुनने का अधिकार नहीं है।

सारा विश्व जब लोकतंत्र की बात कर रहा हो तब चीन में एक पार्टी के इस अधिनायकवाद का होना सचमुच चिंता का विषय है। कहने का अभिप्राय है कि संसार राजनीति को भी लोककल्याणकारी बनाकर उसे भारत की राजनीतिक मान्यताओं और धारणाओं से श्रेष्ठतर बनाने की खोज में निकला था। पर आज उसकी खोज ही उसकी मृत्यु का कारण बनती दिखायी दे रही है। तब यही कहा जाएगा कि संसार की राजनीति भी दिशाहीन है। विश्व की राजनीतिक व्यवस्था में हर व्यक्ति की सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो पायी है, और ना ही प्रत्येक व्यक्ति को अपना सर्वांगीण विकास करने का अवसर उपलब्ध हो पाया है। लोकतंत्र भी ऐसी सुविधाएं देने में असफल रहा है, और यह भी हार-थककर ऐसा कहता हुआ मिलता है कि लोगों की सारी समस्याओं का समाधान कभी भी संभव नहीं है।
भारत में राजनीति और धर्म की एकता
भारत में राजनीति और धर्म की एकता को स्थापित किया गया। मनु महाराज कहते हैं-‘यस्तर्केणानुसन्धते सधर्म वेद नेतर:।।’ अर्थात जो तर्क की सहायता से अन्वेषण करता है-वही धर्म को जानता है उससे अन्य कोई धर्म नहीं है। इसका अभिप्राय है कि राजनीति को तर्कानुसंधानरत रहना चाहिए ऐसे प्रबंध और प्रयास राजनीति को करने चाहिएं कि किसी भी स्थिति-परिस्थिति में तर्कानुसंधान शांत नही होना चाहिए। तर्कानुसंधान के कार्यक्रम में किसी प्रकार का तुष्टिकरण नहीं होना चाहिए और राजनीति को साम्प्रदायिकता के समक्ष झुककर अपने राजधर्म से समझौता नहीं करना चाहिए। यदि राजनीति किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण के फेर में पड़ गयी या उसने साम्प्रदायिक मान्यताओं को प्रोत्साहित करना आरंभ कर दिया या धर्म को अफीम कहना आरंभ कर दिया तो तर्कानुसंधान का महती कार्य खटाई में पड़ जाएगा। जिससे संसार में अराजकता व्याप्त हो जाएगी क्योंकि तर्क कहीं न कहीं अकुलाएगा और वह संसार की राजनीति की तानाशाही की चादर को फाडक़र बाहर निकलने का प्रयास करेगा। जिससे विस्फोट होने की संभावना होगी।
आज की साम्प्रदायिक राजनीति और नास्तिक कम्युनिस्ट शासन प्रणाली संसार में धार्मिकता के तर्क को बलात् दबाने का कार्य कर रही है। उन्हें नहीं पता कि तर्क प्रबल होता है और वह देर सवेर अपने आप बाहर निकलेगा। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जितने वेग से तर्क बाहर आएगा उतना ही भारी महाविस्फोट भी होगा। हां, यह महाविस्फोट धार्मिकता नहीं करेगी अपितु धार्मिकता की स्थापनार्थ इस दुर्गंधित होती राजनीतिक व्यवस्था में स्वयं ही होगा। ‘स्वयं ही होगा’ से हमारा तात्पर्य ये है कि वर्तमान विश्व ने अपनी मूर्खताओं से जितना परमाणु भंडार या रासायनिक हथियार एकत्र कर लिये हैं-ये उनका कहीं न कहीं प्रयोग अवश्य करेगा। जिसमें ये स्वयं और इनकी बोझ मारती विश्व व्यवस्था स्वयं धू-धू करके जल जाएगी। उस भयंकर विनाश के पश्चात तर्क प्रबल होगा और उसे जितने वेग से दबाया गया था, उतने ही वेग से वह उस समय बाहर आएगा। तब बचे -खुचे लोगों को धर्म का मर्म और तर्कानुसंधान की अनिवार्यता को राजधर्म का अंग बनाने का सत्य समझ आएगा।
इस महाविनाश से बचने के लिए विश्व को भारत के राजधर्म को समझना ही होगा। यह तर्क (जिसे यास्क ने ऋषि कहा है) वेद धर्म का प्राण है। वेद की हर ऋचा में तर्क समाहित है। यही कारण है कि वेद को सृष्टि संचालन हेतु विश्व का आदि संविधान कहा गया है। ये वेद ही है जो मनुष्य को उसकी साधना का पथ और उसके साध्य से परिचित कराता है। वेद ज्ञान मनुष्य को भटकने नहीं देता और कोई भी ऐसा कार्य न करने की शिक्षा देता है, जो उनकी साधना और साध्य में साम्यता उत्पन्न करे। साधना और साध्य की दूरी को मिटाना और मिटाते-मिटाते उस स्थिति में ले आना कि जहां सब कुछ शून्य मेंं समाविष्ट हो जाए-यही वेद का राजधर्म है।
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पाने के लिए तथा अपनी इहलौकिक व पारलौकिक उन्नति की प्राप्ति हेतु जितने अवसर मनुष्य के लिए अपेक्षित हैं उन सबके लिए वर्तमान विश्व व्यवस्था और राजनीतिक विचारधाराएं अनेकों रास्ते बताती हैं, पर वेद कहता है कि इस संसार की नियामक शक्ति एक है, व संचालक शक्ति एक है तो उसे पाने के लिए भी अनेक रास्ते न होकर एक ही रास्ता होगा। इसलिए विभिन्न रास्तों पर मत चलो। यदि ऐसा करोगे तो मार्ग भटक जाओगे। एक को पाने के लिए एक ही मार्ग चुनना पड़ेगा। वेद ने ऐसा आदेश संपूर्ण मानवजाति को दिया है और हर मानव के लिए यह राजनीतिक व सामाजिक प्रतिज्ञा निर्धारित की है-
यां मेधां देवगणा पितरश्चोपासते।
तया मामद्य मेधयाअग्ने मेधाविनं कुरू:।।
अर्थात जिस एक ही मार्ग को अपनाकर हमारे विद्वान पूर्वज मेधापथ पर आगे बढ़ते हुए बुद्घि की उपासना करते संसार से चले गये, संसार में अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए हम भी उसी मेधापथ अर्थात न्यायसंगत और तर्कसंगत धार्मिक मार्ग का अवलंबन करें। इसलिए हे दयालु परमपिता परमेश्वर! आप कृपा करके मुझे उसी मेधापथ का अर्थात एक ही मार्ग का पथिक बनाओ, मेरे कदम ना भटकें और मैं एक ही पथ पर आगे बढ़ता जाऊं।
इस वेदमंत्र में अनेकताओं को मिटाया गया है और अपने ऋषि पूर्वजों के द्वारा निर्धारित एक ही मार्ग को अपनाने की प्रार्थना की गयी है। उस एक मार्ग को अपनाने के लिए तर्कानुसंधान का कार्य निरंतर होते रहना चाहिए। भारत के इस धर्ममार्ग को संसार अपने लिए चाहे अनुपयोगी माने पर यह तो सत्य है कि भारत का राजधर्म ही संसार के लिए उपयुक्त है।
 राजा प्रेमानुरागी हो
अथर्ववेद (15-8-1) कहता है-
सो अरज्यत ततो राजन्यो अजायत्।
इसमें राजधर्म की विशेषता बतायी गयी है कि राजा राजा इसलिए बन गया कि वह अपने लोगों से प्रेम करता है। अत: राजधर्म की अनिवार्यता है कि राजा प्रेमानुरागी हो, वह सत्ता स्वार्थी ना हो, वह अपने जनों का और विश्व का कल्याण चाहता हो, उसकी राजनीति में लेशमात्र भी दुर्भाव और घृणा ना हो। अन्यथा वह संसार को विभिन्नताओं में बांटने का कार्य करेगा विभिन्न देश बनाएगा और फिर ये विभिन्नताएं एक दिन संसार के लिए भस्मासुर बन जाएंगी। कितना पवित्र है-भारत का राजधर्म?
भारतीय राजधर्म बड़ी गहराई से मनुष्य, समाज और राजनीति का सहसम्बंध स्थापित करता है। वह राजनीति का क, ख, ग मनुष्य को बाद में सिखाता है-पहले राजनीति को यह बताता है कि यह मनुष्य क्या है? कौन है? कहां से आया है और क्यों आया है? इसे यह मानव देह क्यों मिली है?-और इस मानव देह के माध्यम से अपने अभीष्ट की प्राप्ति में इसे राजनीति की कितनी आवश्यकता है? साथ ही यह भी कि जीव के चिह्न क्या है? हर मनुष्य का अपना पृथक अस्तित्व है यह आत्मा अजर और अमर है। क्रमश:

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