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आज का चिंतन

शिव आख्यान* भाग — 1

डॉ डी के गर्ग
भाग-१
ये लेख 10 भाग में है , पूरे विषय को सामने लाने का प्रयास किया है। आप अपनी प्रतिक्रिया दे और और अपने विचार से भी अवगत कराये

विषय को प्रारंभ करने से पहले ये बता देना उचित होगा की शिव को लेकर अनेकों भ्रांतियां है जिनको समझना जरुरी है।
शिव के तीन प्रकार है
1.महाराजा शिव
2. ईश्वर का नाम शिव
3 तसवीर वाले शिव जिसके गले में सर्प लिपटे है। और जिसका वर्णन शिव पुराण में है
कौन सा सही या गलत ये समझने के लिए लेख की पूरी श्रृंखला पर ध्यान दे।

महाराजा शिव :
शिव गांधार क्षेत्रों में राज्य करने वाले एक महान् राजा थे। शिव के पिताजी के नाम अग्निश्वात था अग्निश्वात के पिताजी के नाम विराट् था और विराट के पिताजी का नाम महर्षि ब्रह्मा था, जिनकी पत्नी का नाम उमा है और पर्वत क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ कार्य करने के कारण उनको पार्वती की उपाधुी दी गयी है जैसे वन क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए वन देवी की उपाधि दी जाती है। शिव के दो पुत्र गणेश और कार्तिकेयन है। कैलाश उनकी राजधानी थी और तिब्बत का पठार और हिमालय के वे शासक थे। हरिद्वार से उनकी सीमा आरम्भ होती थी और काशी विश्वनाथ तक उनका साम्राज्य फैला हुआ था, उनकी पत्नी का नाम पार्वती था जो राजा दक्ष की कन्या थी। उनकी पत्नी ने भी गौरीकुंड उत्तराखंड में रहकर तपस्या की थी।
समाज में यह फैलाया गया है कि ये शिव भांग के नशे,चिलम आदि का शौकीन है, अक्सर उसकी पत्नी पार्वती उसको शांत करती है, उसके शरीर पर एक नाग रहता है और सिर के बालों से विशाल गंगा नदी निकल रही है। छोटे पुत्र की सवारी चूहा है उसका सिर हाथी का है, इस पुत्र की मूर्ति, पूजा पाठ से भी आशीर्वाद मिलता है। बड़े पुत्र कार्तिकेय को कथाकार भूल गए हैं क्योकि गणेश को ही प्राथमिकता दी गयी है ।
वे महान् विज्ञान-वेत्ता अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण करने वाले थे। रावण ने भी उनके पास रहकर शिक्षा प्राप्त की थी। उनकी प्रजा कैलाश पर्वत के समान आचार विचार में ऊँची थी। अतः उनको कैलाश पति भी कहते थे। उनके राष्ट्र में अनुष्ठान अनुसंधान अनुवृत्ति और नाना प्रकार के ज्ञान-विज्ञान में कार्य होते रहते थे। वह शिव एक महान् योगी भी थे। शिव योग का अभिप्राय है नाना प्रकार के यंत्रों का निर्माण करते रहना तथा विविध यंत्रो का निर्माण करना उनको क्रिया में लाना। इस प्रकार वह अपने जीवन का राष्ट्रीयकरण करते हुए अपनी आभा को विकसित करते रहते थे एवं उनके राज्य में सब कोई सुखी था। कैलाशपति शिव वीतरागी महान राजा थे, वे राजा होकर भी अत्यंत वैरागी थे तथा उनका राज्य इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें कालांतर में साक्षात् ईश्वर के नाम शिव से उनकी तुलना की जाने लगी।
महाराजा शिव जी के विषय में किसी को ज्यादा इतिहास नही पता हैं। इसी का लाभ लेकर वाममार्गियों ने हमारे धार्मिक साहित्य में भारी गड़बड़ कर दी और साकार पुरुष शिव और ईश्वर के एक अन्य नाम शिव को मिलकर अनर्थ कर दिया।
शिव को भांग का नशेड़ी बताना महाझूठ है, जो नशा खोर लोगांे के गंदे दिमाग की उपज है, इसका कोई प्रमाण नहीं है। और हिमालय में भाग ,गांझा पैदा ही नहीं होता ।कोई सज्जन पुरुष किसी नशेड़ी की पूजा करना तो दूर पास भी नहीं बैठना चाहेगा ।एक तरफ महाराजा शिव उनकी पत्नी पार्वती और गणेश की मूर्ति बनाकर किस्से कहानियाँ रच दीं और शिव ईश्वर की मूर्ति बनाकर महाराजा शिव और ईश्वर शिव को एक ही मान लेने की भारी गलती कर दी।
महाराजा शिव हमारी दृष्टि में :
होली का पर्व हो या श्रावण का महीना ,आप देखेंगे की मंदिरो में हो रही कथाओं में और समाचार पत्र में शिव जी के भक्त वास्तविक शिव ईश्वर के चित्रण को प्रस्तुत न करके त्रेता काल में उत्पन्न हुए योगी शिव को, जो एक आत्मा थी, को भांग पिला कर मस्त पड़ा हुआ दिखाते हैं ।उनके अनुचर बनके अपने आप भी नाना प्रकार के शिवजी के नाम पर नशा करते हैं ।ऐसे ही लोगों ने शिवजी को नशेड़ी बनाकर कलंकित किया है । अपने महा योगियों को, अपने महापुरुषों को बदनाम करने का कार्य भी ऐसे ही अज्ञानी लोगों का है।
अपने महायोगियों को, अपने मनीषियों को, अपने तपस्वीयों, को मनस्वीयो को विधर्मीयो के द्वारा लान्छित करने का तथा अपमानित करने का अवसर हम स्वयं देते हैं। जब हम महायोगी शिव को भांग पीकर लेटा हुआ दिखाते हैं जब हम ऐसी कपोल कल्पित कल्पनाएं, दिष्टकूट बनाकर समाज में प्रस्तुत करते हैं तो हमारे महा योगियों का मजाक तो उड़ेगा ही।
इसीलिए महर्षि दयानंद को शिव रात्रि को जब बोध हुआ की शिवलिंग पर चूहा सभी प्रसाद ,फल इत्यादि को खा रहा है और शिव लिंग उसका कुछ नहीं बिगड़ रहा तब से उन्हें बोध हुआ की ईश्वर चेतन है और पाषाण की मूर्ति ईश्वर नहीं हो सकती तभी उन्होंने ने सच्चे शिव की खोज करने का प्रण लिया था। संसार के समक्ष सत्य को स्थापित किया था। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आर्य समाज की स्थापना की थी।
हम राजा शिव जी को एक महायोगी स्वीकार करते हैं लेकिन उसको ईश्वर का अवतार स्वीकार नहीं करते हैं इसी प्रकार राम और कृष्ण हमारे महापुरुष हैं। वे विष्णु के अथवा ईश्वर के अवतार नहीं हैं ।

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