प्रात:काल की संध्या में अपने इष्ट से मिलन होते ही कितनी ऊंची चीज मांग ली है-भक्त ने। मांगने से पहले उसे सर्वव्यापक और सर्वप्रकाशक जैसे विशेषणों से पुकारा है, जो उसके लिए उचित ही है। पहली भेंट में इतनी बड़ी मांग करना कोई दीनता प्रकट करना नहीं है, अपितु अपनी पात्रका को कितना ऊंचा उठा लेना है कि अब मैं संसार का एक साधारण व्यक्ति न रहकर असाधारण व्यक्ति हो गया हूं और मुझे अब संसार की ऐषणाओं से कोई लेना-देना नहीं है। अब मुझे बड़ी चीज चाहिए और मैं उसी के लिए तेरे दर पर आ बैठा हूं। ऐसा कहना अपना सर्वस्व समर्पण कर देना है कि मैं इस संसार में सुख-शान्ति की प्राप्ति और परलोक की सिद्घि को प्राप्त नहीं कर सकता। हां, एक प्रकार से कर सकता हूं कि तेरा सान्निध्य और तेरा आसरा मुझे निरंतर मिलता रहे। तेरी कृपा की दृष्टि मुझ पर निरंतर होती रहे।
वैदिक सन्ध्या का शुभारम्भ भी गायत्री मंत्र से किया जाता है। जिसकी व्याख्या हमने यहां जानबूझकर नहीं की है। क्योंकि उस मंत्र से भारत का लगभग हर वैदिकधर्मी जन भली प्रकार परिचित है।
‘आचमन मंत्र’ के पश्चात ‘इंद्रिय स्पर्श’ किया जाता है। यह इस प्रकार है-
ओ३म् वाक् वाक्। ओ३म् प्राण: प्राण:।
ओ३म् चक्षु: चक्षु:। ओ३म् श्रोत्रं श्रोत्रम्।
ओ३म् नाभि:। ओ३म् हृदयम्। ओ३म् कण्ठ:। ओ३म् शिर:। ओ३म् बाहुभ्याम् यशोबलम्। ओ३म् करतल कर पृष्ठे ।। 2 ।।
भावार्थ :-यहां साधक परमपिता परमेश्वर से अपने शरीर व इंद्रियों में ओज, बल व तेज प्रदान करने की प्रार्थना कर रहा है कि आपकी अपार कृपा से मेरे मुख में रसना तथा बोलने की शक्ति, नासिका द्वार व उनमें प्राण तथा सूंघने की शक्ति, आंखों में देखने की शक्ति, कान में सुनने की शक्ति मरणपर्यन्त विद्यमान रहे। नाभिचक्र जो कि मेरे शरीर का केन्द्र है-आजीवन ठीक से कार्य करता रहे वह अपनी धुरी से टहले नहीं (नाभि टहलते ही बीमारी घेर लेती है, इसी को समाज में नाभि टहलना कहा जाता है) और ठीक से कार्य करता रहे। गले से मधुर स्वर निकले। गले में मधुर स्वर नहीं रहा और मेरे बोल कर्कश हो गये तो जीवन आपत्तियों से घिर जाएगा। इसलिए मुझे सदा ही विनम्र बनाये रखना, मीठे बोल बोलने वाला धीर वीर गम्भीर बनाये रखना। मेरा सिर ठण्डा रहे यदि सिर में गरमी बढ़ गयी तो मेरा बौद्घिक उद्यम रूक जाएगा और मैं मेधा शक्तिसंपन्न नहीं हो पाऊंगा। जिससे मेरा जीवन धरती पर भार बन जाएगा। सिर ठण्डा रहने से मुझे बौखलाहट और झुंझलाहट नहीं घेरेगी और मैं संतोषी बना रहकर अपने कार्यों का निष्पादन करता रहूंगा। बुद्घि की साधना में मेरा मन लगा रहेगा। हे ईश्वर दयानिधान मैं चाहता हूं कि मेरी भुजाएं सदा यश और बल कमाने वाले कार्य करें। ये गिरतों को उठायें और रोतों के सिर पर हाथ रखने का काम करें, जो निर्बल हैं उनकी अत्याचारी बलधारियों से रक्षा करें और समाज की व्यवस्था को गतिशील बनाये रखने में मेरा सदा उत्साहवर्धन करती रहें। मेरे हाथ पाप की कमाई में संलिप्त ना हों। समाज में कहा जाता है कि अमुक पाप कार्य में अमुक ‘व्यक्ति का हाथ है’-संपूर्ण जीवन में मेरे ऊपर ऐसा अपयश रूपी दाग न लगे। हे प्रभु! मैं जानबूझकर देशों इंद्रियों से जीवन भर कभी भी पाप न करूं।
‘इन्द्रिय स्पर्श’ के माध्यम से हम न केवल अपनी इन्द्रियों का इस प्रकार स्पर्श करते हैं अपितु पूरे दिन भर या रात भर में किसी इन्द्रिय से कोई पाप तो नहीं कर लिया है-ऐसा अंतरावलोकन भी हम स्वयं कर लेते हैं। इससे हमारी अंतर्मुखी सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है और हम अपने ‘प्रहरी’ स्वयं बन जाते हैं। ऐसी प्रार्थना से हमारा आत्मा बलशाली होता है और हम उसी के आलोक में कार्य करने के अभ्यासी बन जाते हैं।
इसके पश्चात आता है-मार्जन मंत्र।
मार्जन मंत्र
ओ३म् भू: पुनातु शिरसि
ओ३म् भुव: पुनातु नेत्रयो:।
ओ३म् स्व: पुनातु कण्ठे।
ओ३म् मह: पुनातु हृदये।
ओ३म् जन: पुनातु नाभ्याम्।
ओ३म् तप: पुनातु पादयो:।
ओ३म् सत्यं पुनातु पुन: शिरसि।
ओ३म् खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र।
मार्जन मंत्र का अभिप्राय ही मांजना है, परिमार्जन करना है। पवित्रता उत्पन्न कर सारी अस्वच्छता को या अपवित्रता को साफ कर देना है। अत: इस परिमार्जन मंत्र का भावार्थ भी यही है कि मेरी प्रत्येक इन्द्रिय में पवित्रता रहे। साधक सिर से प्रारंभ करता है और अंत में सारे शरीर को छूता हुआ पुन: सिर पर ही आकर रूकता है। कहता जाता है कि मेरे सिर में पवित्रता दो। आंखों में, गले में, हृदय में, नाभिचक्र में, पैरों में, सिर में और सर्वत्र पवित्रता प्रदान करो, अर्थात इन सब में पवित्रता का वास हो। कहीं पर भी अपवित्रता या अस्वच्छता ना हो।
इस मंत्र में साधक ने अपना ‘स्वच्छता अभियान’ अपने आप ही चला दिया है। अपना नायक अपने आप बन गया है और शरीर के एक-एक केन्द्र को, एक-एक स्थान को, एक-एक कोने को बड़ी सूक्ष्मता से देखता जा रहा है कि यहां तो अस्वच्छता नहीं है और यहां तो अपवित्रता नहीं है? प्राणप्रिय परमेश्वर का ध्यान सिर में किया तो ‘सिरदर्द’ समाप्त हो गया, सिर पवित्र हो गया। दु:खहर्ता परमेश्वर का ध्यान आंखों में किया तो आंखें पवित्र हो गयीं अब उन्होंने भी अपने दुर्गुण त्याग दिये। सुखप्रदाता ईश्वर को गले में देखा तो गला मीठा हो गया। उस महान को अपने हृदय में बसाया तो हृदय विशाल हो गया, महान हो गया। सबके जनक को अपनी नाभि में देखा तो नाभिचक्र स्वच्छ हो गया। दुष्टों के संतापक को पैरों में देखा तो गलत रास्ते पर चलने से वे भी कांपने लगे और पवित्र होकर सीधे सच्चे रास्ते पर आ गये। उस एकरस पावन पिता को पुन: सिर में देखा तो सिर ठण्डा होकर समस्याओं का समाधान देने लगा और मेरी मेधाशक्ति की उपासना में मेरा सहायक हो गया, और आकाशवत् सर्वव्यापक पिता को सब अंगों में देखा तो सर्वत्र पवित्रता की और पुष्टि की अनुभूति होने लगी। इस प्रकार मार्जन मंत्र भी एक प्रकार से हमारे लिए अंतरावलोकन का ही मंत्र है। मार्जन मंत्र के पश्चात आता है -‘प्राणायाम् मंत्र।’ यह इस प्रकार है :-
ओ३म् भू:। ओ३म् भुव:।
ओ३म् स्व:। ओ३म् मह:।
ओ३म् जन:। ओ३म् तप:।
ओ३म् सत्यम्।।
प्राणायाम मंत्र से प्राणों की पवित्रता होती है, उनकी शुद्घि होती है। हमारी सन्ध्या हमें स्थूल जगत से सूक्ष्म की ओर लेकर जाती है। अभी तक हम स्थूल में थे, अब धीरे-धीरे सूक्ष्म की ओर बढ़ रहे हैं। अभी तक इन्द्रिय स्पर्श आदि कर बाह्य जगत में या स्थूल जगत में खड़े थे, पर अब प्राणायाम के माध्यम से सूक्ष्म जगत की ओर बढ़ रहे हैं। बढऩे का ढंग बड़ा निराला है।
बहुत धीरे-धीरे हम दृश्य से अदृश्य की ओर जा रहे हैं। बड़ा प्यारा दृश्य बनने लगा है, ंऔर हम प्राणायाम के माध्यम से देखते ही देखते स्थूल जगत से कट गये हैं। किसी अदृश्य परंतु बहुत ही प्यारे लोक में हमारा पदार्पण हो रहा है। अनुभव के इस विषय को वाणी से वर्णित नहीं किया जा सकता, पर इतना अवश्य है कि हम इस समय आनंदानुभूति करने लगते हैं।
इस मंत्र में कहा गया है कि हे सर्वरक्षक सर्वान्तर्यामिन प्रभो! आप प्राणस्वरूप दु:खनाशक, सुखस्वरूप सबसे बड़े सबके पिता दुष्टों का संहार करने वाले या उन्हें दंडित करने वाले अंतर्यामी तथा सत्यस्वरूप हैं। मैं तेरे इन स्वरूपों का ध्यान करता हूं और अपने हर श्वास-प्रश्वास को तेरे इन स्वरूपों को देखने में लगाता हूं कि इन्हें ध्यान से देखो और इनकी लहरों को पकडक़र उन्हें अपनी स्वर लहरी बना लो। मीठी तान निकलने लगे तो भीतर ही भीतर नृत्य का आनंद लेने लगो।
क्रमश:

Comment:

betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
klasbahis
holiganbet güncel
imajbet güncel
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
Casinolevant Giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş