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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-55

कलकत्ता की टकसाल के अध्यक्ष रहे प्रो. विल्सन ने कहा था-”मैंने पाया कि ये लोग सदा प्रसन्न रहने वाले और अथक परिश्रमी हैं। उनमें चापलूसी का अभाव है और चरमसीमा की स्पष्टवादिता है। मैं यह कहना चाहूंगा कि जहां भी भयरहित विश्वास है वहीं स्पष्टवादिता भारतीयों के चरित्र की एक विशिष्ट विशेषता है। पढ़े-लिखे लोगों में भी मैंने इसी प्रकार को उद्यमिता, बुद्घिमानी, प्रसन्नचित्तता एवं स्पष्टवादिता देखी है। सादगी बच्चों जैसी निश्छलता एवं सच्चाई, व्यापार एवं जीवन के तौर तरीकों से अनभिज्ञता सभी हिंदुओं के सामान्य गुण हैं। सामान्यत: कहा जा सकता है कि हमारे स्कूलों के बच्चों की अपेक्षा वहां के बच्चे अधिक ग्रहणशीलता एवं परिश्रम करने में आगे हैं। धनाढ्य एवं सम्मानित व्यक्तियों के संपर्क में आने पर मैंने उनके उच्च व्यवहार स्पष्टवादिता किसी बात को बहुत शीघ्रता से समझने की क्षमता, भावनाओं एवं स्वतंत्रता के सिद्घांतों के प्रति निष्ठा को देखा है, जिससे संसार का कोई भी देश उन्हें सज्जनता का प्रमाण पत्र देने में संकोच नहीं करेगा। 12 व 13 वर्ष की छोटी आयु के लडक़ों की कार्यक्षमता भी अत्यंत आश्चर्यजनक है।”
भारत अपने इन गुणों पर किसी भी प्रकार की आंच नहीं आने देना चाहता था। वह इन्हें हर स्थिति में बचाये रखना चाहता था, जिससे कि हमारा राष्ट्रीय जीवन उच्च गुणों से सुशोभित रहे। इधर भारत इन गुणों को बचाने का संघर्ष कर रहा था और उस ओर विश्व के अन्य देश भारत के पुरूषार्थ और पौरूष से प्रभावित हो रहे थे और वे भी अपने आपको बचाये व बनाये रखने के लिए विदेशी सत्ताधीशों के विरूद्घ अपना संघर्ष कर रहे थे।
आप अमेरिका का ही उदाहरण लें। इस देश की खोज कोलम्बस ने 15वीं शताब्दी के अंतिम दिनों में की थी। उसके पश्चात इस देश के विशाल भूभाग को (जिसमें कनाडा भी सम्मिलित था) ब्रिटेन कब्जाने में सफल रहा। ‘कोलम्बस के भारत’ अर्थात अमेरिका में जब ब्रिटिश लोगों का शासन स्थापित हो गया तो ब्रिटिश भारत और ब्रिटिश अमेरिका की निकटता बढ़ी। भारत की स्वाधीनता प्रेमी हवायें अमेरिका पहुंची और वहां की जनता अपने क्रूर शासकों के विरूद्घ उठ खड़ी हुई। 1757 ई. में भारत में प्लासी का युद्घ हुआ। पर भारत की जनता अंग्रेजों का सफाया करने के लिए उठ खड़ी हुई।
भारत के लोगों ने भारत के शासन पर अधिकार करने के लिए सचेष्ट हुए इन विदेशी अंग्रेजों को अपने ऊपर शासन करने के लिए कभी भी अपनी सहमति व स्वीकृति प्रदान नहीं की। इस विचार का प्रभाव अमेरिका पर पड़े बिना नहीं रह सकता था। अंग्रेजों के माध्यम से भारत के स्वाधीनता संग्राम के समाचार अमेरिका पहुंच गये और वहां के लोग भारत से प्रेरित होकर अंग्रेजों को भगाने के लिए उठ खड़े हुए। जो लोग हमारे इस तर्क से असहमत हैं-उन्हें असहमत होने का पूर्ण अधिकार है। पर वे यह भी सोचें कि अंग्रेजों ने अमेरिका छोडऩे से पहले जैसे कनाड़ा को अमेरिका से अलग कर उसका विभाजन कराया-कालांतर में अंग्रेजों ने वही प्रयोग ब्रिटिश भारत की आजादी के समय भारत में भी किया और भारतीय उपमहाद्वीप को भारत व पाकिस्तान दो भागों में विभाजित कर दिया। कहने का अभिप्राय है कि भारत को विभाजित करने का संस्कार ब्रिटिश लोग अमेरिका से लेकर आये थे। अब यदि भारत के विभाजन के लिए संक्रमण का यह रोग भारत में आ सकता है तो भारत की स्वाधीनता संबंधी चिंतनधारा भारत से अमेरिका क्यों नहीं जा सकती?
अमेरिका 4 जुलाई 1776 को स्वतंत्र हुआ तो उसके कुछ कालोपरांत फ्रांस की राज्यक्रांति (1789 में) हो गयी। इस क्रांति को भी भारत के लोगों के स्वतंत्रता संबंधी विचारों ने प्रभावित किया था। फ्रांस के लोगों ने देखा कि जब भारत के लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए अपने क्रूर और आततायी विदेशी शासकों के शासन के विरूद्घ लड़ सकते हैं तो यही कार्य फ्रांस में क्यों नहीं किया जा सकता? फलस्वरूप फ्रांस के लोगों ने अपनी ही अत्याचारी राजशाही के विरूद्घ क्रांति का उद्घोष कर दिया। फ्रांस की राज्यक्रांति सफल रही। इन देशों में स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और पारस्परिक प्रेम की बातें की जाने लगीं। जबकि उससे पहले इन देशों में इन सामाजिक मूल्यों को कोई जानता तक भी नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में सारा यूरोप पूर्णत: पिछड़ा हुआ था। एक प्रतिशता लोग भी पढ़े-लिखे नहीं थे। जबकि भारत युग-युगों से इन मूल्यों को अपनाये हुए था और उस समय इन मूल्यों को कुचलने वाले अपने विदेशी शासकों के विरूद्घ जमकर मोर्चा ले रहा था। अत: विचार करने वाली बात है कि यूरोप को इन सामाजिक मूल्यों का ज्ञान रातों-रात अचानक हो गया या भारत से जाने वाली हवाओं ने उन्हें इन सामाजिक मूल्यों से परिचित करा दिया? हम देखते हैं कि इसके पश्चात रूस जैसे देश में राजशाही को उखाड़ फेंककर वहां भी लोगों ने अपना शासन स्थापित कर लिया।
यदि आज का इतिहासकार निष्पक्षता से इतिहास का अवलोकन करेगा तो उसे पता चलेगा कि जब यूरोप जागना आरंभ हुआ तो वह उपनिवेशों के माध्यम से भारत की ओर भागा। उसे भारत के ‘सोने’ की चाह थी। भारत आकर यूरोपीय लोगों ने भारत को चाहे जितना लूटा-पर उपरोक्त उद्घरण बताते हैं कि भारत ने उन्हें कहीं न कहीं प्रभावित भी किया और वे प्रभावित करने वाले भारत के स्वतंत्रता आदि के व शालीनता और मानवीय गरिमा का सम्मान करने वाले मानवीय गुण ही थे। इन्हें विदेशी यूरोपीय लोगों ने ‘लूटकर’ अपना वास्तविक उत्थान किया। वास्तव में भारत के ये मानवीय गुण विश्व को उसकी सबसे बड़ी देन हैं। इन्हें यूरोपीयन लोगों ने चाहे यह कहकर स्वीकार नहीं किया कि उसे ये गुण भारत से मिले, पर इनके विषय में यह सत्य है कि जब यूरोपीयन लोग हमारे चारित्रिक गुणों की उपरोक्तानुसार प्रशंसा कर सकते हैं तो यह स्वाभाविक है कि इन गुणों को उन्होंने अपनाया भी होगा।
भारत को नीचा दिखाने के लिए उनके द्वारा यह भ्रामक प्रचार किया गया कि भारत से स्वाधीनता, समानता और भाई चारे के गुण पश्चिम से आये। अब उन्हें कौन बताये कि ज्ञान प्रकाश (सूर्योदय) तो सदा से ही पूरब में होता आया है? यह कभी भी पश्चिम में जाकर नहीं हो सकता। पश्चिम में तो यह डूब सकता है। आज हमें अपने विषय में व्याप्त भ्रान्तियों का निवारण करना ही होगा। यदि हम अपने विषय में व्याप्त इन भ्रांतियों का निवारण नहीं कर पाये तो अनर्थ हो जाएगा और हमारी भविष्य की पीढिय़ां अपने अतीत के विषय में कुछ न जानने के कारण विकास की गति में पिछड़ जाएंगी या अपने आपको विदेशी धर्म का आहार स्वेच्छा से बन जाने देंगी।
विश्व को भारत ने दी परिवार की व्यवस्था
भारत ने हर क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन किया है। परिवार बसाना और परिवार को बसाते-बसाते राष्ट्र बसाना भारत की विश्व को महत्वपूर्ण देन है। इस देन को सारे विश्व ने आज लगभग स्वीकार कर लिया है। जहां इसे स्वीकार नहीं किया जा सका है या स्वीकार करके भी इसे तोडऩे और छोडऩे का क्रम आरंभ हो गया है, वहां आज भी मानव अशांत है और भटकन का शिकार है। वेद ने विश्व को परिवार नाम की संस्था प्रदान करते हुए विश्व के समक्ष एक आदर्श स्थापित किया और उसे बताया कि परिवार में भी लोग परस्पर कैसे रहेंगे? पारिवारिक संस्कार राष्ट्रीय संस्कार कैसे बने और फिर राष्ट्र या वसुधा एक परिवार कैसे बने-यह बताया।
क्रमश:

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