मनुआ हरि को याद रख, यह माया तो भटकाय

बिखरे मोती-भाग 199

कछुआ भूले ना लक्ष्य को, 
बेशक पलटी खाय।
मनुआ हरि को याद रख,
यह माया तो भटकाय ।। 1132 ।।
व्याख्या :- प्रकृति में कछुआ एक ऐसा प्राणी है, जिसमें आत्मसंयम, परिस्थिति से तालमेल और अपने गंतव्य को न भूलने की विलक्षण शांति परमपिता परमात्मा ने उसे उपहार स्वरूप प्रदान की है। वह खतरा देखते ही अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कमेन्द्रियों को सिकोड़ लेता है, उन्हें अपने नियंत्रण में रखता है और ऐसे लगता है जैसे कोई ढेला पड़ा हो, किंतु जैसे ही खतरा टलने का भान उसे होता है पुन: पूर्वावस्था में आ जाता है। यह गुण उसका आत्मसंयम का गुण है, जिसे हमें सीखना चाहिए। दूसरा गुण उसका परिस्थितियों से समन्वय का होता है, जैसे जल और थल में उसकी सभी गतिविधियां पर्यावरण के अनुसार बदल जाती हैं। यह गुण भी उसका ग्राह्य है। तीसरा गुण उसका बड़ा अद्भुत है-वह अपने लक्ष्य को सर्वदा याद रखता है, बेशक उसका मुख आप विपरीत दिशा की ओर मोड़ दें, उसे उलट-पुलट कर दें किंतु वह अपने गंतव्य के प्रति इतना लगनशील और संवेदनशील होता है कि शनै: शनै: अपने गंतव्य की तरफ गतिमान हो जाता है और अंततोगत्वा अपने लक्ष्य पर पहुंचकर ही दम लेता है। यह उसका विलक्षण गुण है, जिसे मनुष्य को चुरा लेना चाहिए अर्थात अपने सभ्याचरण में लाना चाहिए। हे मेरे मन! तू भी कछुए की भांति अपने गंतव्य को अर्थात भगवद् धाम को, शरणागति को, प्रभु-स्मृति को सर्वदा याद रख, क्योंकि तेरे जीवन का अंतिम लक्ष्य प्रभु साक्षात्कार करना है, मायावी संसार में फंसना नहीं। यहां पांचों क्लेशों (अस्मिता, अविद्या, राग, द्वेष, मृत्यु) तथा छह विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर) के बड़े वेगवान तूफान चल रहे हैं, जो मनुष्य को अपने गंतव्य से अर्थात प्रभु-भक्ति से, भगवद्धाम से भटकाते रहते हैं, किंंतु याद रखो, जो कछुए की तरह अपने गंतव्य को अथवा लक्ष्य को भूलता नहीं है, उसे सर्वदा याद रखता है अर्थात प्रभु की याद हमेशा जिसके पवित्र मन में बनी रहती है, वह एक दिन अवश्य अपने गंतव्य को प्राप्त होता है, यानि कि भगवद्धाम को प्राप्त होता है, आनंदलोक को प्राप्त होता है, शरणागति को प्राप्त होता है। इसलिए हे मनुष्य! जिस प्रकार कछुआ अपने लक्ष्य को याद रखता है तू भी सर्वदा प्रभु को याद रख, तभी मेरा संसार में आना सार्थक सिद्घ होगा।
स्वार्थ और परमार्थ का जन्म कब होता है?
झूठ कपट छल-छिद्र से,
सदा जन्मता स्वार्थ।
सत्य प्रेम करूणा मिलें,
तब उपजै परमार्थ ।। 1133 ।।
व्याख्या :-प्राय: संसार में स्वार्थी व्यक्ति को हेयभाव से और परमार्थी व्यक्ति को श्रेय भाव से देखा जाता है। क्या कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि स्वार्थ संकीर्ण सोच का अर्थात नकारात्मक (हृद्गद्दड्डद्दद्ब1द्ग ञ्जद्धद्बठ्ठद्मद्बठ्ठद्द) सोच का परिचायक है, जिसका जन्म मन में बसे झूठ, कपट (फरेब) और द्वेष से होता है। मन के इन विकारों के कारण मनुष्य की सोच केवल अपने हित तक ही सीमित होती है, बेशक किसी की जान जाए-तो जाए, उसे तो केवल अपनी स्वार्थ सिद्घि से मतलब होता है। इसलिए संसार उसे हेय दृष्टि से देखता है, जैसा कि हमें रामचरित मानस में देखने को मिलता है।
क्रमश:

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