गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-4

वैदिक गीता-सार सत्य
डा. देसाई को अपने लक्ष्य की खोज थी और वह अपने लक्ष्य पर पहुंच भी गये थे, परन्तु अभी वास्तविक लक्ष्य (पण्डा और राजा से मिलना) कुछ दूर था। उन्होंने अपने साथ एक मुसलमान पथप्रदर्शक रख लिया था। यह पथप्रदर्शक वहां के लोगों को यह भी बताता जा रहा था कि देखो तुम्हारे देश से एक ब्राह्मण (डा. देसाई) आया है। इस पर वे लोग आश्चर्यचकित होकर डा. देसाई की ओर देखते थे।
डा. देसाई कई पण्डों से मिले। उन्होंने वहां देखा कि वहां की पुस्तकें देवनागरी अक्षरों में नहीं हैं ‘कवि भाषा’ के अक्षरों में लिखी है। यहां से निराश होकर डा. देसाई वहां के राजा के महल में पहुंचे। राजा भी उन्हें अपने बीच पाकर आश्चर्य चकित था। राजा ने डा. देसाई से भारत के विषय में अनेकों बातें पूछीं। उनके आतिथ्य सत्कार के लिए गाय का दूध भी मंगवाया गया। यद्यपि वहां गाय का दूध दुष्प्राप्य है। क्योंकि उस देश के लोग दूध का सेवन नहीं करते यद्यपि वहां गाय पर्याप्त संख्या में मिलती हैं।
डा. देसाई को वहां रहते पता चला कि अतीत में चाहे वहां कितने ही संस्कृत ग्रन्थ रहे हों पर अब को संस्कृत ग्रन्थ नहीं है। इससे डा. देसाई को निराशा हुई। पर उत्साहजनक एक बात यह भी कि उन लोगों ने अपनी प्राचीन धार्मिक गाथाओं को बाली द्वीप की भाषा में लिख लिया था। जिन्हें वे अब तक बड़े चाव से पढ़ते-पढ़ाते व सुनते-सुनाते थे। उनका यह भाव अपनी संस्कृति, अपने देश, अपने धर्म और अपने इतिहास के प्रति उनकी गहन निष्ठा का प्रमाण था, जिसे उन्होंने सदियों गुजर जाने के उपरान्त भी सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त की थी। ऐसा भाव निश्चय ही उनके प्रति भारत और भारतवासियों को जोडऩे में सहायक सिद्घ हो सकता है। वैसे ऐसी स्थिति केवल इसी द्वीप की हो, यह नहीं कहा जा सकता। सम्पूर्ण विश्व में ऐसे अनेकों द्वीप और देश हैं जहां सदियों पहले भारतवासी पहुंचे और आज के वहां के लोगों ने अपने मूल देश भारत पहचान को बनाये रखने में सफलता प्राप्त की है।
पुन: अपने मूल विषय पर आते हैं। अब डा. देसाई को लगने लगा था कि उन्हें वह मूल गीता यहां नहीं मिलने वाली- जिसकी खोज के अभियान में वह यहां आये हैं। वह बाली द्वीप से लौट आने की योजना बना ही रहे थे कि वहां के राजा के पुत्र का निमन्त्रण उन्हें मिला, राजकुमार उनसे कुछ विशेष वात्र्तालाप करना चाहता था। डा. देसाई ने भी राजकुमार से मिलने में कोई देरी नहीं की।
वह राजकुमार से मिले। राजकुमार ने डा. देसाई से भारत के विषय में बड़े विस्तार से बातें कीं। उन्होंने अपने वार्तालाप के क्रम में डा. देसाई से महाभारत के विषय में भी पूछा कि क्या यह ग्रंथ अपने सभी पर्व अर्थात अध्याय अभी तक मूल रूप में बनाये हुए है? डा. देसाई ने इस पर राजकुमार से जब ‘हां’ कहा तो वह अति प्रसन्न हुआ। तब उसने अपने एक ब्राह्मण को आज्ञा दी वह उनकी सन्दूक से भीष्म पर्व निकाल लावें।
डा. मंगलानन्द पुरी जी से हमें पता चलता है कि इस ‘भीष्म पर्व’ को ताड़ के 14 इंची लम्बे तथा ढाई इंची चौड़े पत्रों पर लिखा गया है। बीच में छेद करके डोरे से सबको नत्थी कर दिया गया है। इसी ‘भीष्म पर्व’ में ही वास्तविक गीता छिपी थी। यह अलग बात थी कि बाली द्वीप के निवासी ‘गीता’ से पूर्णत: अपरिचित थे। डा. देसाई यह देखकर दंग रह गये कि उस बाली द्वीप के ‘भीष्म पर्व’ में भगवदगीता 18 अध्याय के स्थान पर एक अध्याय में ही पूर्ण हो गयी है। जो कि 23वें 40वें पत्र में समाहित की गयी थी। उस गीता के अनुसार गीता शुभारम्भ ‘धर्मक्षेत्रे’ के स्थान पर ‘दृष्टवेवं स्वजनं’ श्लोक से आरम्भ होती है। जिसके कुल श्लोकों की संख्या मात्र 70 है। बाली द्वीप वाले हिन्दू यह कहते थे कि जब सन 1478 ई. में जावा द्वीप पर मुसलमानी राज्य स्थापित हुआ-उस समय जावा से एक ब्राह्मण बाहुराहु अपने धर्म की रक्षा के लिए कुछ धार्मिक पुस्तकें साथ लेकर बाली द्वीप में भाग आया था। अत: इस बाली द्वीप में महाभारत के आदि पर्व अर्थात आदि विराट, भीष्म, मूसल, अस्थानिक, स्वर्गारोहण, उद्योग और आश्रमवासी उपलब्ध हैं। शेष पूर्व जावाद्वीप में है।
मंगलानन्दपुरी जी इस सत्तर श्लोकी गीता को ही वास्तविक गीता मानते हैं और प्रमाणों से स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान गीता की श्लोक संख्या 70 से 700 तक बाद में पहुंचायी गयी है।
कुछ भी हो आज की परिस्थितियों में जब तर्क और विज्ञान का युग है तब हमें तर्क और विज्ञान को अपना कार्य खुलकर करने देना चाहिए। उन्हें रोकना नहीं चाहिए। तर्क और विज्ञान को किसी अतार्किक बन्धन में या पूर्वाग्रह की बेडिय़ों में यदि जकड़ा गया तो इससे भारतीय धर्म के द्वारा हमें प्रदत्त वास्तविक भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता बाधित हो जाएगी। हमें न्यायसंगत दीखने के लिए न्यायसंगत बनना भी पड़ेगा।
गीता एक विश्व ग्रन्थ है
गीता का उपदेश कृष्णजी महाराज के द्वारा अकेले अर्जुन के लिए ही नहीं दिया गया है। कृष्णजी ने अर्जुन के माध्यम से अपनी बात तत्कालीन विश्व समाज के प्रत्येक ‘अर्जुन’ के लिए कही है। उन्होंने हर उस ‘अर्जुन’ को युद्ध जैसी विषम परिस्थिति में युद्धधर्म, राजधर्म, मानव धर्म और निज धर्म, समझाने का प्रयत्न किया है, जो समर क्षेत्र से भागना चाहता है और केवल इसलिए भागना चाहता है कि उसे उसके अपने लोग ही युद्ध क्षेत्र में खड़े दिखायी दे रहे हैं। उनसे वह युद्ध करना नहीं चाहता।
हर ‘अर्जुन’ यह भूल जाता है कि समर क्षेत्र में सदा लडऩे वाले अपने ही होते हैं। गैर तो गैर ही होते हैं, वे आपसे लडऩे नहीं आएंगे? ‘युद्ध’ तुम्हें अपनों से ही करना पड़ेगा और अपनों ही से अपनी रक्षा भी करनी पड़ेगी। जीवन में बड़ी से बड़ी घटना का आप निरीक्षण कीजिए वार करने वाले या पीठ में छुरा घोंपने वाले आपको अपने ही मिलेंगे। यहां तक कि 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ था-तो उस बंटवारे की मांग करने वाले भी अपने ही थे। अपनों ने ही देश बांटा और अपनों ने ही अपने लोगों को काटा। अत: निष्कर्ष यही है कि अपने ही ठीक रहने चाहिएं। जब हम अपनों से ये कहते हैं कि मुझे दूसरों से कुछ लेना देना नहीं है -मुझे तो तू ठीक चाहिए-तब इसका भी यही अभिप्राय होता है कि संकट अपनों से ही होता है और उस संकट को टालने के लिए अपनों को ही अपना बनाकर रखना चाहिए।
अपनों को अपना बनाकर रखने के लिए भारत की वैदिक संस्कृति ने पारिवारिक संस्कारों से लेकर राष्ट्रीय और वैश्विक संस्कारों तक का चिन्हीकरण कर उन्हें हमारे भीतर आरोपित करने का प्रयत्न किया है। हमें बताया गया है कि घर में शान्ति और एकता रखो, पड़ोसी से प्यार और अपनापन रखो, पड़ोसी देश से सम्बन्ध मधुर रखो इत्यादि। यह सारा खेल भी हमें इसीलिए बताया-समझाया जाता है कि अपनों से संभलकर रहना। यदि अपने अपने नहीं रहेंगे तो सर्वनाश हो जाएगा। कहा भी जाता है कि-‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।’
क्रमश:

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