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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-5

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-5

वैदिक गीता-सार सत्य
हम अपनों को अपना मानकर उधर से किसी हमला की या विश्वासघात की अपेक्षा नहीं करते। अपनों की ओर से हम पीठ फेरकर खड़े हो जाते हैं। यह मानकर कि इधर से तो मैं पूर्णत: सुरक्षित हूं। कुछ समय बाद पता चलता है कि हमारी पीठ पर तीर आकर लगता है और यह तीर भी किसी अपने का ही होता है। पर अब आप क्या कर सकते हैं अब तो ‘रामलीला’ पूरी हो गयी। संसार के जितने भर भी विश्वासघात हुए हैं, जितने भी वीर योद्घा युद्ध में मारे गये हैं, जितने भर भी छलप्रपंच, षडय़न्त्र इतिहास में सफल हुए हैं-उन सबके पीछे कोई ‘अपना’ ही बैठा होता है। जिन्हें आप दूध पिलाते हैं, वही आपको एक दिन फुंकार मारते हैं। आपको डसते हैं। उन्हें ही लोग ‘आस्तीन का सांप’ कहकर बुलाते हैं।
आप सार्वजनिक जीवन में उतरिये, आपको अपना कहकर अपनत्व दिखाने वाले बहुत मिलेंगेे। कुछ आपको बड़ा भाई मानेंगे, कुछ पिता तुल्य मानेंगे तो कुछ गुरू मानेंगे। पर ध्यान रखना कि ये बड़ा भाई, पिता या गुरू मानने वाले ही एक-एक करके आपका हाथ झटकते जाएंगे या आपका मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करते जाएंगे। इनके भीतर बैठा मानव इनसे क्या करवाता है?-इसे ये स्वयं भी नहीं जानते। इसका एक कारण यह है कि ये लोग समय और शब्द दोनों का मूल्य नहीं समझते। इनके लिए इन्हीं के कहे हुए शब्दों का कोई मूल्य नहीं होता और समय इनके लिए कोई महत्व नहीं रखता।
इन सारी परिस्थितियों में हम सब घिरे हुए हैं। हम सब ‘अर्जुन’ हैं, हम सबके सामने अपने खड़े हैं और हथियार लिये खड़े हैं। जंघाओं में हाथ मार रहे हैं-चाहते हैं कि आपसे दो हाथ हो जाएं। आप हतप्रभ हैं कि ये क्या हो रहा है? अपने ही लोग अपने ही भाई के सामने, अपने ही पिता के सामने और अपने ही गुरू के सामने इस अवस्था में क्यों खड़े हैं? क्यों ये लोग चुनौती दे रहे हैं? और क्यों यह हमारे पौरूष की परीक्षा लेना चाहते हैं? ऐसी स्थिति में आपको भी कोई ‘कृष्ण’ नैपथ्य से शिक्षा देता है कि-‘संसार इसी का नाम है। इसी को दुनिया कहते हैं। यहां सब ऐसा ही उल्टा-पुल्टा हुआ पड़ा है, इसी उल्टे-पुल्टे में से तुम्हें अपना मार्ग चुनना है।’
संसार के लोगों को समझना होगा कि इस मार्ग का नाम ही ‘गीता’ है। यह ‘गीता मार्ग’ हमें समस्या का समाधान देता है, जीने के लिए प्रेरित करता है, आत्मविश्वास पूर्वक हमारे विरूद्घ हो रहे गहरे षडय़ंत्रों का सामना करने की प्रेरणा देता है, और हर प्रकार के संकट से निकलकर हमें आगे बढऩे का साहस देता है। विश्व का हर वह व्यक्ति इस ‘गीता मार्ग’ का अनुयायी है जो अपने आसपास के अपनों के द्वारा बिछाये षडय़न्त्रों के जालों को काटने में सफल होकर अपना रास्ता बना रहा है या रास्ता बनाने में सफल रहा है। सारे संसार को गीता ज्ञान रास्ता बता रहा है, इसलिए यह एक ‘वैश्विक ग्रन्थ’ है। संसार इस ‘वैश्विक ग्रन्थ’ से ऊर्जान्वित हो रहा है, यह अलग बात है कि वह इसे ‘वैश्विक ग्रन्थ’ मानने को तत्पर नहीं है।
‘वैश्विक ग्रन्थ’ होने के लिए किसी ग्रन्थ को अपने कुछ मानकों पर खरा उतरना अनिवार्य होता है। जैसे उसकी शिक्षाएं विज्ञान सम्मत होनी चाहिएं, उसका दृष्टिकोण विज्ञान सम्मत होना चाहिए, उस ग्रन्थ की शिक्षाएं किसी सम्प्रदाय विशेष या किसी देश विशेष के लिए न होकर सबके लिए होनी चाहिएं, उसका ज्ञान किसी काल विशेष की सीमाओं में न बंधा होकर सार्वकालिक होना चाहिए और वह ग्रन्थ किसी भी प्रकार की संकीर्णताओं से ऊपर होना चाहिए।
जब हम गीता के ‘वैश्विक ग्रन्थ’ होने के दावे पर इन मानकों को लागू करके देखते हैं तो असीम प्रसन्नता होती है कि गीता विश्व स्तर पर ग्रन्थों की इस प्रतियोगिता में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करके उत्तीर्ण होती है। गीता का एक भी श्लोक आपको ऐसा नहीं मिलेगा-जिसकी शिक्षा साम्प्रदायिक हो या जो शेष विश्व के या किसी सम्प्रदाय विशेष से अलग के लोगों के लिए साम्प्रदायिक या जातिगत हिंसा फैलाने या ऊंचनीच का भेदभाव उत्पन्न करने का संदेश देती हो। गीता का हर शब्द विश्व मंगल की कामना से भरा हुआ है, वह दुष्टों का विनाश और सज्जनों का विकास चाहती है। विश्व की सारी राजनीति और सारे राजनीति शास्त्रों का निचोड़ और उद्देश्य भी यही है कि विश्व में दुष्टों का विनाश और सज्जनों का विकास हो। ऐसे में गीता को वर्तमान राजनीति का मार्गदर्शक ग्रन्थ माना जाए तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। गीता का रोम-रोम विश्व मानस से ओतप्रोत है।
हर व्यक्ति जीने की इच्छा रखता है, स्वतंत्र रहने की इच्छा रखता है और कुछ पाने की भी इच्छा रखता है। इन्हें संक्षेप में जिजीविषा, मुमुक्षा और लिप्सा कहा जा सकता है। इन तीनों से हर व्यक्ति सना है। व्यक्ति चाहे अमेरिका का हो, चाहे ऑस्टे्रलिया, अफ्रीका या भारत का हो सबकी यही मनोवृत्तियां हैं। विश्व के अन्य ग्रन्थ या धार्मिक पुस्तकें अपने-अपने ढंग से मनुष्य की इन मनोवृत्तियों पर प्रकाश डालती हैं। परन्तु गीताकार का दृष्टिकोण सबसे भिन्न है। वह ऐसा उपाय बताता है जो अमेरिका, ऑस्टे्रलिया अफ्रीका और भारत सहित विश्व के किसी भी देश या प्रदेश के लोगों की इन मनोवृत्तियों को एक साथ सबके अनुकूल बनाने की बात करता है।
गीता का संदेश है कि जीवन इस प्रकार जीओ जिससे सब आपके अनुकूल हों और आप सबके अनुकूल हों। कहीं तकरार न हो, कहीं रार ना हो, सर्वत्र प्यार हो और सदाचार हो। आपकी जिजीविषा ऐसी हो जो आपको मुमुक्षु बनाये और आपकी मुमुक्षा ऐसी हो जो आपकी लिप्सा को अपने आप में ही समाविष्ट कर ले। पाने की इच्छा तो कुछ ऐसा पाने की भी हो सकती है जो निकृष्ट हो, पापमय हो और अनैतिक हो। गीता पहले यही बताती है कि जो निकृष्ट है, पापमय है और अनैतिक है उसे छोडऩा है और जो कुछ उत्कृष्ट है, पुण्यमय है, नैतिक है-उसे पाना है। जो कुछ निकृष्ट है, पापमय है, अनैतिक है-उसे पाने के लिए किसी विशेष साधना की आवश्यकता नहीं होती, वह तो स्वयं भी मिल जाता है। पर जो कुछ उत्कृष्ट है, पुण्यमय है, नैतिक है-उसे पाने के लिए अवश्य ही साधना की आवश्यक होती है। यही कारण है कि गीता का मार्ग साधना का मार्ग है। पर यह साधना भी व्यक्ति विशेष की अपने लिए की जाने वाली साधना नहीं है। इस साधना के भी कुछ वैश्विक उद्देश्य हैं और उनमें सबसे उत्तम उद्देश्य है कि गीता की साधना सर्व समाज के उत्थान के लिए की जाने वाली साधना है। सब-सबके लिए साधना करें कि सबका कल्याण हो, सबको सद्विवेक हो और सबको सबके भले की चिन्ता हो यह सर्ववाद ही गीता की साधना का सार है। जिसने गीता का यह सार समझ लिया वह गीता के निष्काम कर्म जैसे अन्य गूढ रहस्यों को स्वयं ही समझ जाएगा और वह स्वयं को समाज का एक उपयोगी अंग बनाकर समाज के साथ मिलकर चलने लगेगा।
 इस प्रकार गीता की साधना व्यक्ति को समाजरूपी गाड़ी का एक महत्वपूर्ण पुर्जा बना देना चाहती है और समाज को व्यक्ति का वाहन बना देना चाहती है। दोनों का यह अन्योन्याश्रित भाव दोनों के कल्याण के लिए आवश्यक है। इस प्रकार गीता व्यक्ति को संसार से भागने के लिए प्रेरित नहीं करती और समाज को व्यक्ति के लिए अनुपयोगी सिद्घ नहीं करती, अपितु वह दोनों के समन्वय में ही संसार का भला देती है, इसी में दोनों का लाभ देखती है। लाभ और भला सबको अच्छे लगते हैं, और यही गीता हमें देती है। विश्व के प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसे लाभ हो और उसका भला भी हो। गीता से वह इन दोनों चीजों को पाकर बड़ा धनी बन सकता है। भारत के अनेकों महापुरूषों ने गीता के मोतियों को पाकर धनी होकर दिखाया है। यही उसकी सबसे बड़ी शिक्षा है और यही उसे विश्व का सर्वाधिक उत्तम ग्रन्थ बनाने की सामथ्र्य रखता है।
क्रमश:

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