सृष्टि का बनना बिगड़ना व कर्म प्रवाह अनादि है*

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प्रस्तुति Dr DK Garg
लेखक: देवेंद्र आर्य एडवोकेट

पहले अंक में आपको बताया कि ईश्वर ने पहली बार सृष्टि बनाई तो कर्म कहां से आये ?

इस लेख में तीन मुख्य बाते थी की ईश्वर ,जीव और प्रकृति हमेशा से है और कभी समाप्त होने वाले नहीं है।

प्राकृति की मदद से जीव अपने कर्मो के अनुसार शरीर धारण करता है इसलिए मनुष्य को कर्म योनि और पशु को भोग योनि कहते हैं।ईश्वर सत चित और आनंद स्वरूप है ।
आगे :
सृष्टि का बनना बिगडना व कर्म प्रवाह से अनादि हैं ।

जीव से ईश्वर ,ईश्वर से जीव और इन दोनों से प्रकृति भिन्न स्वरूप हैं। ईश्वर और जीव दोनों चेतनता तथा पालन आदि गुणों में समान हैं। ईश्वर जीव और प्रकृति इन तीनों के गुण, कर्म व स्वभाव भी अनादि हैं। ईश्वर जीव व प्रकृति को जगत का कारण भी कहते हैं । इसलिए जगत का कारण भी अनादि हुआ। ईश्वर, जीव, प्रकृति के बिना जगत की उत्पत्ति एवं पूर्णता नहीं। यह पहले से तीनों होंगे तभी जगत होगा।

प्रकृति को भी जगत का कारण क्यों कहते हैं?

समस्त ब्रह्मांड की रचना प्रकृति के तीन तत्वों सत, रज , और तम से हुई है। इन्हीं तीन तत्वों सत ,रज और तम के कारण से यह जगत बना है। सूर्य ,चंद्रमा, पृथ्वी, तारे, आकाशगंगा जितना भी हम स्थूल जगत आंखों से देखते हैं वह सभी प्रकृति के मूल तत्व सत ,रज और तम से बने हैं।
वैशेषिक दर्शन में सत ,रज और तम को गुण बताया गया। इसलिए गुण अथवा तत्व से भ्रमित न हों।
इसलिए सांख्य दर्शन में ये जगत के तीन कारण कहे जाते हैं।
यहां प्रसंगानुकूल कारण का अर्थ है कि जो कोई वस्तु किसी वस्तु के बनाने में प्रयोग होती है जिस वस्तु से कोई वस्तु बनाई जाती है वह कारण है और जो वस्तु बन जाती है वह कार्य है। सामग्री के रूप में प्रयोग की जाती है अर्थात मेटेरियल मानी जाती है, वह कारण है। जैसे आटा से रोटी बनती है तो रोटी का कारण आटा है । आटे का कारण गेहूं है। आटा से जो रोटी बनी वह उसका कार्य है। गेहूं से जो आटा बना वह गेहूं का कार्य है। प्रकृति के तीन तत्वों को लेकर ईश्वर ने जो पूरा ब्रह्मांड रचाया है , यह प्रकृति का कार्य है ।

इस प्रकार यह तीनों अनादि सत्ताएं हैं।
1 चेतन ,निरतिशय ज्ञानवान, सर्वाधिष्ठाता ,स्वामी सत्ता।
2 चेतन परिधिमय, अल्प ज्ञानवान, आधीन सत्ता।
3 चेतनातिरिक्त, स्वज्ञानानुभव रहित ,त्रिगुणात्मक ( सत, रजस, तमस) सत्ता जिससे ब्रह्मांड के तत्वों में पदार्थों के सूक्ष्म से सूक्ष्म रचना एवं उनके विनाश का क्रम चलता रहता है।

ईश्वर:
इन तीनों में स्वामी सत्ता सर्वशक्तिमान है,सर्वाधार है,निष्काम हैं,वही आदि मूल बार-बार रचना करने वाली शक्ति है,वह अजर, अमर ,अभय है। वह किसी का सेवक नहीं है,किसी का पुत्र नहीं है,वह किसी से निर्मित होने वाला भी नहीं है,निराकार ,निर्विकार है जो किसी परिधि में नहीं बंधा जो सब को अपने अधीन रखता है इसलिए उसको सर्वाधिष्ठाता ईश्वर कहते हैं।
ईश्वर में मुख्य गुण हैं दया, , परोपकार ,न्याय आदि ईश्वर के कर्म हैं। इसीलिए ईश्वर भी एक द्रव्य है।

जीव:
जीव भी चेतन तत्व है लेकिन वह अल्पज्ञ है। उसे ज्ञान का आधार चाहिए। वह जन्म मरण रूपी कालचक्र में बंधा है। उसका ज्ञान भी परिणामी है। ऐसी परिधियों से या उन बंधनों से मुक्त होने से ही उसका कल्याण है। अतः वह सकाम है ।सुख-दुख युक्त है। राग -द्वेष बंधयुक्त है ।संसार में उसे रहना पड़ता है। वह इसमें रहकर अपने ज्ञान, वृत्ति एवं पूर्व कर्मफल अनुसार जाति,आयु, भोग को प्राप्त होता है ।

यजुर्वेद ने इसका वर्णन एक मंत्र बड़े रोचक ढंग से किया है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समान वृक्षम परिषष्वजाते ।
तयोरन्य पिप्पलम स्वादवत्तनश्नन्नन्य अभिचाकशीति
ऋग्वेद 1/164/20

भावार्थ—
दो पक्षी हैं और दोनो साथ साथ रहते हैं। परस्पर मित्रता भी है। एक ही वृक्ष पर दोनों का निवास है ।उनमें से एक उस वृक्ष के फलों को भोग करता है । दूसरा फलों को न खाता हुआ अपने मित्र को अच्छी प्रकार देखता रहता है ।
इसलिए जीव जगत में आकर फंसता है, क्योंकि वह प्रकृति के भोग में पड़ जाता है। इसी कारण से जीव ईश्वर को भूल जाता है। रजस और तमस के कारण अंधकार में भटक जाता है।
इस मंत्र में जिन दो पक्षियों को बताया गया है ,वह जीवात्मा और परमात्मा रूपी ही दो पक्षी है। जीवात्मा प्रकृति रूपी वृक्ष के फलों को भोग करता है। परंतु परमात्मा भोक्ता नहीं है ।वह सर्व दृष्टा रूप में हम सब को देख रहा है। जीव ही पाप पुण्य करता है। जीव ही पाप और पुण्य का कर्म भोग भोक्ता है। इसलिए जीव आत्मा साक्षी नहीं बल्कि परमात्मा साक्षी है।
क्योंकि परमात्मा सर्वत: चक्षुओं से पूर्ण है । उसकी दर्शन शक्ति (त्रिकालज्ञता) सर्वत्र विद्यमान है ।उसकी मुख् वत पदार्थों को ग्रहण कर रूपांतर करने एवं जीवन दान करने की शक्ति सर्वत्र विद्यमान है। उसकी सब को ग्रहण करने और दान करने की विविध कलामय हाथ की शक्ति सर्वत्र विद्यमान है। वह सर्वत्र स्थानों में स्थिर व्याप्त पहुंचा(रमा, सर्वांतर्यामी, सर्वव्यापक) हुआ है। इन्हीं अपनी महान सर्वत्र व्याप्त शक्तियों से वह अकेला ही त्रिलोकी की रचना करता है।
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात
सं बाहुभ्यां धमति सं पत् त्रैद
द्यावाभूमीं जनयन्देव एकं
(यजुर्वेद 17 / 19)

भवार्थ:जो सूक्ष्म से सूक्ष्म, बड़े से बड़ा निराकार, अनंत समर्थ वाला, सर्वत्र अभिव्यक्त प्रकाश स्वरूप अद्वितीय परमात्मा है। वहीं अति सूक्ष्म कारण से स्थूल कार्य रुप जगत के रचने और विनाश करने को समर्थ है ।जो पुरुष इसको छोड़ अन्य की उपासना करता है उससे अन्य जगत में भाग्यहीन कौन पुरुष है।

  1. प्राकृति :

प्रकृति में चेतना नहीं है। न उसको अपना स्वयं का ज्ञान है ।न उसको अनुभव है। लेकिन ब्रह्मांड के सूक्ष्म से सूक्ष्म और विशाल से विशालतम रचना में प्रकृति का विशेष महत्व है।
प्रकृति के बिना ब्रह्मांड की रचना संभव नहीं जैसा कि ऊपर कहा गया है कि प्रकृति जगत का कारण है।

प्रश्न

प्रकृति का लक्षण क्या है?

सत, रजस और तमस तीन वस्तुओं का जो संघात है (तीनों का एक साथ मिलकर के जो संघ बनता है उसको संघात कहते हैं)अर्थात जो सत, रज और तम का उत्पाद ( प्रोडक्ट) है उसका नाम प्रकृति है।
प्रकृति में कोई विकार नहीं आता क्योंकि प्रकृति तो अनादि है। अविकारिणी है ।परंतु उसकी सत्, ,रजस और तमस जो वस्तु बनती हैं, उनमें विकार आता है। इसीलिए यह संसार अथवा ब्रह्मांड तथा जीव अथवा प्राणियों का प्रकृति के तीन तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर विकार युक्त हैं । परंतु ज्ञातव्य है कि सत, रज और तम इन तीनों में विकार नहीं आते हैं। उनका मूल स्वरूप सदैव बना रहता है। इसी से संसार, जगत अथवा ब्रह्मांड एवं प्राणियों का शरीर परिवर्तनशील प्रत्येक क्षण होता है। लेकिन मूल प्रकृति अविकारिणी है। मूल प्रकृति के तीन तत्व सत रज और तम भी बिना विकार के हैं।प्रकृति इसीलिए नाशवान नहीं है प्रकृति इसलिए अजर अमर है।
सत शुद्ध है। रज मध्यम स्तर का है ,और तम जाड्य है।
रजस और तमस दोनों की प्रधानता होने के कारण जीव के स्थूल शरीर एवं ब्रह्मांड में जड़ता या मूर्खता अर्थात अपराध लूट ,हत्या, बलात्कार, चोरी ,डकैती के विचार अथवा कार्य तम और रज की प्रधानता के कारण होती हैं। तम का अर्थ यहां अंधकार से भी है ।जब बुद्धि पर अंधकार का पर्दा पड़ जाएगा तो वह उचित- अनुचित का भेद नहीं कर पाएगी। पाप में संलिप्त जीव हो जाएगा। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि
इन तीनों के साम्य से मिलने के पश्चात प्रकृति बनती है। इसीलिए सांख्य दर्शन में सत ,रजस, तमस तीन तत्व कहे जाते हैं।
अतः सिद्ध होता है कि प्रकृति के तीन तत्व सत ,रज और तम से बना जगत नाशवान है। प्रकृति शब्द की उत्पत्ति से ही उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है।
प्र अर्थात जो पूर्व से है।
कृति अर्थात जो संरचना है।
इसलिए प्रकृति का अर्थ हुआ कि जो पहले से ही बनी है। अर्थात इस जगत के उत्पन्न होने से पूर्व से ही बनी है। यहां पूर्व का तात्पर्य भी किसी कालगणना से बांधना नहीं है बल्कि वह अनादि है। इसी सिद्धांत के अनुसार प्रभू शब्द का संधि विच्छेद करने पर प्रभू के संबंध में कहा जा सकता है कि वह भी पूर्व से जो विद्यमान रहता है उसको प्रभु कहते हैं।

सत, रजस और तमस से ईश्वर ने शास्त्रोक्त नाम महतत्व (साधारण शब्दों में नाम बुद्धि) बनाई। बुद्धि से अहंकार पैदा हुआ।अहंकार से 5 तन्मात्राएं( जिन्हें शास्त्रों में पांच सूक्ष्म भूत भी कहते हैं)
दस इंद्रियां तथा 11वा मन बनाया।
5 तन्मात्राएं से पांच स्थूल भूत बनाए। यह 23 का समुच्चय (संघ) हुआ। इसमें 24 वीं मूल प्रकृति को और जोड़ दें। यहां तक अर्थात 24 तक सारे तत्व प्रकृति के हैं। (प्रकृति से निर्मित है ,प्रकृति जन्य है) इसलिए प्रकृति का महत्वपूर्ण योगदान शरीर के निर्माण में और ब्रह्मांड के निर्माण में है। इसलिए प्रकृति जगत का कारण है।
इसमें 25 वा पुरुष अर्थात जीव और परमेश्वर हैं।

इस प्रकार पुरुष के यहां दो अर्थ है। एक सामान्य पुरुष और एक परम पुरुष। सामान्य पुरुष जीव (मानव) है और परम पुरुष परमात्मा है।
जैसे वेदाहमेतम पुरुषम महान्तम आदित्य वर्ण: तमस:प्रस्तात कहा जाता है।
जिसका अर्थ है कि मैं उस परम पुरुष को जानता हूं ।यहां उस परम पुरुष को जानने का तात्पर्य परमात्मा को जानने से है।

जीव के शरीर में रजोगुण और तमोगुण की अधिकता अथवा प्रधानता होती है। सत, रज और तम प्रकृति के जो तीन तत्व हैं ।मूल प्रकृति जड़ है। इसलिए उसके तीन तत्व भी जड़ हैं । प्रकृति में अंधकार ही अंधकार है। इसी अंधकार के कारण अहंकार और अहंकार के कारण जीव किसी दूसरे जीव को कुछ समझता नहीं है। बस मैं ही हूं यह अहंकार है।

पतंजलि ऋषि के योग दर्शन में चित्त और मन एक ही वस्तु हैं। एक ही वस्तु के दो नाम हैं।
जैसे “योगश्चित्तवृत्ति निरोध:”कहा गया है । अर्थात चित्त की वृत्तियों का रोकना ही योग है।
शास्त्रों के अनुसार आत्मा एवं ईश्वर दोनों ही द्रव्य है। जिसमें गुण तथा क्रिया हो ,उसको द्रव्य कहा जाता है। आत्मा में गुण भी है और क्रिया भी है।

संदर्भ
महर्षि दयानंद कृत अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश ,यजुर्वेद भाष्यम ,सांख्य दर्शन, महर्षि पतंजलि का योग दर्शन।

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