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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

कैसे याद करें कर्मचंद को भारत के दुर्भाग्य गंध को*? ,

  • महावीरसिंह फोगाट
    प्रेमनगर रोहतक

भारत की सीमा पर बैठा सच्चा महात्मा अब्दुल गफ्फार खान चिल्लाया – हम किसी कीमत पर भी भारत मां के टुकड़े नहीं चाहते!!! पंजाब में गरीबों के मसीहा सर छोटुराम ने कहा- मैं अपने पंजाब को किसी कीमत पर भी नहीं बटने दूंगा!!!तुम कौन होते हो हमारी भावना के खिलाफ हमारे पंजाब को बांटने वाले ? चौ छोटुराम ने पंजाब के जन जन के समर्थन से जिन्ना को गिरफ्तार करने के आदेश दिए तो जिन्ना दुम दबाकर पंजाब से भाग गया। जब उसने बंगाल में जाकर हिंन्दुओं का कत्ले आम शुरु किया तब उस नकली महात्मा ने जिन्ना की गिरफ्तारी के लिए अनशन क्यों नहीं किया ? देश बंट रहा था तब अनशन क्यैं नहीं किया ? उसने स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा हिन्दू मुसलमानों के रूप में भाइयों से भाइयों को मिलाने के लिए चलाए गए शुद्धि आन्दोलन का समर्थन न करके उसका तीव्र विरोध करके मुसलमानों को भड़काकर देश तोड़ने की राह क्यों पकड़ी?और *स्वामी श्रद्धानन्द जैसे देवता रत्न को मरवाने का वातावरण क्यों बनवाया ? देश के टुकड़े होते रहे ? भयंकर रक्तपात होता रहा ? लेकिन महात्मा का प्यारा,गयासुद्दीन का छद्म पोता जवाहरलाल भागकर गद्दी पर बैठ गया !उधर जिन्ना गद्दी पर बैठ गया! तीसरी ओर शेख अब्दुल्ला कश्मीर पर बैठा दिया? हमारी कटी पूंछ पाकिस्तान में क्या ताकत थी कि उसने विशाल भारत पर हमला कर दिया? तब वह महात्मा अपने भक्तों को लेकर कश्मीर मोर्चे पर क्यों नहीं पहुंचा? कि लो हमको मार दो और पूरा भारत ले लो! सच्ची अहिंसा तो यही होती! दुनियां को पता लगता गांधी सच्चा महात्मा है! लेकिन उसने हमले की निंदा करना तो दूर अनोखी सत्य अंहिंसा की झूठी अलख जगाने के लिए पापी पाकिस्तान को 50 करोड़ रुपए देने के लिए अनशन कर दिया!!!जबकि उसकी बनाई भारत सरकार और देश का बच्चा बच्चा और पत्ता पत्ता और कण कण इसके विरुद्ध था!!! फिर भी महात्मा के चोले में छिपे बैठी उसकी क्रूरतम कसाई आत्मा ने अपना जघन्यतम क्रूर कुकर्म करके ही दम लिया!!! और करने योग्य काम आने पर कहता रहा कि – मेरी कोई नहीं सुनता??? उसकी दुष्ट आत्मा में तनिक भी मानवता और न्याय से प्रेम होता तो वह कह सकता था कि – यदि पाकिस्तान कश्मीर खाली कर देगा तथा अपनी गलती मानकर भारत से क्षमा मांगेगा और बड़े भाई भारत से आगे से प्रेम और सच्चाई का व्यवहार करेगा तभी उसे 50 करोड़ की राशि मिल सकती है ! नहीं तो वह राशि किसी स्थिति में भी नहीं मिलेगी !!! लेकिन इस छद्म महात्मा ने तो अपनी काली करतूतों से मानवता की बोटी बोटी काटनी ही थी !!! जीवन भर हिन्दुओं के न्याय की कीमत पर कट्टरपंथियों को मनाता रहा! खुश करता रहा! लेकिन वे जरा भी नहीं माने ! जबकि जिसकी मुसलमान भाई मानते जा रहे थे उस धरती के देवता स्वामी श्रद्धानन्द के भाईचारे के अभियान शुद्धि आन्दोलन का तीव्र विरोध करके कट्टरपंथियों को भड़काकर उस सच्चे मानवता के पुजारी की हत्या का वातावरण तैयार कर दिया!
कट्टरपंथियों को उनके हक से 3% अधिक क्षेत्र दिला दिया । फिर भी झगड़े की जड़ कट्टरपंथियो को हक देने के बाद भी यहीं रख कर लिया। अब हजारों सालों तक लड़ते रहो अंदर और बाहर के कट्टरपंथियों से, और रोते रहो उस छद्म महात्मा के कुकर्मों को!!! और फिर भी कुछ लोग उसे महात्मा ही समझ रहे हैं? वह मानवता से अनभिज्ञ, महामूर्ख, हिंसा और अहिंसा में संतुलन ही नहीं कर पाया!!! शुरु में उसके अहिंसा आन्दोलन से लाभ हुआ लेकिन बाद बाद में वह अपनी मूर्खतापूर्ण अन्यायकारी अहिंसा से सत्यानाश ही करता चला गया! आश्चर्य तो यह है कि पटेल,डा राजेन्द्रप्रसाद डा राधाकृष्ण जैसे लोगों ने भी किस कारण से डटकर उसका विरोध नहीं किया? वे भीष्म पिता के समान चुप बने रहे। उसके गलत कारनामों के सामने क्यों विवश बने रहे ? यह हमें बहुत बहुत खोजने पर भी आज तक समझ में नहीं आया???
उस कथित महात्मा ने ही जिन्ना जैसे देशभक्त धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति को कट्टर पंथी बनने पर मजबूर किया! जरा इतिहास को समझकर तो चलो! जब कांग्रेस की सरकार केवलमात्र एक मत की कमी से नहीं बन रही थी तब जिन्ना ने समर्थन देना चाहा तो उसका समर्थन नहीं लिया गया ! जिन्ना ने अपने विधायक से त्यागपत्र दिलाकर दोबारा चुनाव में कांग्रेस की विजय कराई, लेकिन फिर भी जिन्ना को कभी मान सम्मान ही नहीं दिया गया! जिन्ना ने कर्मचंद को बार बार आगाह किया कि आप खिलाफत आन्दोलन चलाकर कट्टरपंथियों को पाल रहे हो! ये देश का नुकसान करेंगे! क्योंकि कर्मचंद अंग्रेजों की योजना के अनुसार जवाहरलाल को ही प्रधान मंत्री बनाने का लक्ष्य लेकर शुरु से ही चल रहा था। वह किसी कीमत पर भी हिन्दू और मुसलमानों की पसन्द जिन्ना को आगे बढ़ने देना नहीं चाहता था! उसने सुभाष जैसे विश्वमानव प्रतिभा के धनी ,परम साहसी , निडर, भारत मां के अनोखे वीर को भी यों ही आगे नहीं आने दिया ! जो भी त्यागी तपस्वी देशभक्त देश कल्याण के लिए आगे बढ़ा उसी की टांग खींचता रहा।अपनी मूर्खतापूर्ण हठधर्मिता से देश उन्नति के मार्ग में कांटे बिछाता रहा!!! और आखिरकार देश के टुकड़े कराके भी संतुष्ट नहीं हो रहा था!!! लाहौर हिन्दू बहुल था।
आर्यसमाज और शिक्षा का गढ था,लेकिन महान् आत्मा कर्मचंद को वह नहीं सुहाया !
उस शिक्षाऔर क्रान्तिकारियों की महान् स्थली को उजाड़ कर भी नहीं रुका !!! क्योंकि वह आर्यसमाज जैसे पवित्र और दृढ़ संगठन को बहुत बुरा मानता था!!! इसलिए उसे उजाड़ दिया!!!
भारतीय लोगों की आंखें आज भी नहीं खुल पाई हैं! वे इतिहास को पढ़ते ही नहीं!सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करके भेड़चाल चलते रहते हैं ! उस कर्मचंद ने अंग्रेज और जवाहरलाल के मनसूबे पूरे किए, इसलिए उन्होंने उस छलिया को राष्ट्रपिता भी घोषित कर रखा है!!! अधिकांश भारतीय तो उसे राष्ट्र हत्यारा ही समझते हैं! भले ही उज्जगर होकर नहीं कह पाते हैं!क्योंकि आज तक भी बड़े बड़े पदों पर उनके भक्त ही बैठे हुए हैं! जो आज भी अंग्रेज देशों के संकेतों पर काम करते हैं! भोली जनता हमेशा भेड़चाल चलती रहती है। लोगों को बहकाने वाले अनगिनत नकली साधु संत जेलों में पड़े हैं, लेकिन भोले लोग आज भी उनके अनुयायी बने हुए हैं! यही कर्मचंद के साथ है! कर्मचंद के कमों को देश भुगत रहा है! हजारों सालों तक भुगतता रहेगा! लेकिन फिर भी उसे महात्मा कहे जाने वाले भी जिंदा रहे रहेंगे!!! यह कुछ प्रकृति का ही नियम सा है! अंग्रेजों के संकेत पर ही कांग्रेसियों के पोते पडौतों ,दोहते दोहतियों तक को पेंशने दी जाती हैं! देश पर बलिदान होने वाले असली देशभक्त क्रान्तिकारियों की पेंशन तो दूर उनके तो नाम और स्मारक भी नहीं हैं ; लेकिन सब जगह असली नकली फसली गांधियों के स्मारकों से भारत की धरती अंटी पड़ी
है!!! महान् देशभक्तों के परिवार कंगाली में जीवन यापन करके भारत मां से विदा हो गए। जबकि गद्दारों को मुरब्बे मिले हुए हैं। यदि देश इतिहास को जान पाता तो आजादी के बाद ऐसे लोगों के मुरब्बे छीने जा सकते थे!!! लेकिन आज भी ऐसे लोग जनता पर दनदना रहे हैं ?

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