मौसम के बदलते मिजाज़ को समझना ज़रूरी है

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नितिन बिष्ट

नैनीताल, उत्तराखंड

जोशीमठ में जो कुछ भी हो रहा है, वह प्राकृतिक आपदा तो बिल्कुल भी नहीं है. विकास के नाम पर विनाश की यह नींव हम इंसानों ने ही रखी है. इसकी शुरुआत कोई एक दो साल पहले नहीं हुई है बल्कि दशकों से यही सब होता आ रहा है. ऐसा नहीं है कि किसी ने हमें इसके दुष्परिणाम के बारे में नहीं बताया था. पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई समितियों की हज़ारों रिपोर्टें कहीं धूल खा रही हैं जिसमें उन्होंने विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ के प्रति चेताया था. लेकिन उन्हें विकास विरोधी कह कर उनकी चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. परिणाम धीरे धीरे सबके सामने आ रहा है.

जोशीमठ आपदा केवल पहाड़ों तक सिमित नहीं है बल्कि इसके अलग अलग रूपों में दुष्परिणाम हम अन्य क्षेत्रों में भी देख रहे हैं. कहीं ज़मीन खिसक रही है तो कहीं बेमौसम बारिश या ओले गिर रहे हैं. कहीं तापमान शून्य तो कहीं अत्यधिक तापमान का रिकॉर्ड टूट रहा है. पिछले कुछ वर्षों में धरती का तापमान अपेक्षाकृत बढ़ता ही जा रहा है. समय से पहले गर्मी का आना और मई-जून में औसत से कहीं अधिक तापमान का बढ़ना यह सब बता रहा है कि प्रकृति हमारे विकास के मॉडल से बिल्कुल भी खुश नहीं है. इस वर्ष के आरंभ में जिस प्रकार राजस्थान के कई इलाकों में तापमान शून्य से भी 4 डिग्री नीचे चला गया और पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों के लोग सर्दी से कांप गए, यह बताता है कि हमें अपनी विकास की योजनाओं की फिर से समीक्षा करने की ज़रूरत है.

हिमालय पर्वत, एशिया का जलवायु नियंत्रक होने के बावजूद स्वयं ही तप रहा है तो फिर महानगरों का झुलसना स्वाभाविक है. पिछले वर्ष दिल्ली का तापमान 41 तो राजस्थान के धौलपुर में 51 डिग्री सेल्यिस को पार कर गया था. यदि प्रति वर्ष इसमें ऐसे ही उछाल जारी रही तो किसी अनिष्ट की कल्पना सहज ही की जा सकती है. केवल महानगर ही इससे प्रभावित नहीं है बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में भी इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है. अक्सर मैदानों से पहाड़ो की ओर पर्यटकों का आगमन पर्वतों की खास आबोहवा के लिए होता है. जलवायु परिवर्तन ने पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड के मौसम का मिजाज भी बदल दिया है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पिछले वर्ष के आंकड़ों में देशभर में रिकॉर्ड किये गये 203 हीट वेव लू वाले दिनों में से 28 अकेले उत्तराखण्ड के रहे हैं. यह बहुत ही चिंता का विषय है. गुणात्मक रूप से हीट वेव हवा के तापमान की एक स्थिति होती है जो मानव शरीर के लिए घातक हो जाती है. वर्ष 2021 में देश में मात्र 36 लू वाले दिन रिकार्ड किए गए थे जबकि 2022 में यह आंकड़ा पांच गुना अधिक रिकॉर्ड किया गया है.

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट संघ की इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की चौथी रिपोर्ट में सन् 2035 तक हिमालयी ग्लेशियरों के लुप्त होने की बात तक कही गयी है. यानि अगले 12 वर्षों में हिमालय के अधिकतर ग्लेशियर पिघल चुके होंगे. क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मनुष्य को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी? जलवायु परिवर्तन के कारण सदियों में गर्मी, गर्मियों में तेज बारिश व मानसून के बीतने के बाद आपदा ने उत्तराखंड को काफी प्रभावित किया है. पर्यावरण पर आधारित पत्रिका डाउन टु अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार 01 अक्टूबर 2020 से 04 जनवरी 2021 तक राज्य में आग की 236 घटनाएं सामने आयी थीं. चरम सर्दियों के मौसम में नैनीताल स्थित ओखलकांडा विकास खंड के जंगलों में लगने वाली आग जलवायु परिवर्तन का ज्वलन्त उदाहरण है.

राज्य में पिछले वर्ष फरवरी माह में हिम-स्खलन, मई में बादल फटने की घटनाएं, आपदाएं, सदियों में पिघलते ग्लेशियर के रूप में जलवायु परिवर्तन के कई रूप देखने को मिले हैं. ओखलकांडा विकास खंड स्थित ग्राम सुन्दरखाल के बागवानी के काश्तकार सोबन सिंह जलवायु परिवर्तन पर अपने अनुभवों को सांझा करते हुए बताते हैं कि विगत 8 से 10 वर्षों से मार्च-अप्रैल के महीने में किसानों की बागवान अत्यधिक वर्षा और बर्फबारी से प्रभावित हो रही है. पिछले वर्ष अप्रैल में हुई तेज वर्षा और ओलावृष्टि के चलते बागवानी करने वाले काश्तकारों को निराश होना पड़ा था. यह समय फूलों की सेटिंग और फलों के बनने का होता है, लेकिन बर्फबारी से सारे फूल झड़ गये. वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में सब्जियों व अनाजों की नर्सरी वाले किसानों को भी इससे काफी नुकसान उठाना पड़ा था.

जलवायु परिवर्तन इस समय सभी देशों के लिए ज्वलन्त मुद्दा है, इसका प्रभाव हर जगह देखने को मिल रहा है. लेकिन पर्वतीय/हिमालयी क्षेत्र सबसे अधिक इससे प्रभावित हो रहे हैं. क्षेत्र में फसल उत्पादन के समय में भी अंतर आ गया है. पतझड़ जो पहले अक्टूबर में हुआ करता था वह अब नवम्बर, दिसम्बर में हो रहा है. पर्वतीय इलाकों में हो रहे बडे बडे निर्माण कार्य व वाहनों की अत्यधिक आवाजाही से कार्बनिक कणों की मात्रा बढने से भी प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है. दिन व रात के तापमानों में बदलाव होने से तापमान का स्तर भी अनियंत्रित होने लगा है. एक समय घारी की वादियों से हिमालय पर्वत को देखना आसान था, लेकिन आज प्रदूषण के कारण इसका दर्शन करना दुर्लभ सा हो गया है.

नैनीताल में फूलों की खेती करने वाले दीपक सिंह के अनुसार जलवायु परिवर्तन का असर फूलों के खिलने, उसके गंध व रंग में भी देखने को मिल रहा है. विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी में पिछले वर्ष जून में सिर्फ एक दर्जन प्रजातियों के फूल ही खिल सके जबकि आम तौर पर यहां 50 से अधिक प्रजातियों के फूल इस समय खिलते थे. इस वर्ष उनकी स्वयं की फूलों से आय में 45 प्रतिशत की कमी हुई जिसका कारण समय फूलों का न होना था. भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के अनुसार पूरी दुनिया में 4.5 लाख ऐसी वनस्पतियां पाई जाती है जिसमें फूल खिलते है. जिसमें भारत में 40,000 प्रजातियां है जो निर्धारित समय में खिला करते थे. वह आज समय से पहले या बाद में खिल रहे है. जिसमें उत्तराखंड का राजकीय पुष्प ब्रह्म कमल भी शामिल है.

वास्तव में, हिमालयी क्षेत्रों में विकास के नाम पर कंक्रीट से तैयार होते भवन और वाहनों की अत्यधिक वृद्धि से समूचे पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. दो वर्ष पूर्व हिमालयी क्षेत्रों में हुए शोध में कई चिंताजनक परिणाम सामने आये हैं. इसमें यह बताया गया है कि इस क्षेत्र में 30 फीसदी कार्बन की मात्रा बढ़ने से तापमानों में असमय वृद्धि हो रही है. जिससे यहां की जलवायु, फसल उत्पादन और पर्यटन के क्षेत्र में काफी असर हुआ है. यदि समय रहते कार्बनिक गैसों के उत्सर्जन और निर्माण कार्य की रफ़्तार पर अंकुश नहीं लगाया गया तो भविष्य में इससे भी भयानक परिणामों को झेलना पड़ सकता है. (चरखा फीचर)

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