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आज का चिंतन

विष्णु आख्यान, भाग — 5

Dr D K Garg

राम को विष्णु क्यों कहा गया है?
ईश्वर अवतार नही लेता ,ईश्वर सर्वशक्तिशाली है और समस्त भू- लोक में एक ही समय में विराजमान है , अवतारवाद पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है ।
राम विष्णु के अवतार थे इस बात का उत्तर इसी वाक्य में छिपा है कि राम विष्णु थे? या विष्णु तुल्य थे? ये बात कहा से शुरु हुई इसकी भी पड़ताल जरूरी है। इस विषय में कुछ अन्य प्रश्न सामने आए:

1.क्या राम को पता था कि वो विष्णु के अवतार थे?
2.वाल्मीकि के राम को पता नहीं था कि वे विष्णु के अवतार हैं किन्तु तुलसी के राम को कैसे पता लगा कि राम विष्णु के अवतार है ?

3.श्री राम यदि स्वयं श्री विष्णु भगवान के अवतार थे और आदि अनन्त सबके ज्ञाता थे तो उन्होंने लंका विजय के पश्चात सीता जी की अग्नि परीक्षा क्यों करवाई?
4.क्या रामायण काल में अयोध्या के लोगों को पता था कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं?
विष्लेषण;

राम के विषय में बाल्मिकी की रामायण एक प्रमाणिक इतिहास ग्रंथ है ,इसके कई हजार साल बाद कुछ कवियों ने राम को लेकर महाकाव्य की रचना की जिसमे प्रचुर मात्रा में उपमा और अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग किया,बाद में कुछ वामपंथी और नास्तिक भी रामचरित लिखने लगे इस कारण से रामायण में भरपूर मिलावट हुई है।
1.रामायण काल मे अयोध्या के लोगो को नही पता था कि ईश्वर ने मानव के रूप में जन्म लिया । फिर अचानक। इन कवियों के कैसे ज्ञात हुआ कि श्री राम वाकई विष्णु अवतार थे?
यह कुछ लोगों की, या यह कहें कि पुराणों की अपनी मान्यता है । वरना रामायण पढ़ने से तो यही ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌सिद्ध होता है कि राम एक आदर्श राजा और मर्यादा पुरुषोत्तम थे ।

2.विष्णु अर्थात् ईश्वर , ईश्वर अर्थात् सच्चिदानन्द और सुखस्वरूप । जहां दुःख का लेशमात्र भी नहीं है । जबकि सीता की खोज में भटकते हुए राम कहते हैं कि यह दुःख मेरे पूर्व जन्म का ही फल है । ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌

3.ईश्वर सर्वज्ञ हैं । ऐसे में सीता का पता क्यों नहीं लगा पाए ? और यदि पता था तो इस प्रकार का मिथ्या आचरण क्यों ?
इसी प्रकार की अनेक बातें हैं जिनसे सिद्ध होता है कि राम ईश्वर नहीं थे । वेद भी कहते हैं कि ईश्वर कभी भी शरीर धारण नहीं करता और न ही अवतार ग्रहण करता है ।
क्या राम को विष्णु की उपाधि से सम्मानित किया गया है?

जय -विजय अर्थात ज्ञान और विवेक दोनों विष्णु के गण हैं।जब हम अपने राष्ट्र के राष्ट्रवादी बनकर दूसरे राष्ट्रों पर विजय करना चाहते हैं तो उस समय हम जय और विजय को अपने समीप लाते हैं। जैसे एक राजा दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करता है। और सत्य मार्ग का पालन करता हुआ जब विजय की घोषणा करता है तब वह भी विष्णु बन जाता है ।विष्णु बन करके अपने राष्ट्र को उत्तम बनाता है। राष्ट्र में मर्यादा स्थापित करता है ,दुनिया में उस राष्ट्र की प्रतिष्ठा के साथ जब वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाला चालक ,संचालक होता है तो उसकी विष्णु की सी महत्ता मानी जानी चाहिए।
महाराज राम इसीलिए विष्णु बन कहलाए।
राम वशिष्ठ मुनि के आदेशानुसार माता की आज्ञा पाकर राज पाठ त्याग कर भयंकर वन को चले गए। परंतु वह कैसा विचित्र महापुरुष था ।उन्होंने महर्षि भारद्वाज मुनि महाराज से यही कहा कि महाराज मैं विजय कैसे प्राप्त कर सकता हूं ? महर्षि भारद्वाज बोले कि हे राम ! आज तुम विजय प्राप्त करना चाहते हो तो विष्णु बनो , और जय और विजय दोनों को अपनाने का प्रयत्न करो। देखो ! नीतिज्ञ बनो।जिससे तुम्हारी विजय हो जाए ।जो आतातायी है,आक्रमणकारी है वह नष्ट हो जाना चाहिए । भारद्वाज के इस विचार ने भगवान राम के आंगन में ऐसा स्थान ग्रहण कर लिया कि उसी वाक्य को उन्होंने अपने में धारण किया ।धारण करने के पश्चात उन्होंने दोनों जय विजय अर्थात ज्ञान और विवेक का मिलान किया। मिलान करने के उपरांत विष्णु रूप धारण किया और रावण का वध करके उसके भाई विभीषण को राज्य तिलक किया।
जो राजा विष्णु नहीं बन सकता।अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा को ऊंचा नहीं बना सकता तो उत्तम ब्राह्मण समाज को चाहिए कि उस राजा को राष्ट्र से दूर कर दे जो ज्ञानी और विवेकी न हो ।यहां विष्णु बनाने की ही तो विचारधारा है ।इसलिए समाज में भी विष्णु बनने की सदैव आवश्यकता रहती है ।
विष्णु बन करके ही तो विजय पाई जाती है ।विष्णु नाम मानव की प्रवृत्तियों पर संयम करना भी होता है। परंतु ज्ञान से ही प्रवृत्तियों का शोधन किया जाता है। वे शोधन की हुई प्रवृत्ति है उन्हीं से जय और विजय की दोनों की घोषणा की जाती है।
विवेक से ही मानव संसार को विजय कर लेता है केवल भौतिक विष्णु बनने से हम एक राष्ट्र की ही विजय प्राप्त कर सकते हैं।
जब आध्यात्म के विष्णु बन जाते हैं तो हम संसार पर विजय करने लगते हैं। संसार में हमारी प्रतिष्ठा हो जाती है संसार हमारी उस महता के आंगन में रमण करता रहता है। संसार में आकर अपनी मानवीय धारा को विचित्र बनाने का प्रयास करें ।मानव जीवन कैसे ऊंचा बनता है ? जब ज्ञान और विवेक मानव के समीप होगा ।विवेक और ज्ञान ही जय और विजय कहलाते जो विष्णु के गण हैं।

राम एक आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम थे ,इसलिए हो सकता है की अति सम्मान के रूप में , उपाधि के रूप में उनको सच्चा ईश्वर पुत्र ,विष्णु पुत्र कहा गया हो और समय के साथ सीधे विष्णु का अवतार ही बता दिया हो। इस पर इतना ही समझना चाहिए।

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