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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-39

गीता का छठा अध्याय और विश्व समाज

श्री कृष्णजी की बात का अभिप्राय है कि बाहरी शत्रु यदि बढ़ जाते हैं तो योगी भी भयभीत हो उठते हैं। ये बाहरी शत्रु ऐसे लोग होते हैं, जो दूसरों को शान्तिपूर्ण जीवन जीने नहीं देते हैं। उनके भीतर उपद्रव होता रहता है तो उनके जीवन में भी उपद्रव ही उपद्रव दिखायी देने लगते हैं, ऐसे लोगों का सफाया किया जाना आवश्यक होता है। यही काम दुर्योधनादि कर रहे हैं। अत: अर्जुन के लिए यह उचित है कि वह उपद्रवकारियों और उन्मादियों या उग्रवादियों के विरूद्घ उठ खड़ा हो। जब तक ये बाहरी शत्रु अर्जुन के लिए खड़े हैं तब तक वह आंख बन्द करके नहीं बैठ सकता। उसके क्षात्र धर्म का तकाजा है कि वह अपने बाहरी शत्रुओं की सेना को समाप्त करे और फिर निश्चिन्त होकर अपने भीतरी जगत के शत्रुओं को मारकर शान्ति का अनुभव करे। 
योगी की स्थिति की चर्चा करते श्रीकृष्ण जी आगे कहते हैं कि अपनी पीठ, सिर और गर्दन को सीधा करके और अचल रखकर अर्थात बिना हिले-डुले स्थिर होता हुआ नासा के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर अन्य किसी दिशा में न देखते हुए वह प्रशान्त मन वाला होकर भयरहित, ब्रह्मचर्य के व्रत में टिका हुआ, मन का संयम करके ईश्वर में ही चित्त गाड़ कर बैठता है। ऐसी अवस्था में ही योगी को परमशान्ति का अनुभव होता है। उस अवस्था में योगी का बाहरी जगत से सम्पर्क कट जाता है और वह भीतरी जगत में जाकर आनन्द लेने लगता है। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि जो व्यक्ति अर्थात योगी इस प्रकार मेरे साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है और अपने आपको इस प्रकार मुझे समर्पित कर देता है, जिसका मन उसके वश में हो गया है, ऐसा योगी परमशान्ति को प्राप्त कर लेता है।
कहने का अभिप्राय है कि ऐसे योगी के लिए पाने के लिए शेष कुछ भी नहीं रहता। यही तो है भारत की संस्कृति-जिसमें सब कुछ पाने का सरल उपाय हर व्यक्ति को बता दिया गया है। इस संस्कृति की सुरक्षा करना प्रत्येक भारतीय का कत्र्तव्य है। अब सुरक्षा के दो रास्ते हैं-एक तो यह कि स्वयं भी ऐसी ही पवित्रात्मा बनो और बनकर इस संस्कृति का प्रचार-प्रसार करो। दूसरे, जो लोग पवित्रात्माओं के मार्ग को रोकें या उन्हें किसी प्रकार से उत्पीडि़त करें, उनका सफाया करो। अर्जुन को दोनों ही काम करने हैं। उसे पवित्रात्मा योगी भी बनना है और योगियों के या पवित्रात्माओं के मार्ग को बाधित करने वालों का सफाया भी करना है।
श्रीकृष्ण जी का कहना है कि हे अर्जुन! जिस व्यक्ति का आहार-विहार नियमित और सन्तुलित हो, जिसकी सारी चेष्टाएं सन्तुलित व नियमित हों, जिसका सोना, जागना नियमित हो, अर्थात जिसकी दिनचर्या पूर्णत: नियमों में ढली हो और सारे कार्य और सारी चेष्टाएं नियमों के अन्तर्गत रहकर अनुशासित और मर्यादित ढंग से पूर्ण होती हों ऐसे व्यक्ति के योग दु:ख दूर कर देता है।
आहार-विहार हो सन्तुलित मर्यादित व्यवहार।
दिनचर्या हो नियमित गीत गाये संसार।।
भारत के योगियों ने अपनी दिनचर्या और जीवनचर्या को इसलिए संयमित, नियमित और मर्यादित बनाया कि उन्होंने ईश्वरीय व्यवस्था को, प्रकृति के नियमों को बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन किया और पाया कि वहां सारा कुछ एक निश्चित नियम प्रक्रिया के अन्तर्गत सम्पन्न हो रहा है। अत: मनुष्य के लिए भी उचित है कि वह भी ईश्वरीय व्यवस्था और प्रकृति के नियमों के अनुरूप स्वयं को चलाये। यही अवस्था ईश्वर और प्रकृति से मित्रता कर लेने वाली अवस्था होती है। ईश्वर और प्रकृति के गुण आत्मा और शरीर वाला होने से मनुष्य के भीतर आने भी चाहिएं। ईश्वर हमारे आत्मा का मित्र है तो प्रकृति हमारे शरीर का मित्र है। अत: हमारे स्वभाव में भी इनके नियम रम जाने चाहिएं। योग का अभिप्राय ईश्वरीय व्यवस्था में स्वयं को स्थिर कर लेना है और प्रकृति के नियमों को पढक़र उनके ही अनुसार अपनी दिनचर्या और जीवनचर्या को बना लेना है।
युक्ताहार-विहार का अभिप्राय इन्द्रियसंयम से है। यहां पर युक्ताहार-विहार कहा गया है। जिसका अभिप्राय है कि इन्द्रियों से उचित नपा तुला काम तो लेना है। अपेक्षा से न थोड़ा सा अधिक और न थोड़ा सा भी कम। जैसे मिताहारी का अर्थ नपा-तुला (मित) खाने वाला है और मितभाषी का अर्थ नपा-तुला (मित) बोलने वाला है। वैसे ही हर इन्द्रिय से उतना काम लेना चाहिए-जितना आवश्यक है। जैसे मिताहारी का अभिप्राय कम खाने वाला या कतई न खाने वाला नहीं है, और मितभाषी का अर्थ जैसे कम बोलने वाला या कतई न बोलने वाला नहीं है-वैसे ही युक्ताहारी-विहारी का अर्थ इन्द्रियों को भूखा मारना या घरबार छोडक़र जंगलों में भाग जाना नहीं है। संसार समर में से भगाना या व्यक्ति को कायर बना देना गीता का विषय ही नहीं है-वह तो संसार समर से भागते हुए अर्जुन को रोकने के लिए अपनी बात कह रही है। अत: जिन लोगों ने गीता के ‘युक्ताहार-विहार’ का अर्थ घरबार छोड़ देने से या जंगलों में जाकर रहने से लगा लिया या इन्द्रियों को जिन्होंने भूखा मारना आरम्भ कर दिया उन्होंने भी गीता के मर्म को समझा नहीं है। वह स्वयं ‘अर्जुन’ हो गये और उसके उपरान्त भी मैदान छोडक़र भागने वाले अर्जुन को मैदान में डटे रहने का उपदेश दे रहे हैं। यह तो एक प्रकार का उपहास ही हुआ। श्रीकृष्ण जी संसार समर में डटे रहने वाले योगी थे। अत: वह दूसरों को भी ऐसा ही उपदेश देंगे कि जीवन को कमल की भांति बनाओ। संसार की कीचड़ में रखकर भी उसे कीचड़ से सनने मत दो। यह है गीता का उपदेश।
गीता का ‘कर्मयोग’ तभी सफल होता है-जब हम ध्यान की अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। ध्यान के साधनों का नाम ही ‘ध्यानयोग’ है। वास्तव में ‘ध्यानयोग’ का अभिप्राय शरीर की शक्तियों को अन्तर्मुखी बना देना है। हमारे ऋषियों ने अध्यात्म के क्षेत्र में महान सफलता की प्राप्ति के लिए ऊध्र्वरेता होने की अवस्था का अभिप्राय वीर्य (रेटस) को ऊपर की ओर चढ़ा लेना है। इस प्रकार ब्रह्मचर्य की घोर साधना ही ऊध्र्वरेता होना है। इस अवस्था में जाकर व्यक्ति को जिस आनन्द की अनुभूति होती है वही सच्ची स्वतन्त्रता होती है। इस अवस्था में मनुष्य इन्द्रियों की दासता से मुक्त हो जाता है और जो मन उसे अब तक पटक पटक मार रहा था उसकी सारी तानाशाही और नादिरशाही भी शान्त हो जाती है। अब मन आत्मा के आधीन हो जाता है और आत्मस्वरूप में मग्न रहने का अभ्यासी बन जाता है। अत: उसके द्वारा जितने भर भी कार्य निष्पादित किये जाते हैं-वे सबके सब बहुत शुद्घ और पवित्र होते हैं। श्रीकृष्णजी का कर्मयोग इसी अवस्था में फलता-फूलता है। इसी अवस्था में प्रस्फुटित होता है और इसी अवस्था में वह मुखर होता है। इसी अवस्था को श्रीकृष्ण जी अनुशासित जीवन कह रहे हैं। श्रीकृष्ण जी व्यक्ति की चेतना को निरन्तर जाग्रत किये रखना चाहते हैं। इसीलिए उसे कर्मयोगी बनाये रखना अपना धर्म मानते हैं।
संसार के जागरूक अर्थात जाग्रत लोगों को अपनी जागृत चेतना के माध्यम से ऐसे प्रयास करने ही चाहिएं कि अन्य लोगों का जीवन भी कल्याण से ओतप्रोत हो जाए, उनकी चेतना जागृत हो जाए और वे भी ऊध्र्वरेता बनकर आत्म कल्याण के मार्ग पर आरूढ़ हो जाएं? इसके लिए सतत साधना अर्थात निरन्तर ध्यान करते रहने का अभ्यास और वह भी एकान्त में करते रहने की आवश्यकता है। इसके लिए विद्वानों ने एकाकी ध्यान, इन्द्रिय निग्रह, वासना त्याग, अपरिग्रह, एकाग्रता, आसन, निर्भयता, ब्रह्मचर्य, भगवान में चित्त लगाना और नियमित जीवनशैली को अपनाने की आवश्यकता मानी है।
क्रमश:

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