मनुष्यों के दो भेद आर्य और दस्यु

दो पैर वाले शरीरधारी प्राणी को मनुष्य कहते हैं। ज्ञान व कर्म की दृष्टि से इसके मुख्य दो भेद हैं। ज्ञानी व सदाचार मनुष्य को आर्य तथा ज्ञान व अज्ञान से युक्त आचारहीन मनुष्य को दस्यु कहते हैं। महषि दयानन्द जी ने ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ में आर्य और दस्यु का भेद बताते हुए कहा है कि आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को कहते हैं। ऋषि दयानन्द इन्हें ऐसा ही मानते थे। महर्षि दयानन्द वेद और वैदिक साहित्य के उच्च कोटि के ऋषि वा विद्वान थे। उन्होंने अपने जीवन में वेदों के विषय में जो कहा व लिखा है वह सब उनके ऋषि होने से प्रमाण कोटि में आता है। अत: आर्य व दस्यु के विषय में उनके कथन सर्वथा प्रामाणिक है। ऋषि के विचारों को पढक़र स्पष्ट होता है कि आर्य श्रेष्ठ मनुष्य कहे जाते हैं। बिना ज्ञान के मनुष्य श्रेष्ठ नहीं हो सकता। दूसरी बात यह है कि यदि ज्ञानवान मनुष्य का आचरण श्रेष्ठ व उत्तम कोटि का नहीं है तो वह मनुष्य भी श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता। अत: ज्ञान व आचरण में श्रेष्ठ व उत्तम मनुष्यों को ही आर्य कहते हैं, यह स्पष्ट होता है। इसी प्रकार से मनष्यों में अल्प ज्ञानी व अज्ञानी मनुष्य भी होते हैं। यदि ऐसे मनुष्य धर्मात्मा हैं तो उन्हें भी आर्य ही कहा जायेगा क्योंकि उनके कर्म धर्मात्मा होने से श्रेष्ठ ही होते हैं। धर्मात्मा बनने के लिए बहुत अधिक ज्ञानी होने की आवश्यकता नहीं है। धर्मात्मा अज्ञानी वा अल्पज्ञानी मनुष्य भी बन सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ज्ञानी व अज्ञानी तथा श्रेष्ठ आचरण वाला मनुष्य आर्य होता है। अब यदि ज्ञानी व अज्ञानी मनुष्य का आचरण श्रेष्ठ नहीं है तो उसे आर्य न कहकर दस्यु ही कहेंगे। हम यहां एक प्रश्न उपस्थित करते हैं जिसका उत्तर आर्य बन्धु स्वयं को अपने आप ही दें। आजकल आर्यसमाज के बड़े बड़े पदाधिकारी तुच्छ पदों के लिए ऋषि भक्तों से ही मुकदमेबाजी कर रहे हैं। क्या यह दोनों आर्य हो सकते हैं। इसका उत्तर तो यही है कि या तो दोनों अनार्य वा दस्यु हैं या फिर एक पक्ष आर्य और दूसरा दस्यु है। दस्यु वह है जो आर्यसमाज का हित न कर स्वयं के हित के लिए कार्यरत है और आर्य वह है जो आर्यसमाज, देश व समाज के हित के लिए कार्यरत है। दोनों कहेंगे कि हम आर्यसमाज के हित के कार्य कर रहे हैं परन्तु दोनों सत्य नहीं हो सकते। सत्य दोनों में से एक ही हो सकता है और यह भी सम्भव है कि दोनों ही कुछ सीमा तक गलत हों। आर्यों को ऐसे मुकदमेंबाज नेताओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिये। यदि ऐसा नहीं करते तो वह स्वयं की, धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की दृष्टि से, हानि कर रहे हैं। हम समझते हैं कि ऐसे लोग ईश्वर की दृष्टि में दण्डनीय ही होते होंगे। 
आर्य और दस्यु नाम की कोई दो जातियां व सम्प्रदाय भारत में कभी नहीं रहे हैं। यह दोनों मनुष्यों के ही दो वर्ग कहे जा सकते हैं जिनका वर्गीकरण गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित होता था। श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव वाले आर्य कहलाते थे और दुष्ट गुण, कर्म व स्वभाव के लोग दस्यु कहलाते थे। इतिहास पर दृष्टि डालें तो रामायण में राम व रावण का वृतान्त मिलता है और महाभारत ग्रन्थ में कृष्ण, युधिष्ठिर, दुर्योधन व उसके साथियों का उल्लेख मिलता है। इन ऐतिहासिक पुरुषों के गुण, कर्म व स्वभाव का उल्लेख भी इन ग्रन्थों में मिलता है। आर्य व दस्यु के गुण, कर्म व स्वभाव से तुलना करने पर ज्ञात होता है राम, कृष्ण, युधिष्ठिर आदि आर्य गुणों से युक्त थे वहीं रावण, दुर्योधन आदि दस्यु स्वभाव के पुरुष थे। देवासुर संग्राम की चर्चा भी पुराणों में आती है। इससे अनुमान होता है देव नामी राजा व प्रजा के लोग आर्य थे और दस्यु स्वभाव के लोग जिनसे देवों का युद्ध हुआ, वह असुर कहलाते थे। यह देवासुर संग्राम भी आर्य व दस्युओं का युद्ध कहा जा सकता है। आज की वर्तमान केन्द्रीय सरकार को दैवीय गुणों वाली सरकार होने से उसे कुछ सीमा तक आर्य गुणों वाली सरकार कह सकते हैं वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान व चीन आदि की भारत विरोधी नीतियां जों उनके अनुचित स्वार्थ पर आधारित हैं, उस कारण उन्हें दस्यु देश कह सकते हैं। यदि यह श्रेष्ठ गुणों को धारण कर लें तो फिर परस्पर विरोध समाप्त हो सकता है। परन्तु चीन व पाकिस्तान को सद्बुद्धि मिलने का कोई कारण दिखाई नहीं देता क्योंकि उनके पास वेद व वैदिक साहित्य नहीं है। भारत में जो सद्बुद्धि है वह उसके अतीत के वैदिक संस्कारों के कारण दिखाई देती है। भारत के शास्त्र व संस्कृति विश्व को एक परिवार मानती है और सबके सुख व उन्नति की बात करती हैं जबकि हमारे विरोधी देशों में यह बात नहीं है। अत: इन उदाहरणों से भी आर्य व दस्यु के भेद को समझा जा सकता है। यह भी बता दें कि भारत के सभी नागरिक व दल आर्य गुणों वाले नहीं हैं। यहां भी दोनों गुणों के लोग है। जो लोग व दल राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध कार्य करते हैं वह आर्य न होकर दस्यु गुणों वाले ही कहे जायेंगे। इसका संकेत करने की आवश्यकता नहीं है, पाठक अपने विवेक से निर्णय कर सकते हैं। जो लोग सत्ता को उचित व अनुचित तरीकों से हथियाना चाहते हैं वह असुर वा दस्यु ही हैं। केवल उचित मार्ग पर चलने वाले आर्य होते हैं अथवा श्रेष्ठ गुणों की स्थापना के लिए जो नीति को ध्यान में रखकर कार्य करते हैं उन्हें भी यथायोग्य व्यवहार व नीति अपनाने के कारण से आर्य व श्रेष्ठ कहा जा सकता है।
वेद एक मन्त्र में ‘कृण्वन्तो विश्वार्यम्’ का सन्देश देते हुए कहते हैं कि सारे संसार को आर्य बनाओं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सारे संसार को एक मानवीय गुणों की उपेक्षा कर आर्य जाति का बनाना है अपितु यहां इसका तात्पर्य यही है सारे संसार में वेदों का प्रचार प्रसार कर सबको श्रेष्ठ गुणों वाला बनाया जाये। ऋषि दयानन्द जी ने अपने जीवन में भी यही कार्य किया था। उनके बाद उनके अनुयायियों ने भी इसी कार्य को जारी रखा। आज की पीढ़ी के लोग सहयोग कम करते हैं। बहुत से झगड़ालु प्रकृति के लोग भी आर्यसमाज में आ गये हैं जिनका जीवन व चरित्र आर्य मर्यादाओं के अनुकूल नहीं है। वह अपने स्वार्थों व एषणाओं की पूर्ति के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। ऐसे पद प्राप्ति के लिए लडऩे वाले हल्के चरित्र के लोगों को हम आर्य कदापि नहीं कह सकते। यह वस्तुत: दस्यु ही हैं। आज की परिस्थितियों में आर्यों को ऋषि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम और गुरुदत्त विद्यार्थी जैसे आर्य विद्वानों व नेताओं को ही अपना आदर्श व नेता मानकर प्रचार करना चाहिये। वर्तमान समय में समाज में कोई व्यक्ति सिद्धान्तनिष्ठ आदर्श आर्य नेता की योग्यता व पात्रता वाला शायद नहीं है। पदों की भूख कम वा अधिक प्राय: सभी में है। अत: आर्यों को जितना हो सके आर्यसमाज को आगे बढ़ाने के लिए निजी स्तर से व समान विचारधारा के लोगों के साथ मिलकर प्रयासरत रहना चाहिये। वेद और आर्यसमाज के सिद्धान्त मनुष्य व देश की समग्र उन्नति में सक्षम व सहायक है। इन गुणों को जीवन में धारण कर व इनका प्रचार कर लोगों को आर्य बनाने का प्रयत्न करना चाहिये जिससे दस्यु गुणों वाले लोगों की संख्या में वृद्धि न हो अपितु आर्यों की संख्या में वृद्धि हो सके। ओ3म् शम।

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