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विशेष संपादकीय

ईसाई नववर्ष की शुभकामनाएं

ईसाई नववर्ष 2018 का आगमन हो गया है। इस अवसर पर सभी लोगों का परस्पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है। हम भी अपने सभी पाठकों को ईसाई नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित करते हुए उनके अच्छे स्वास्थ्य, मंगलमय भविष्य और चिरायुष्य की कामना करते हैं। हम भारतीयों की एक आदत सी हो गयी है कि हम पश्चिमी देशों के अंधानुयायी हो चुके हैं। उनकी ओर से चाहे कोई परम्परा कितनी ही बकवास क्यों न हो-वही हमें वैज्ञानिक और आधुनिक लगती है। इसके विपरीत भारत की परम्परा चाहे कितनी ही वैज्ञानिक क्यों न हो वह हमें कोरी बकवास दिखायी देती है। हम अपने वैज्ञानिक सनातन वैदिक धर्म को केवल इसलिए उपेक्षित कर देते हैं कि उसे पश्चिमी जगत रूढि़वादी और परम्परावादी कहकर उपेक्षित करता है। जबकि सनातन का अभिप्राय है जो पुरातन होकर भी अधुनातन हो, नितनूतन हो, जो पुराना होकर भी नवीन हो, जो एक रस ब्रह्मï की भांति सदा नवीन और युवा रहता हो। ऐसे सनातन धर्म में विज्ञान ही विज्ञान ही होता है और वह विज्ञान का समर्थन भी करता है। यही कारण है कि भारत ने सदा ही पश्चिम के वैज्ञानिक विकास को अच्छा माना है। इसके उपरान्त भी कुछ लोगों को शिकायतें हो सकती हैं कि भारत के सनातन धर्म में भी कुछ अवैज्ञानिकता है उनकी यह शिकायत सही हो सकती है। परन्तु यह अवैज्ञानिकता हमारी संस्कृति नहीं है-यह तो संस्कृति की विकृति है और विकृति सदा ही सुधार की अपेक्षा किया करती है अत: ईसाई नववर्ष 2018 के अवसर पर हम अपने सनातन वैदिक धर्म की वैज्ञानिकता में आयी किसी भी प्रकार की विकृति को दूर करने का संकल्प लें और पश्चिमी जगत को चाहिए कि वह भी भारतीय वैज्ञानिक धर्म की वैज्ञानिकता को अपनाने की उदारता का प्रदर्शन करे।
हमें 2018 के बारे में विचार करना चाहिए। इस समय विश्व तीसरे विश्वयुद्घ के मुहाने पर खड़ा है। 2017 के वर्ष ने जाते-जाते विश्व के लिए उत्तरी कोरिया में एक भस्मासुर पैदा कर दिया है। जिसे निपटाने के लिए अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प का आगमन भी कम खतरनाक नहीं है। ट्रम्प अपने पूर्ववर्ती ओबामा की अपेक्षा कम गम्भीर और जिम्मेदार दिखायी दे रहे हैं। वह उतावले हैं और उतावलापन अधीरता में गलत काम करा डालता है। जिसके परिणाम ठीक नहीं आया करते हैं। यदि ट्रम्प उत्तरी कोरिया के विरूद्घ शीघ्रता कर गये तो क्या होगा?- यह विचारणीय है। इसके साथ-साथ हमें चीन और पाकिस्तान की गतिविधियों पर भी ध्यान रखना होगा। 2017 के जाते-जाते हमारी सीमाओं पर शान्ति तो है, पर ये शान्ति तूफान से पहले की शान्ति भी हो सकती है। कश्मीर में पत्थरबाजों के और आतंकियों के विरूद्घ जिस प्रकार हमारी सेना का ‘ऑप्रेशन ऑल आउट’ सफल रहा है और डोकलाम में जिस प्रकार भारत के नेतृत्व ने चीन से पंजा भिड़ाकर उसे मनोवैज्ञानिक शिकस्त दी है-ये दोनों घटनाएं हमें गर्व से फूलने के लिए प्रेरित करने वाली न होकर शत्रु से सावधान करने वाली मानी जानी चाहिएं। वर्ष 2017 यदि क्रिया का वर्ष रहा है तो 2018 को प्रतिक्रिया का वर्ष मानकर चलना चाहिए। इस भूल से हमें उभरना चाहिए कि कल का सूर्य बड़ा अच्छा होगा और आने वाले कल में मेरे सारे दु:खों का अन्त भी हो जाएगा। याद रखना चाहिए कि आने वाले कल पर आज की छाया अवश्य पड़ेगी। यही कारण है कि हमारी वेदादि शास्त्रों में सभी में यही माना गया है कि मनुष्य को भूत का पश्चात्ताप और भविष्य की व्यर्थ की चिन्ता करने में समय नहीं व्यतीत करना चाहिए। अपितु सोचना चाहिए कि मैं वर्तमान को संभालू।
अब चलते हैं ब्रिटेन की ओर। यह देश वह देश है जो कभी इस बात पर घमण्ड किया करता था कि मेरे राज्य में सूर्यास्त नहीं होता है। आज समय बदल गया है और हम देख रहे हैं कि ब्रिटेन का स्वयं का ही सूर्यास्त हो रहा है। बड़ी तेजी से विश्व इतिहास के लिए चौंकाने वाली इस घटना के हम गवाह बन रहे हैं और दुनिया के खून को चूसकर अपना व्यापार बढ़ाकर स्वयं को सभ्य कहलाने वाली एक अंग्रेज जाति अतीत बनती जा रही है। यह बात अभी हर किसी को जांचेगी नहीं-पर सच यही है कि ब्रिटेन का घमण्ड टूटकर समाप्त होने को है। भगवान ना करे कि तीसरा विश्वयुद्घ हो पर यदि होता है तो उसके बाद के विश्व समाज में बड़े ‘मुकदमों’ में ब्रिटेन कहीं नहीं होगा। उसके पापों का हिसाब किताब इस युद्घ में हो जाएगा। उसकी प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। वैसे भी हमें याद रखना चाहिए कि सूर्यास्त सदा पश्चिम में ही होता है और पूरब से सूर्योदय होता है ब्रिटेन पश्चिम का नायक है और पूरब का नायक भारत है। भारत की ओर उदय होने वाला सूर्य पश्चिम में ही जाकर डूबता है। हम तो ज्ञान-प्रकाश रूपी सूर्य में रहने वाले सनातनी लोग हैं-पर पश्चिमी जगत का भौतिकवाद तो निरे अज्ञान पर टिका है। उसका सूर्यास्त होना तो निश्चित है। जहां तक चीन की बात है तो वह देश अमेरिका को अपना शत्रु मानता है और अमेरिका भी इसे इसी दृष्टिïकोण से देखता है। अभी रूस के शासनापक्ष पुतिन ने कहा है कि अमेरिका से लडऩे के लिए उनके देश को सशक्त सेना की आवश्यकता है। इसका अभिप्राय है कि ट्रम्प के लिए खुले शत्रु उसे चुनौती दे रहे हैं। इसका कारण ये है कि ट्रम्प अपनी वाणी को ‘वीणा’ बनाने में असफल रहे हैं उन्होंने अपनी वाणी को ‘बाण’ बना लिया है। फलस्वरूप उनके सुर से संगीत की स्वर लहरियों को न सुनकर विश्व ‘महाभारत’ के बरसते बाणों को देख रहा है। 2018 में ये बाण और तीखे हो सकते हैं। हमें यह मानकर चलना होगा।
हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रथम विश्वयुद्घ 1914 से 1919 तक लगभग पांच वर्ष चला था और द्वितीय विश्वयुद्घ 1939 से 1945 तक अर्थात लगभग छह वर्ष चला था। यदि अब तीसरा विश्वयुद्घ हुआ तो यह कितने दिन चलेगा? हम भूलकर रहे हैं कि शायद यह भी दो-चार साल चलेगा। पर ऐसा नहीं है। आज विश्व बारूद के ढेर पर बैठा है, जिस दिन किसी सिर फिरे का मन करेगा वह उसी दिन इस जैसे कई विश्वों को अग्नि की भेंट चढ़ा देगा। अब परम्परागत युद्घ का समय चला गया है। अब तो कम्प्यूटर युग है और इसमें मैदान में जाकर अपना शौर्य न दिखाकर कायरतापूर्ण ढंग से बटन दबाने का कार्य किया जाता है। इसलिए विश्व के बड़े देशों को 2018 में किसी परम्परागत युद्घ की बात न सोचकर आधुनिकम तकनीकी के आसन्न संकट को समझनी होगी। हमें यथार्थवादी दृष्टिïकोण अपनाने की आवश्यकता है। इस बात पर विचार करना होगा कि 2019 में जब विश्व प्रथम विश्वयुद्घ की समाप्ति के सौ वर्ष पूर्ण कर रहा होगा-यह तब तक यह दुनिया नि:शस्त्रीकरण को अपना ले, यदि ऐसा होता है तो ही हम एक दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं देने के अधिकारी होंगे।

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