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ऋषि दयानन्द महाभारत के बाद विगत लगभग पांच हजार वर्षों में वेदों के मंत्रों के सत्य अर्थों को जानने वाले व उनके आर्ष व्याकरणानुसार सत्य, यथार्थ तथा व्यवहारिक अर्थ करने वाले ऋषि हुए हैं। महाभारत के बाद ऐसा कोई विद्वान नहीं हुआ है जिसने वेदों के सत्य, यथार्थ तथा महर्षि यास्क के निरुक्त ग्रन्थ के अनुरूप व्यवहारिक, उपयोगी, कल्याणकारी एवं ज्ञान-विज्ञान के अनुरूप अर्थ किये हों। वेदों का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर मनुष्य ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति के सत्य रहस्यों व ज्ञान-विज्ञान से परिचित हो जाता है। ऋषि दयानन्द से पूर्व उन जैसा वेदों का विद्वान व प्रचारक न होने के कारण विगत पांच हजार वर्षों से मनुष्य ईश्वर व जीवात्मा के सत्य स्वरूप के विषय में शंकित व भ्रमित था। इस बीच बड़ी संख्या में मत-मतान्तर उत्पन्न हुए परन्तु वह वेद, दर्शन व उपनिषदों के होते हुए भी ईश्वर के सत्यस्वरूप को लेकर भ्रमित रहे। सभी मतों के आचार्यों में विवेक का अभाव प्रतीत होता है अन्यथा वह जड़ पूजा, मिथ्या पूजा व मूर्तिपूजा का विरोध व खण्डन अवश्य करते और जनसामान्य को बताते कि ईश्वर सच्चिदानन्द एवं निराकार आदि गुणों वाला है और उसकी प्राप्ति वा साक्षात्कार उस सर्वव्यापक एवं सर्वान्र्तयामी सत्ता की उपासना व ध्यान करने सहित स्तुति, प्रार्थना व उपासना के माध्यम से ही की जा सकती है।

महर्षि दयानन्द क्या चाहते थे? इसके उत्तर में यह कह सकते हैं कि वह संसार को ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति का सत्यस्वरूप बताना चाहते थे जो सृष्टि के आरम्भ में सर्वव्यापक ईश्वर ने अपने ज्ञान वेदों के द्वारा अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियो ंअग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया था। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर व जीवात्मा विषयक वेदों के समस्त ज्ञान को अपने प्रयत्नों से प्राप्त किया था और इतिहास में पहली बार इसे सरल लोकभाषा हिन्दी सहित संस्कृत में देश-देशान्तर में पहुंचाया। ईश्वरीय ज्ञान ‘‘वेद” सब सत्य विद्याओं का ग्रन्थ है। इस कारण वह इसे सभी देशवासियों सहित विश्व के लोगों तक पहुंचाना चाहते थे जिससे वह वेदों का आचरण कर मनुष्य जीवन के पुरुषार्थ एवं उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकें। वह इस कार्य में आंशिक रूप से सफल भी हुए। आज इसका प्रभाव समस्त विश्व पर देखा जा सकता है। इसी कार्य के लिये ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना की थी। इस कार्य को सम्पादित करने के लिये उन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया जिनमें ऋग्वेद (आंशिक) तथा यजुर्वेद के संस्कृत व हिन्दी भाष्य सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, पंचमहायज्ञविधि, आर्याभिविनय, व्यवहारभानु, गोकरूणानिधि आदि ग्रन्थ हैं। देश व विश्व के लोग ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप तथा गुण-कर्म-स्वभाव को जानें और सही विधि से ईश्वरोपासना करें, इसके लिये उन्होंने पंचमहायज्ञविधि लिखी जिसमें उन्होंने प्रातः व सायं ध्यान विधि से ईश्वर की उपासना की विधि ‘‘सन्ध्या” के नाम से प्रस्तुत की है। ईश्वर का ध्यान करने की यही विधि सर्वोत्तम है। इसका ज्ञान सभी उपासना पद्धतियों सहित सन्ध्या का अध्ययन करने से होता है। अतीत में अनेक पौराणिक विद्वानों ने भी अपनी सन्ध्या व उपासना पद्धतियों को छोड़कर ऋषि दयानन्द लिखित संन्ध्या पद्धति की शरण ली है। पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने अपनी आत्माकथा में इसका उल्लेख करते हुए बताया है कि काशी में जिस उच्च कोटि के विद्वान पं. देवनारायण तिवारी जी से वह पढ़ते थे उन्होंने यह जाने बिना की पुस्तक किसकी लिखी हुई है, इसे सर्वोत्तम जानकर इसी विधि से उपासना करना आरम्भ कर दिया था। बाद में जब उन्हें यह पता चला कि वह सन्ध्या की पुस्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने लिखी है तो उन्हें ऋषि दयानन्द की विद्वता को जानकर सुखद आश्चर्य हुआ था।

महर्षि दयानन्द ने 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई नगरी में आर्यसमाज की स्थापना की थी। इसके बाद लाहौर में आर्यसमाज के 10 नियम बनाये गये जिनमें से आठवां नियम है ‘अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’ हम इससे पूर्व किसी संस्था व देश के संविधान में इस नियम का विधान नहीं पाते। यह नियम ऐसा नियम है कि जो समाज व देश इस नियम को अपना ले, वह ज्ञान व विज्ञान में शिखर स्थान प्राप्त कर सकता है। आश्चर्य है कि हमारे देश में इसे अब तक लागू नहीं किया जा सका। ऋषि दयानन्द अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में देश के सभी बालक व बालिकाओं के लिये वेदानुमोदित शास्त्रीय व ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा का विधान करते हैं। वह लिखते हैं कि शिक्षा व विद्या देश के सभी बालक व बालिकाओं को निःशुल्क व समान रूप से मिलनी चाहिये। वैदिक शिक्षा में बच्चों को गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करनी होती है। राजा हो या रंक, सबको शिक्षा का अधिकार है, इसका विधान ऋषि दयानन्द ने किया है। उन्होंने यह भी लिखा है कि किसी भी विद्यार्थी के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिये। सबको समान रूप से वस्त्र, भोजन एवं अन्य सभी सुविधायें मिलनी चाहियें। यह भी कहा है कि शिक्षा सभी बालक व बालिकाओं के लिये अनिवार्य होनी चाहिये। जो माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल, पाठशाला व विद्यालयों में न भेंजे, वह दण्डनीय होने चाहिये।

मनुष्य जब ईश्वर व जीवात्मा के विषय को यथार्थ रूप में जान लेता है तब वह सभी प्रकार के अज्ञान व अन्धविश्वासों सहित मिथ्या परम्पराओं से भी परिचित होकर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करता है। जन्मना जातिवाद पर भी ऋषि दयानन्द ने प्रहार किया है। जन्मना जाति व्यवस्था को ऋषि दयानन्द ने मरण व्यवस्था की संज्ञा वा उपमा दी थी। वह इस व्यवस्था से दुःखी थे। उन्होंने वेदों के ज्ञान व अपने विवेक से युवक व युवती के विवाह का विधान कर उनके गुण, कर्म व स्वभाव की समानता व अनुकूलता पर बल दिया है। वह बेमेल विवाह व बाल विवाह के विरोधी थे। वह इन्हें वेद विरुद्ध एवं देश व समाज की उन्नति में बाधक मानते थे। ऋषि दयानन्द ने युवावस्था की विधवाओं व विधुरों का विरोध नहीं किया। यद्यपि वह सभी प्रकार के पुनर्विवाहों को उचित नहीं मानते थे परन्तु आर्यसमाज इसे आपदधर्म के रूप में स्वीकार करता है। वेद में भी विधवा स्त्री के पुनविर्वाह का विधान है। सभी सामाजिक परम्पराओं पर महर्षि दयानन्द की विचारधारा प्रकाश डालती है।

ऋषि दयानन्द देश में स्वराज्य देखना चाहते थे। इस विषय में उन्होंने सत्यार्थप्रकाश में स्वदेशीय राज्य को सर्वोपरि उत्तम बताया है और कहा है कि मत-मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं हो सकता। उनके इन विचारों के परिणामस्वरूप कालान्तर में देश में आजादी के लिये गरम व नरम विचारधारायें सामने आयीं। देश की आजादी के आन्दोलन में सबसे अधिक योगदान भी आर्यसमाज ने ही किया। आर्यसमाज ने देश की आर्य हिन्दू जाति को धर्मान्तरण से बचाया। आर्यसमाज की वैदिक विचारधारा का प्रचार होने से सभी मत-मतान्तरों के विज्ञ व विवेकशील लोगों ने इसे विद्यमान अन्य मतों की विचारधारा से उत्तम जानकर कुछ ने इसे अपनाया भी। इसका परिणाम यह हुआ कि विश्व इतिहास में पहली बार वैदिक सनातन धर्म से इतर मतों के विज्ञजनों ने वैदिक विचारधारा वा वैदिक धर्म को स्वीकार किया और ऋषि के अनुयायियों वा आर्यसमाज ने उन्हें अपने धर्म में सम्मिलित किया। आज भी ऐसी घटनायें होती रहती हैं। ऋषि दयानन्द की विचारधारा मांसाहार की विरोधी एवं शुद्ध अन्न व भोजन का सेवन करने की पोषक है। मनुष्य का भोजन अन्न, शाक-सब्जी, फल एवं दुग्ध आदि ही हैं। इनके सेवन से मनुष्य निरोग रहते हुए लम्बी आयु को प्राप्त करता है। मांसाहार अनेक रोगों को आमन्त्रण देता है। मांसाहार ईश्वर प्राप्ति में बाधक है और मांसाहार हिंसायुक्त कर्म व अभक्ष्य होने सहित वेदों में इसकी आज्ञा न होने के कारण जन्म-जन्मान्तर में इसका परिणाम दुःख पाना होता है। आर्यसमाज ने वायु-वृष्टि जल के शोधक व आरोग्यकारक अग्निहोत्र यज्ञ का भी प्रचार किया जिससे असंख्य प्राणियों को सुख लाभ होने से पुण्यार्जन होता है और हमारा यह जन्म व परजन्म सुख व कल्याण से पूरित होता है।

महर्षि दयानन्द का मुख्य उद्देश्य संसार से अविद्या का नाश तथा विद्या की वृद्धि करने सहित विद्या के ग्रन्थ वेदों सहित ज्ञान व विज्ञान को प्रतिष्ठित व प्रचारित करना था। वेद की किसी भी मान्यता का ज्ञान व विज्ञान से विरोध नहीं है। वस्तु स्थिति यह है कि वेदों की सभी मान्यतायें ज्ञान-विज्ञान की पोषक हैं। ऋषि दयानन्द की दृष्टि में वेद और वेदानुकूल मान्यतायें सत्याचरण का पर्याय हैं और यही वास्तविक विश्व के मनुष्यों का धर्म हैं। सभी को ईश्वर प्रदत्त मानवमात्र व प्राणीमात्र के हितकारी वेदमत का ही अनुसरण करना चाहिये। यही ऋषि दयानन्द को अभीष्ट था। इसी से विश्व में सुख व शान्ति का वातावरण बनाने में सहायता मिल सकती है व शान्ति का वातावरण बन सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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