ज्योतिष के नाम पर पाखंड,लूट और अंधविश्वास का प्रचलन*: -एक समीक्षा

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डॉ डी के गर्ग

3 हस्त रेखा विज्ञान :
एक बार एक युवक महर्षि दयानन्द के पास गया और अपना हाथ आगे बढ़ाकर कहने लगा -“स्वामी जी!देखिये,मेरे हाथ में क्या है?”स्वामीजी ने उसके हाथ को देखते हुए कहा-“इसमें खून है,मांस है,चर्बी है,चाम है,हड्डियाँ हैं और क्या है?”
हमारे हाथ में क्या है?वेद कहता है-
कृतं में दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनञ्जयो हिरण्यजित्।।-(अथर्व० ७/५०/८)
मेरे दायें हाथ में कर्म है और बायें हाथ में विजय है।मैं अपने कर्मों के द्वारा गौ,भूमि,अश्व,धन और स्वर्ण का विजेता बनूँ।
यदि आप रेखाओं के भरोसे ही बैठे रहे तो कुछ नहीं होगा।कर्म द्वारा,प्रबल पुरुषार्थ द्वारा आप सारे संसार का शासन भी कर सकते हैं।अतः कर्म करो।मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता और विधाता स्वयं है।ज्योतिष के द्वारा आपके भाग्य का निर्माण नहीं हो सकता।ज्योतिष आपको धन-सम्पत्ति नहीं दे सकते

शादी से पहले ३६ गुणो का मिलान करना :
जन्म पत्री मिलाने का रिवाज सिर्फ भारत में है जहा आज भी पढ़ी लिखी जनता आज भी अनपढ़ पंडितो के जाल से बहार नहीं निकल पाती है ,पंडित जन्म तिथि और समय देखकर ये तो बता देते है की ३६ में २४ गुण मिल गए लेकिन ये नहीं बताया जाता की कौन से १२ गुण नहीं मिले। पंडित को ये भी नहीं मालूम कि ये 36 गुण कौन कौन से है? किस विद्वान ने इनकी खोज की है ? इस बात का कोई प्रमाण किसी प्रामाणिक शास्त्र मे नहीं मिलता. आइये समझते है की ये ३६ गुण क्या होने चाहिए ?
ये 36 गुण इस प्रकार होने चाहिए – मनुष्य के गुण – अवगुणों को गिना नहीं जा सकता है. फिर भी समाज मे प्रचलित इस मान्यता के आधार पर यदि केवल 36 गुणों की ही बात की जाए तो मुख्य रूप से ३६ गुणों की बात की जाये तो ये होने चाहिए –
1.पांच ज्ञानेद्रियां -आंख,नाक, कान,जीभ,त्वचा,
ये इन्द्रियां ठीक होनी चाहिए. दोनों आंखे, कान, सफेद दाग की बीमारी ना हो आदि.
2पांच कर्मेन्द्रियां- गुदा,लिंग,हाथ,पैर,वचन
ये कर्मेन्द्रियो है जो कि स्वस्थ अवस्था मे हो, वचन से मृदु भाषी हो, हाथ पैर कमजोर ना हो, कार्य शील हो आदि
3 चार प्रकार के बल होते है – साम , दाम, दंड और भेद
ये हर मनुष्य के जीवन मे सफलता का आधार है.
4.बुद्धि के यह आठ अंग हैं- सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्य को ठीक ठीक समझना, विज्ञान व तत्वज्ञान।
ये गुण बातचीत के देखे परखें जाते हैं.
5.राजनीति के चौदह गुण हैं– देशकाल का ज्ञान, दृढ़ता, कष्टसहिष्णुता, सर्वविज्ञानता, दक्षता, उत्साह, मंत्रगुप्ति, एकवाक्यता, शूरता, भक्तिज्ञान, कृतज्ञता, शरणागत वत्सलता, अधर्म के प्रति क्रोध और गंभीरता।

बच्चे का जन्म तिथि और समय के अनुसार नाम करण :
ये भी पाखंड का दूसरा रूप है एक समय में पैदा हुए सभी बच्चे एक सामान नहीं हो सकते। नाम का असर बच्‍चे के व्‍यवहार और स्‍वभाव पर भी पड़ता है इसलिए ज्योतिषियों के चक्केर में ना पड़कर बुजुर्गो की सलाह पर अपने बेटे या बेटी को वैदिक नाम देकर आप उसकी जिंदगी को पॉजिटिविटी से भर सकते हैं।चित्र से चरित्र का बोध होता है , मन विचार पर गुणी और अवगुणी का नाम रखने का प्रभाव होता है जैसे की बचे का नाम शिवजी , राणा प्रताप, राम,कृष्ण रखना अच्छा लगता है ना की कंस आदि। बच्चे का नाम प्रकृति से जोड़कर भी रखा जाता है जैसे की आकाश ,गंगा ,सूरज आदि।
व्यक्ति न तो ज्योतिष अनुसार नाम का अक्षर रखने से महान बनते है न ही अंक ज्योतिष के अनुसार नाम के अक्षरो मे हेर फेर करने से। व्यक्ति महान बनता है अपने कर्म से न कि मुकद्दर से इसलिए नाम चाहे चंगेज खां रखो या घसीटा राम जब तक कर्म अच्छे नहीं होगें तब तक कुछ नहीं होने वाला है एक अच्छा कर्म भी नाम का नाम कर सकता है और एक बुरा कर्म नाम को बदनाम।

राहु और केतु की महादशा

ये कौन हैं राहु केतु ये भी समझने का प्रयास करते है – ये दोनों भी कोई अलग गर्ग नहीं है ये भी ईश्वर के ही अन्य नामो की तरह से है।
राहु : राहु:- यो रहति परित्यजति दुष्टान राहयति त्याज्यति स राहुरीश्वर
(रह त्यागे) इस धातु से राहु शब्द सिद्ध होता है। जो एकान्तस्वरूप जिसके स्वरूप में दूसरा पदार्थ संयुक्त नहीं जो दुष्टों की दुष्टता को छुड़ाने वाला और सज्जन को दुष्ट से छुड़ाने वाला है। इससे परमेश्वर का नाम राहु है।
केतु : (कित निवासे रोगापनयने च) इस धातु से ‘केतु’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यः केतयति चिकित्सति वा स केतुरीश्वरः’ जो सब जगत् का निवासस्थान, सब रोगों से रहित और मुमुक्षुओं को मुक्ति समय में सब रोगों से छुड़ाता है, इसलिए उस परमात्मा का नाम ‘केतु’ है।
इसलिए राहु -केतु की बुरी दशा के नाम पर डरना छोड़ दे।
शुभ मुहुर्त का विचार
भारत के अलावा दुनिया में और कही मुहुर्त देखकर कार्य नहीं किया जाता हैं। तो क्या उन्हें सफलता नहीं मिलती।यह एक अवैज्ञानिक चलन है। महर्षि मनु के अनुसारः-
निमेषा दश चाष्टौ च काष्टा त्रिंशत्तु ताः कला।
त्रिंशत्कला मुहुर्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः।।-(मनु०१/६४)
पलक झपकने का नाम निमेष हैं। अठारह निमेष की एक काष्ठा तीस काष्ठा की एक कला तीस कला का एक मुहुर्त और तीस मुहुर्त का एक दिन रात होता हैं। इस प्रकार मुहुर्त तो काल की संज्ञा हैं। क्या यह किसी के ऊपर चढ़ सकता है। या किसी को खा सकता हंै। अथवा किसी को भस्म कर सकता हैं। कदापि नहीं।
यदि मुहुर्त देखना कोई लाभदायक बात है। तो जिन लोगों में ईसाई मुसलमान आदि मुहुर्त नहीं देखा जाता उन्हें हानि होनी चाहिये परन्तु यहाँ तो हिसाब ही उल्टा हैं। हिन्दुओं में जहाँ लगन और मुहुर्त देखकर विवाह किये जाते हैं। वहाँ विधवाओं की संख्या अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक हैं। मुहुर्त देखने से सन्तान अधिक योग्य उत्पन्न होती हो पति-पत्नि में अधिक प्रेम रहता हो ऐसी बात भी दृष्टि गोचर नहीं होती।
परिणाम : भारत वर्ष को अवनति के गढ़े में छकेलने वाला दूसरा बहुत बड़ा कारण हैं। फलित ज्योतिष। यह फलित ज्योतिष कई भागों में विभक्त हैं। यथा मुहुर्त नवग्रह पूजा और दिशा शूल।फलित ज्योतिष ने भारत के पतन एवं अकल्याण की प्रभूता सामग्री प्रस्तुत की है। यहाँ हम एक ऐतिहासिक घटना लिखने का लोभ संवरण नहीं कर सकते।
महमूद गज़नवी ने भारत पर सत्रह बार आक्रमण किये। अन्तिम बार सन् १०२४ ई० में उसने काठियावाड़ के प्रसिद्ध मन्दिर सोमनाथ पर आक्रमण किया। सोमनाथ की रक्षा के लिए एक बहुत बड़ी सेना तैयार खड़ी थी परन्तु परिणाम क्या हुआ ? उस समय पोप पुजारी अपने राजाओं को समझाते थे कि आप निश्चिन्त रहिये। महादेव जी भैरव अथवा वीर भद्र को भेज देंगे। वे सब म्लेच्छों को मार डालेगें व अन्धा कर देंगे। अभी हमारा देवता प्रसिद्ध होता है। हनुमान, दुर्गा और भैरव ने स्वप्न दिया है कि हम सब काम कर देंगे।
कितने ही ज्योतिषी पोपों ने कहा कि अभी तुम्हारी चढ़ाई का मुहुर्त नहीं हैं। एक ने आठवाँ चन्द्रमा बतलाया दूसरे ने योगिनी सामने दिखाई इत्यादि बहकावट में रहे जब म्लेच्छों की फौज ने आकर घेर लिया तब दुर्दशा से भागे। कितने ही पोप पुजारी और उनके चेले पकड़े गये। पुजारियों ने हाथ जोड़कर यह भी कहा कि करोड़ो रुपया ले लो मन्दिर और मूर्ति मत तोड़ो। जब पुजारी और पोपों पर कोड़े पड़े तब रोने लगे मंदिर के भगवान् के सभी कोष लूट मार कर पोप और उनके चेलों को ग़ुलाम बना दिया ,उनसे , घास खुदवाया ,मल मूत्रादि उठवाया और अधिकांश को मुस्लिम न बनाया ,आज भी सोमनाथ के नमंदिर के चारो तरफ इन मुस्लिमो के परिवार रहते है।
आगे भाग तीन में ,,,,,कल

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