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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-54

गीता का नौवां अध्याय और विश्व समाज

गुरू अद्भुत दर्शनीय मिले अर्जुन हुआ निहाल।
अतुलित ज्ञान गाम्भीर्य व्यक्तित्व बड़ा विशाल।।
ऐसे अद्भुत दर्शनीय गुरू श्रीकृष्ण जी अपने शिष्य अर्जुन को बताने लगे कि अर्जुन! अब मैं तुझे पवित्रतम और अति उत्तम प्रत्यक्ष फल देने वाली, धर्म के सर्वथा अनुकूल और साधन करने में बड़ी सुगम अविनाशी विद्या के विषय में बताता हूं। इसे जानकर तू अशुभ से या अनिष्ट से मुक्त हो जाएगा और अभीष्ट को पा लेगा। इसे श्रीकृष्ण जी ने राजविद्या का नाम दिया है। राज विद्या का अभिप्राय है कि ‘विद्यानाम राजा’-अर्थात विद्याओं में राजा जो सबसे प्रमुख और सबसे बड़ी विद्या हो-वह राजविद्या है। इसे गुहय विद्या भी कहा गया है। गुहय विद्या का अभिप्राय भी जो सबसे रहस्यमयी वस्तु हो, वह राजगुहय कही जाती है।
इस राजविद्या को देने से पूर्व श्रीकृष्णजी अर्जुन से कह रहे हैं कि इस विद्या को वही लोग पा सकते हैं-जिनके भीतर श्रद्घा हो अर्थात जिनके भीतर श्रद्घा नहीं है वे इस विद्या को नहीं पा सकते। श्रद्घाहीन लोग अविद्याग्रस्त होने के कारण इस मरणशील संसार में बार-बार लौट आते हैं। इस का अभिप्राय है कि जो लोग कृष्ण मार्ग के अनुयायी हैं-वे अपने अज्ञान के कारण इसी मरणशील संसार में आते रहते हैं। उनकी मुक्ति नहीं हो पाती। अत: जिन लोगों को इस संसार में पुन: नहीं लौटने की इच्छा है-उन्हें तो इस राजविद्या को अवश्य ही जानना चाहिए।
हमारे यहां प्राचीनकाल में शिष्य जब गुरू के पास जाते थे तो वे ‘समित्पाणि’ (हाथ में समिधाएं लेकर) होकर जाते थे। ‘समित्पाणि’ होकर जाना श्रद्घा और सम्मान का प्रतीक था। गुरू उनका जीवन रूपी समिधा को अपने ज्ञान घर्षण से वैसे ही उद्दीप्त-प्रदीप्त कर देता था- जैसे समिधाएं यज्ञकुण्ड में पडक़र प्रदीप्त हो उठती हंै। इसलिए वेद ने ‘श्रद्घामना:’ (ऋ 22/6/3) अर्थात श्रद्घायुक्त मन वाले होकर गुरू के पास जाने की बात कही है। इसी बात को योगेश्वर श्रीकृष्ण जी अपने शिष्य अर्जुन को बता रहे हैं कि देख अर्जुन! कुछ पाना है तो मन में श्रद्घा जगानी पड़ती है, बिना श्रद्घा के तो कुछ मिलने वाला है नहीं।
‘श्रद्घया विन्दते वसु’ (ऋ 10/151/4) कहकर वेद ने स्पष्ट किया है कि श्रद्घा से धन मिलता है। यह धन लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार का होता है। पारलौकिक धन ही वह विद्या है जो राजविद्या कहकर श्रीकृष्णजी अर्जुन को देना चाहते हैं। परलोक का धन और वह भी ऐसा धन कि जिसे पाकर कोई भी धनी वहां से लौटना नहीं चाहता। वहां जाकर वहीं का होकर रह जाता है। ऐसी विद्या को पाकर व्यक्ति के लिए पाने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता है। वह सब कुछ पा लेता है, सब कुछ जान जाता है। पर फिर भी वह कहता है कि उसे अभी बहुत कुछ पाना शेष है, और उसने बहुत कुछ जानकर ही कुछ नहीं जाना है। कहने का अभिप्राय है कि राजविद्या को प्राप्त करने वाला व्यक्ति अहंकारशून्य हो जाता है। वह ईश्वर के समक्ष अपनी मर्यादा की सीमाओं को और ज्ञान की सीमाओं को समझ जाता है। फलस्वरूप वह अपने आपको अल्पज्ञ मानकर और ईश्वर को सर्वज्ञ मानकर अन्त में ‘नेति-नेति’ कहकर शान्त हो जाता है।
श्रीकृष्ण जी का उपदेश आरम्भ होता है। वे गीता के नौंवे अध्याय में कह रहे हैं कि अर्जुन! मैं अव्यक्त हूं, इसके उपरान्त भी मैंने इस संसार को धारण किया हुआ है। सब प्राणी मुझमें हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूं। मैं उनमें निवास नहीं करता। मेरा आत्मा (ममात्मा) सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाला है और सब प्राणियों का भरण पोषण करने वाला है। किन्तु फिर भी वह उनमें समाया हुआ नहीं है। ‘समाया हुआ नहीं है’ का अभिप्राय है कि ‘ममात्मा’ में इस चराचर जगत के प्रति या जगत के प्राणियों के प्रति किसी प्रकार का मोह नहीं है। किसी में मोह रहे और रहकर भी ना रहे यही तो सबसे बड़ा रहस्य है। इस रहस्य को जो लोग अपना लेते हैं वे संसार में रहकर भी संसार में नहीं रहते।
दूसरा रहस्य स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्णजी अर्जुन को बताते हैं कि जैसे अपरिवर्तनशील आकाश इस परिवर्तनशील वायु को धारण किये रखता है-वैसे ही इस परिवर्तनशील सृष्टि को अपरिवर्तनशील ब्रह्म धारण किये रखता है। कितना बड़ा रहस्य है कि क्षण-क्षण में परिवर्तनशील होने वाली चंचलसृष्टि को सदा एकरस शान्त रखने वाला अपरिवर्तनशील ब्रह्म अपनी गोद में लिए बैठा है। सृष्टि चाहे कितने ही उत्पात मचाले और चाहे जैसा अपना स्वरूप दिखा ले-उसका प्रभाव ब्रह्म पर नहीं पड़ता। वह दृष्टाभाव से सारे उत्पातों और उपद्रवों को देखता रहता है। यह भी एक रहस्य है कि इतना सब कुछ होते हुए भी ब्रह्म निर्विकार रहता है।
कहने का भाव है कि मनुष्य को भी इस परिवर्तनशील संसार के उपद्रवों और उत्पातों के प्रति दृष्टाभाव ही अपनाना चाहिए। मनुष्यों को आकाश और ब्रह्म से शिक्षा लेनी चाहिए। जैसे ये किसी भी स्थिति में स्वयं को निर्विकार बनाये रखने में सफल रहते हैं-वैसे ही मनुष्य को भी चाहिए कि वह अपने आपको निर्विकारी बनाये रखने का अभ्यास करता रहे।
ब्रह्म और आकाशवत् बने रहो निर्विकार।
विद्या का यह रहस्य ही करेगा भव से पार।।
श्रीकृष्णजी अगले श्लोक में कहते हैं कि जब यह सृष्टि समाप्त होती है तो सारे भूत प्राणी मुझमें समा जाते हैं। ईश्वर की यह शक्ति उसे ‘दुर्गा’ का रूप देती है। जैसे आपत्तिकाल में प्रजा राजा के दुर्ग में आ जाती है-वैसे ही प्रलयकाल में सभी भूत ईश्वर के गर्भ रूपी दुर्ग में आ जाते हैं। इसी ओर संकेत करते हुए श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि जब प्रलयकाल समाप्त होने पर पुन: सृष्टि चक्र चलता है तो उस समय मैं ही उसका सर्जन करता हूं।
इस प्रकार भाव यह है कि यह प्रकृति मेरे वश में है। जीव को भी इस मायावादी प्रकृति के दृश्यों में उलझना या भटकना नहीं चाहिए, अपितु उसे भी माया को अपने वश में करने का अभ्यासी होना चाहिए। यदि जीव प्रकृति में रम गया तो उसे माया के आधीन होने से बार-बार शरीरों को धारण करना पड़ेगा। मनुष्य को चाहिए कि कर्मों के बंधन से मुक्त होने के लिए सदा ही प्रयासरत रहे। जैसे ईश्वर अनासक्ति भाव में रहते हैं -वैसे ही जीव को भी अनासक्ति भाव में रहने का अभ्यासी होना चाहिए। क्योंकि आसक्ति की भावना ही मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है, अनासक्ति से ही उसका कल्याण संभव है।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि ईश्वर की देख-रेख में है-यह प्रकृति। यह प्रकृति ही इस चराचर जगत को उत्पन्न करती है। जिससे यह संसार चक्र घूम रहा है। इसका भाव ये है कि ईश्वर इस चराचर जगत का मूल कारण है। इसलिए मनुष्य को उस मूल कारण के प्रति ही समर्पित रहना चाहिए। ईश्वर के प्रति व्यक्ति की निष्ठा आस्था और श्रद्घा सदा अचल और अडोल बनी रहनी चाहिए। ऐसी श्रद्घापूर्ण भावना से ईश्वर के दिव्य गुण व्यक्ति में भासने लगते हैं और संसार के प्रति उसका आसक्ति भाव अनासक्ति में बदलने लगता है।
क्रमश:

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