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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-57

गीता का नौवां अध्याय और विश्व समाज

अन्य देवोपासक और भक्तिमार्गी
पीछे हम कह रहे थे कि गीता बहुदेवतावाद की विरोधी है और एकेश्वरवाद की समर्थक है। यहां पुन: उसी बात को श्रीकृष्ण जी दोहरा रहे हैं, पर शब्द कुछ दूसरे हैं। जिन्हें सुनकर लगता है कि वे बहुदेवतावाद को बढ़ावा दे रहे हैं। वह कह रहे हैं कि जो लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं-वे भी मेरी ही पूजा करते हैं। भले ही उनकी यह पूजा विधिपूर्वक नहीं होती है। सब प्रकार के यज्ञों का अर्थात पूजाओं का भोगने वाला तो मैं हूं। ये लोग मेरे सच्चे स्वरूप को नहीं पहचानते इसलिए गिर जाते हैं।
अत: जड़ को ईश्वर मानना गलत है। ऐसी पूजा गिराती है। ईश्वर के सच्चे परम चेतन स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। जितना ही हम ईश्वर के सच्चे परम चेतन स्वरूप को समझते जाते हैं उतना ही हमारा अज्ञानान्धकार मिटता जाता है। पर फिर भी ऐसी पतनोन्मुखी पूजा को जितना वेद संगत और श्रद्घापूर्वक किया जाता है वह तो ईश्वर का भोग बन ही जाता है।
जैसी जिसकी पूजा होती है-उसे वैसा ही इष्ट मिलता है। देवों की पूजा करने वाले देवों को पाते हैं, पितरों की पूजा करने वाले पितरों को पाते हैं, और भूतों की पूजा करने वाले भूतों को पाते हैं। (भूत का अभिप्राय जो बीत गया-उससे है, दूसरा अर्थ अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश-इन पंचमहाभूतों से भी है) पितर का अभिप्राय अपने माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों से है। इसमें प्राचीन संस्कृति का गुणगान भी सम्मिलित है।
अन्त में राजविद्या की प्राप्ति का साधन योगेश्वर श्रीकृष्ण पूर्ण समर्पण को बता रहे हैं। जो लोग भक्तिभाव से सब कुछ करते हैं-उनकी भेंट मैं ग्रहण कर लेता हूं। पूर्ण समर्पण के साथ जो अपने इष्ट को बुलाता है, पुकारता है, उसका इष्ट उसके वश में हो जाता है। वश में होने का अभिप्राय उसे अपना गुलाम बना लेना नहीं है, अपितु अपनी आत्मा को इतना पवित्र और परिष्कृत कर लेना है कि भक्त के शुद्घ अन्त:करण से वही प्रार्थना निकले जिसे ईश्वर स्वाभाविक रूप से मान ले।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि व्यक्ति को अपने प्रत्येक कार्य को मुझे समर्पित करके करना चाहिए। महर्षि दयानन्द जी महाराज ने अन्त समय में अपने जीवन-व्यापार को समेटते समय भी यही कहा था कि-‘प्रभु आपकी इच्छा पूर्ण हो।’ कहने का अभिप्राय है कि उन्होंने अपना नाशवान चोला भी प्रभु को ही समर्पित कर दिया था। भक्ति ऐसी ही होनी चाहिए-जिसमें सर्वस्व समर्पण का भाव निहित हो। ऐसा करते रहने से साधक अपने भगवान को पा जाता है। उस परमेश्वर को किसी से न तो राग है और न ही द्वेष है। वह सबके लिए समान है, एक सा है। जो उसे भजते हैं-उनके लिए श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूं। दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति भी जिस दिन से सत्संकल्प लेकर ईश्वर को भजन आरम्भ कर देता है-उस दिन से योगेश्वर श्रीकृष्ण उसे भी साधु ही मानते हैं। इसका अभिप्राय है कि सही रास्ते पर आने के लिए कोई घड़ी मुहूत्र्त दिखाने की आवश्यकता नहीं है। जब और जहां से हृदय परिवर्तन हो जाए प्रभु वहीं से हमें गले लगा लेते हैं। यही कारण है कि परमपिता परमेश्वर को लोग नितांत दयालु और कृपालु कहते हैं। कुछ लोग उसे अज्ञानवश भोला कहते हैं-यदि उसे भोला भी मान लिया जाए तो भी सचमुच वह इतना भोला है कि हमारी पवित्र भक्ति से तुरन्त हमारे वश में हो जाता है। उसकी पाठशाला में उसी क्षण प्रवेश मिल जाता है। संसार के विद्यालयों में ऐसा नहीं है। पर प्यारे प्रभु के यहां ऐसा है, क्योंकि संसार के विद्यालय आपके अपने यहां प्रवेश के लिए संदेश नहीं भेजते, पर प्यारा पिता को सुधरने के और सही रास्ते पर आने के संदेश सदा भेजता रहता है। जैसे आग कोयले में घुसकर उसके कालेपन को मिटा देती है, वैसे ही भक्त भगवानमय होकर अपने दुराचारी स्वभाव को त्याग देता है।
कोयले में घुसे आग तो मिट जाए काला रंग।
पवित्र दुराचारी भयो पा भगवन को संग।।
ऐसे व्यक्ति को चिरस्थायी शान्ति प्राप्त होती है। ऐसा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। भगवान ऐसे भक्त के भार को उठाकर चल देते हैं। वह चाहे किसी भी वंश में या कुल में उत्पन्न हुआ हो और चाहे वह स्त्री हो या वैश्य या शूद्र हो। ऐसे लोग जब अनन्य भाव से प्यारे प्रभु को भजने लगते हैं तो मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
जो लोग शूद्र और स्त्रियों को वेद के पढऩे या भगवान की आराधना करने पर रोक लगाते हैं उन्हें गीता के इस अध्याय के इस प्रकरण को ध्यान से पढऩा चाहिए। उन्हें पता चल जाएगा कि गीताकार स्त्रियों एवं शूद्रों को सारे अधिकार देकर समतामूलक समाज की संरचना को ही बलवती कर रहा है। अत: जीवन के कल्याण की इच्छा करने वाले हर नरनारी को अनन्य भाव से परमपिता-परमात्मा की आराधना करनी चाहिए।
संसार के छोटे से छोटे पदार्थ को या चीज को द्वेषभाव से नहीं देखना चाहिए, अपितु उन सबमें सर्वव्यापक परमात्मा की सत्ता और कलाकारी के दर्शन करने चाहिएं। सर्वत्र उसका प्रकाश अनुभव करना चाहिए। इससे हर पदार्थ का मूल्य बढ़ेगा और उससे हमारा आत्मिक लगाव पैदा होगा। आत्मिक लगाव के वातावरण से संसार का परिवेश उत्तम बनेगा। गीता इसी भाव को संसार का संस्कार बना देना चाहती है।
डा. राधाकृष्णन जी कहते है-”अपने मन को मुझ में स्थिर कर, मेरा भक्त बन, मेरी पूजा कर, मुझे प्रणाम कर-यह कथन व्यक्ति रूप कृष्ण का नहीं है, जिसके प्रति हमें अपने आपको समर्पित कर देना है-अपितु अजन्मा अनादि और नित्य ब्रह्म का है, जो कृष्ण के मुंह से बोल रहा है।” इस पर सत्यव्रत सिद्घान्तालंकार जी कहते हैं कि हमारी सम्मति में डा. राधाकृष्णन का यह विचार अत्यन्त युक्तिसंगत है। इस विचार को सम्मुख रखकर गीता का अध्ययन करते हुए जहां भगवान ने कहा-ये शब्द आये हैं-उनका यही अर्थ समझना चाहिए कि श्रीकृष्ण ने भगवान के अभिप्राय को इस प्रकार प्रकट किया। ठीक उसी प्रकार जैसे महर्षि वेद व्यास ने अपनी बात को अपने नाम से न कहकर श्रीकृष्ण के नाम से कह दिया।”
योगेश्वर श्रीकृष्णजी को बार-बार भगवान कहने की परम्परा भी गीता के व्याख्याकारों और टीकाकारों ने अपना रखी है। भगवान का एक अर्थ परमैश्वर्यशाली भी है। श्रीकृष्णजी निश्चित रूप से ऐश्वर्यसम्पन्न थे। इस अर्थ में और इस सीमा तक उन्हें भगवान कहा जा सकता है। परन्तु संसार में लोग यौगिक अर्थ को न समझकर रूढिग़त अर्थ को शीघ्र पकडऩे का प्रयास करते हैं। जिससे श्रीकृष्णजी को भगवान समझने कहने वालों में उन्हें वह ब्रह्म समझ लिया जो इस जगत का कारण है। जबकि श्रीकृष्णजी गीता में कहीं पर भी ऐसा संकेत तक भी नहीं दे रहे हैं कि मैं वही ब्रह्म हूं जो इस चराचर जगत का कारण है। अत: श्रीकृष्णजी को इस अर्थ में भगवान कहना अनुचित होगा। गीता स्वयं हमारे मत की पुष्टि कर रही है। क्रमश:

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