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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-60

गीता का दसवां अध्याय और विश्व समाज

शस्त्रों में वज्र मैं हूं, गायों में कामधेनु मैं हूं, प्रजनन में कामदेव मैं हूं, सर्पों में वासुकि मैं हूं। यहां श्रीकृष्णजी किसी भी जाति में या पदार्थादि में सर्वोत्कृष्ट को अपना रूप बता रहे हैं। सर्वोत्कृष्ट के आते ही छोटे उसमें अपने आप आ जाते हैं। जैसे किसी भोज समारोह में लोग गृहपति को बुलाकर उस घर के सभी लोगों का प्रतिनिधि उसे मानकर सभी की उपस्थिति मान ली जाती है अथवा जैसे किसी विश्व स्तर के कार्यक्रम में भारत का प्रधानमंत्री देश के सवा अरब लोगों का प्रतिनिधि बनकर उसमें पहुंचता है-तब उसकी उपस्थिति को सारे देश की उपस्थिति माना जाता है-वैसे ही श्रीकृष्ण जी की बात का अर्थ लगाना चाहिए। मान लीजिए कि वह ये कह रहे हैं कि ईश्वर (मैं) वृक्षों में पीपल हूं तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि अन्य वृक्षों के विषय में आप ये मान लें कि उनमें ईश्वर का वास नहीं है। वास तो उनमें भी है-पर सारी वृक्ष जाति का मुखिया यहां पीपल को मान लिया गया है, इसलिए श्रीकृष्णजी सभी वृक्षों के मुखिया का अर्थात सर्वोत्कृष्ट का नामोल्लेख कर रहे हैं, और उसी को अपना स्वरूप बताने की बात कह रहे हैं।
 ईश्वर अपने आप में सर्वोत्कृष्ट है। उसकी सर्वोत्कृष्टता की सर्वोत्कृष्ट से ही उपमा दी जाए तो ही अच्छा है। उसे वृक्षों में अरण्ड कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि अरण्ड के वृक्ष का वह मूल्य अथवा उपयोगिता नहीं है जो पीपल के वृक्ष की है। पीपल से कोई अन्य वृक्ष जैसे चन्दन -मूल्यवान हो सकता है और उसकी उपयोगिता भी हो सकती है-परंतु पीपल चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देकर अपने याज्ञिक स्वरूप का परिचय देता है, इसलिए उसकी उपयोगिता अधिक है। चन्दन के वृक्ष पर सांप भी मिलते हैं-इसलिए चन्दन वन में तो शोभायमान हो सकता है पर उसे घर के आंगन में नहीं लगा सकते। अत: चन्दन से अधिक उपयोगी पीपल है जो ईश्वर के याज्ञिक स्वरूप का प्रतीक है। श्रीकृष्णजी यही कह रहे हैं कि जैसे ईश्वर यज्ञ रूप हैं-वैसे ही वृक्षों में पीपल यज्ञ रूप है। पीपल यज्ञरूप होने से उसे ईश्वर की सर्वाधिक सुन्दर कृति मानना चाहिए।
देश का प्रधानमंत्री किसी के घर अचानक आ धमके तो वह घर के मुखिया द्वारा ही सर्वप्रथम सम्मानित किया जाता है और वह स्वयं भी सर्वप्रथम घर के मुखिया को ही नमन करता है। इसी से परिवार के सब लोग स्वयं को धन्य मान लेते हैं। यही कारण है कि गीताकार ने यहां ईश्वर की सर्वोत्कृष्टता का पूरा ध्यान और सम्मान करते हुए उसे सर्वोत्कृष्ट से ही सम्मानित करा दिया है। उसकी सर्वोत्कृष्ट विभूति को उसी के रूप में बिखरी सर्वोत्कृष्ट विभूतियां मानो सर्वत्र सम्मानित कर रही हैं। इससे ईश्वर सम्मानित नहीं हो रहा-अपितु ये विभूतियां सम्मानित हो रही हैं कि हमें अपने क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट होने का प्रमाण पत्र मिल रहा है। जो स्वयं में प्रमाण हैं और अनुपम हैं-उसे किसी के प्रमाणपत्र की या उपमा की आवश्यकता नहीं होती।
इस वर्णन से यह भी समझने की आवश्यकता है कि जब ‘पीपल’ को लेकर श्रीकृष्ण ये कहते हैं कि वृक्षों में मैं पीपल हूं तो इससे परमात्मा धन्य नहीं होता, ना ही उसे पीपल जैसा होने का प्रमाण पत्र मिलता है, और ना ही उसकी उपमा पीपल से दी गयी है। इसके विपरीत इस कथन से पीपल धन्य हो गया है-उसी की उपमा परमात्मा से दे दी गयी है, क्योंकि वह भी चौबीसों घण्टे संसार के प्राणियों के लिए कल्याण में लगा रहता है। उसका यह स्वरूप उसकी विभूति है जो उसे ईश्वर के एक गुण के तुल्य बना देती है। अत: प्रमाणपत्र भी पीपल को ही मिल रहा है कि वह अमुक क्षेत्र में सेवा का अमुक-अमुक कार्य बड़ी उत्तमता से कर रहा है इसलिए उसे अमुक उपाधि से सम्मानित किया जाता है। लोगों ने अनुपम को उपमा के योग्य मान लिया और जो उपमा के योग्य है-उसे अनुपम मान लिया। हमारी ऐसी सोच वेद के और गीता में श्रीकृष्ण जी के उपदेशों के विपरीत है। इसे सही रूप में समझने की आवश्यकता है।
उत्कृष्टों में उत्कृष्टतम हैं अपने भगवान। उसकी दिव्य विभूतियों की है यही पहचान।।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि श्रीकृष्णजी जिन-जिन पदार्थों का या प्राणियों का या जातियों का नाम ले लेकर यह कह रहे हैं कि उसमें मैं अमुक हूं, फलां हूं-वह अमुक या फलां उत्कृष्ट तो है पर उत्कृष्टतम नहीं है, उत्कृष्टतम तो फिर भी ईश्वर ही रह जाता है। जैसे देश का प्रधानमंत्री किसी के घर पहुंचे तो उसका स्वागत कत्र्ता उस घर का मुखिया उत्कृष्ट तो है (घर का मुखिया होने के नाते) पर वह उत्कृष्टतम अर्थात प्रधानमंत्री नहीं है। प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री ही हैं। इसी प्रकार ईश्वर तो ईश्वर ही है। उसकी उपमा उसी से दी जा सकती है। शेष किसी से नहीं दी जा सकती।
अपनी बात को जारी रखते हुए श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि नागों में शेषनाग मैं हूं, जलचरों में वरूण मैं हूं, पितरों में अर्यमा मैं हूं और विषय तथा व्यवस्था द्वारा संयमन करने वालों में यम मैं हूं। दैत्यों में प्रहलाद मैं हूं, गणना करने वालों में काल, पशुओं में सिंह तथा पक्षियों में गरूड़ मैं हूं। पावन करने वालों में पवन मैं हूं, शस्त्रधारियों में राम मैं हूं, मच्छों में मगरमच्छ मैं हूं, नदियों में गंगा मैं हूं।
हे अर्जुन! इस सृष्टि का आदि, अन्त और मध्य मैं हूं, विद्याओं में अध्यात्मविद्या तथा वाद -विवाद करने वालों का तर्क मैं हूं। अक्षरों में अकार मैं हूं, समासों में द्वन्द्व-समास मैं हूं, अविनाशी काल मैं ही हूं-सब दिशाओं में मुखवाला सृष्टि का विधाता मैं हूं।
सबको हरने वाली मृत्यु मैं हूं, भविष्य उत्पन्न होने वालों की उत्पत्ति का कारण, नारियों में कीर्ति लक्ष्मी, वाणी, स्मृति, मेधा-धृति और क्षमा मैं हूं।
सामागीतों में बृहत साम नाम का गीत, छन्दों में गायत्री, मासों में मार्गशीर्ष, ऋतुओं में वसन्त, छलियों में द्यूत, तेजस्वियों का तेज मैं हूं। जय मैं हूं, प्रयत्न मैं हूं, सात्विक भाव वालों का सत्व मैं हूं। इसी प्रकार वृष्टि कुल में वासुदेव, पाण्डवों में धनञ्जय (अर्जुन) मुनियों में व्यास कवियों में उशना अर्थात शुक्राचार्य मैं हूं। दमन करने वाले शासकों का दण्ड मैं हूं, जय चाहने वालों की नीति, रहस्यपूर्ण वस्तुओं में मौन और ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूं।
हे अर्जुन! सब प्राणियों की उत्पत्ति का जो भी बीज है-कारण है, वह मैं हूं। इस चराचर में ऐसा कुछ भी नहीं है जो बिना मेरे रह सके। मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है। यह जो मैंने तुझे विभूतियों के विषय में बताया है-यह केवल दिग्दर्शन कराने के लिए या बानगी देने के लिए कुछ संकेत रूप में बता व समझा दिया है।
अन्त में श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि संसार में जो कुछ भी विभूति वाले पदार्थ हैं, श्री वाली और ऊर्जावाली चीजें हैं, उस उसको मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ समझो। हे अर्जुन! तुझे इस बहुत बड़े विस्तार को जानकर क्या करना है? बस तू एक ही बात समझ ले कि इस सारे संसार के तामझाम को मैंने थामा हुआ है।
इस दसवें अध्याय का यह अंतिम निचोड़ श्रीकृष्णजी ने इस श्लोक में आकर दे दिया है। इसी बात को ईश्वर के संदर्भ में हमें मानना चाहिए। वेद ने उसे यूं ही सर्व जीवनाधार व जगदाधार नहीं कह दिया है। क्रमश:

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