गीता का दसवां अध्याय और विश्व समाज

सत्य है परमात्मा सृष्टि का आधार।
उसके साधे सब सधै जीव का हो उद्घार।।
वह परमपिता-परमात्मा सत्य है। सत्य वही होता है जो इस सृष्टि से पूर्व भी विद्यमान था और इसके पश्चात भी विद्यमान रहेगा, जो अविनाशी है। वह परमपिता परमात्मा अपने स्वभाव में अविनाशी है। वह अज है-उसका कभी जन्म नहीं होता, वह अमर है-उसकी कभी मृत्यु नहीं होती।
अथर्ववेद (14/1/1) में कहा गया है कि ‘सत्येनोत्तभिता भूमि:’ अर्थात यह भूमि सत्य के सहारे टिकी है। वह सत्य परमात्मा ही है। जिसे सर्वजीवनाधार कहा जाना उचित ही है।
सत्य पर धरती टिकी टिका यह आकाश।
हृदय में मिलता वह रहे हमारे पास।।
श्रीकृष्ण जी उसी सत्य परमात्मा की विभूतियों को बताते-बताते अन्त में अर्जुन से यह कह जाते हैं कि-‘हे अर्जुन! ये जो इतना कुछ मैंने तुझे बताया है यह तो केवल बानगी है।’ कृष्णजी का कहना है कि मैंने तुझे जो कुछ बताया है वह तो केवल संकेत मात्र है। इसे ही तू पूर्ण समझने की भूल मत कर बैठना। ईश्वरीय ज्ञान को कोई भी मनुष्य आज तक पूर्णत: न तो समझ सका है और न ही उसे अंगीकार कर सका है। अत: श्रीकृष्णजी अर्जुन को स्पष्ट कर रहे हैं कि तू साधारण लोगों की भांति ईश्वरीय ज्ञान को पूर्णत: समझ लेने का दावा मत कर बैठना, अन्यथा अनर्थ हो जाएगा। तुझे ईश्वरीय ज्ञान को समझने के लिए अपनी साधना को और भी प्रखर करना होगा, पैना करना होगा। तभी तू कुछ जान पाएगा।
कहने का अभिप्राय है कि श्रीकृष्णजी ने अर्जुन की चेतना को झंकृत कर उसे जगा तो दिया, पर जैसे ही अर्जुन की आंखें खुलीं तो उसे बता दिया कि यह जो तुझे मैंने अब तक कहा है इसे तो शुरूआती झलक समझ। अब तेरी चेतना का जागरण हो गया है, इसलिए यहां से आगे का रास्ता अपने आप खोज। एक प्रकार से कृष्णजी ने अर्जुन रूपी बच्चे को चलना सिखा दिया, खाना-पीना सिखा दिया, आरंभिक अक्षर ज्ञान दे दिया और अपने पैरों पर चलना सीख गये अर्जुन को कह दिया कि अब यहां से आगे अपने आप चल। जैसे एक पिता अपने पुत्र को उंगली पकडक़र चलना सिखाता है-फिर जब वह चलना सीख जाता है तो पिता उसे उचित संरक्षण देते हुए भी खुला छोडऩे का प्रयास करता है। पिता की सोच होती है कि यदि इसे खुला छोड़ा जाएगा तो यह गिरेगा, चोट खाएगा, उठेगा और फिर चलेगा। इस प्रकार इस गिरने, चोट खाने , उठने और चलने से वह बच्चा मजबूत हो जाता है। उसमें आत्मविश्वास की वृद्घि होती है और वह संसार को व संसार के लोगों को भली प्रकार समझने लगता है। पिता यदि हर समय उसके साथ रहते और उसे गिरने व चोट खाने नहीं देते तो उस बच्चे में आत्मविश्वास जैसी चीज का विकास होना कठिन हो जाता। संसार में यह देखा भी जाता है कि जिन बच्चों को देर तक माता-पिता का लाड प्यार मिलता रहता है, या किसी भी कारण से माता-पिता उन्हें गिरने और चोट खाने नहीं देते हैं-वे बच्चे आत्मविश्वास के स्तर पर कमजोर पाये जाते हैं। अत: पिता की लताड़ और बच्चे को गिरने व चोट खाने देने की उसकी प्रवृत्ति बच्चे के हित में ही होती है। इसी प्रकार की बात श्रीकृष्णजी यहां पर अर्जुन से कह रहे हैं। श्रीकृष्णजी की कही हुई बात को इसी सन्दर्भ में और इसी परिप्रेक्ष्य में समझकर देखने की आवश्यकता है।
एक अच्छे गुरू की यही पहचान होती है कि वह शिष्य की चेतना को जागृत करता है और जैसे ही वह समझता है कि शिष्य की चेतना जागृत हो गयी है तो फिर अपने आप पीछे हट जाता है। उसकी यह भी पहचान या विशेषता होती है कि वह अपने शिष्य को विषय की पूरी गम्भीरता में उतारता है और जब उसके शिष्य का तथा विषय का सही तारतम्य स्थापित हो जाता है तो फिर गुरू स्वेच्छा से और बड़ी सावधानी से अपने आपको पीछे हटा लेता है। इससे विद्यार्थी की प्रतिभा का विकास होता है। उसका बौद्घिक विकास होता है। गुरू को यह कभी नहीं कहना चाहिए कि तुझे मैंने जो कुछ बता दिया है वही पर्याप्त है या वही अन्तिम है। एक अच्छा गुरू सदा ही अपने ज्ञान को अपर्याप्त और अपूर्ण ही बताता है। वह चाहता है कि मेरे शिष्य को बौद्घिक अपंगता का शिकार न बनना पड़े इसलिए उसे यह बता दिया जाए कि ज्ञान असीम होता है। असीम को ससीम करके दिखाना गुरू का नहीं ‘अनाड़ी टीचर’ का काम है। ‘अनाड़ी टीचर’ बच्चों को कुंजियों से या ’20 यूनिक प्रश्न’ बताकर उन्हें उत्तीर्ण कराने की युक्ति खोजता है। जबकि गुरू अपने शिष्य को असीम से जोडऩे के लिए उसे ज्ञान की गहराई में उतारता है, क्योंकि ज्ञान का मूल केन्द्र परमात्मा असीम है। बस, यही कारण रहा कि श्रीकृष्णजी ने भी अर्जुन को ससीम न रखकर असीम की ओर बढऩे के लिए प्रेरित कर अपने उपदेश का यहां अन्त कर दिया।
विभूति का अर्थात करते हुए सत्यव्रत सिद्घान्तालंकारजी ने कहा है कि-”संस्कृत में दो शब्द हैं-भूति तथा विभूति। भूति का अर्थ है-होना, सुख, विजय, धन-ऐश्वर्य, महत्वशक्ति। विभूति का अर्थ है-विशेष तौर से होना, विशेष सुख, विशिष्ट, धन, बड़ा, विजय, विशेष-ऐश्वर्य, विशेष महत्व, विलक्षण शक्ति। ईश्वर की भूति अर्थात सत्ता तो अणु-अणु में है, परन्तु उसका विशेष प्रभाव थोड़े पदार्थों में ही मनुष्य अनुभव करता है। उन्हीं को वह विभूति कहता है। ईश्वर की विभूतियों का अन्त नहीं इसलिए प्रधान-प्रधान विभूतियों का प्राधान्यत:-गीता में वर्णन किया गया है।”
गीता के ‘विभूति सिद्घांत’ का अन्तिम उद्देश्य मानव का आत्मिक उत्थान करना ही है। मानव मानव बने, मानव से देवता बने और अपने जीवन को निरन्तर उत्कृष्टता में ढालता जाए- ऐसा अलख उसके अन्त:करण में जगाना विभूति सिद्घांत का उद्देश्य है। गीता ने मानव जीवन को एक कार्यशाला के रूप में देखा है, जिसमें विलक्षण शक्तियों से सम्पन्न अर्थात विभूति सम्पन्न देवों का निर्माण होता है, देह तो हर जीवधारी को मिलती है। परन्तु मानव देह मिलने का औचित्य तभी है जब मनुष्य दिव्य विभूतियों को अपने जीवन में धारण करने वाला बने और इस संसार को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से आलोकित करने की शक्ति प्राप्त कर ले।
विभूति का सरल सा अर्थ ईश्वर की महान कृपा है। उसकी महान कृपा से हमारे देश में मर्यादा पुरूषोत्तम राम जैसे वीरता और शौर्य सम्पन्न महाप्रतापी शस्त्रधारी का जन्म हुआ, तो श्रीराम ईश्वर की एक महान विभूति थे। महान कृपा का परिणाम थे। वैसे ही ईश्वर की असीम कृपा गंगा जैसी पवित्र नदी के रूप में उसकी साक्षात विभूति के रूप में हमें दिखायी देती है। ईश्वरीय विभूतियों में इनके नामोल्लेख का अभिप्राय थाली लेकर इनकी पूजा करना नहीं, अपितु इन्हें देखकर ईश्वर की विभूतियों को नमन करना है। इसी प्रकार ईश्वरीय विभूतियों को समझना चाहिए उनके अर्थ का विस्तार ईश्वरीय कृपा को खोजने के समान होगा। जहां कहीं भी हमारा हृदय ईश्वर के कमाल को देखकर चमत्कृत हो उठे-वहीं उसकी विभूति के साक्षात दर्शन मानने चाहिए।
क्रमश:

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