महर्षि के लिए दी गयीं श्रद्धांजलिया

(अ) बंगाल के पत्र
(1) कलकत्ता का पत्र-बंगाली (3 नवंबर 1883), (2) इंडियन एम्पायर, कलकत्ता (4 नवंबर 1883), (3) हिंदू पेट्रियेट कलकत्ता (4) पब्लिक ओपीनियन, कलकत्ता (नवंबर 1883), (5) लिबरल कलकत्ता (11 नवंबर) (6) इंडियन मैसेंजर, कलकत्ता (11 नवंबर 1883), (7) इंगलिश क्रोनिकल, बॉकीपुर पटना (5 नवंबर 1883)।
(आ) बम्बई प्रान्त के पत्र
(1) इंडियन स्पेक्टेटर (18 नवंबर 1883), (2) दीनबन्धु (4 नवंबर 1883), (3) गुजरात मित्र सूरत (11 नवंबर 1883), (4) रास्त गुफ्तार (4 नवंबर 1883), (5) जामे जमशेद, बम्बई (2 नवंबर 1883), (6) गुजराती बम्बई (4 नवंबर 1883)।
(इ) मद्रास प्रान्त के पत्र
(1) हिंदू आब्जरवर (8 नवंबर 1883), (2) थिंकर (11 नवंबर 1883)।
(ई) पश्चिमोत्तर प्रदेश के पत्र
(1) अवध अखबार (8 नवंबर 1883) (2) हिन्दुस्तानी, (3) नसीम हिंद, (4) प्रदीप (प्रयाग) (5) भारतबन्धु अलीगढ़ (6) क्षत्रिय हितकारी (बनारस)।
(उ) पंजाब के पत्र
(1) ट्रिब्यून लाहौर (3 नवंबर 1883) (2) पंजाब टाईमस रावलपिण्डी (10 नवंबर 1883) (3) अंजुमन अखबार (4) ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका लाहौर।
(ऊ) अन्य आर्य पत्र
आर्य मैगजीन, रिजेनेरेटर आफ आर्यावर्त, देश हितैषी (अजमेर), आर्य दर्पण (शाहजहांपुर) आर्य समाचार देशोपकारक, शुभचिंतक आदि।
कुछ अन्य शोकञ्जलियां
प्रो. मैक्समूलर ने अपने ‘बायोग्राफिकल एसेज’ नामक ग्रन्थ में लिखा-”स्वामी दयानंद आर्यसमाज के संस्थापक तथा अग्रणी नेता थे। वे एक विद्वान पुरूष थे तथा अपने धार्मिक साहित्य के पूर्ण जानकार थे। ये समाज सुधारक भी थे और अपनी व्यक्तिगत निंदा को सहन करते हुए भी उन्होंने अपने कत्र्तव्य को कभी नहीं छोड़ा।”
अमेरिका के दार्शनिक एण्डू जैक्सन डेविस ने आर्यसमाज की उपमा एक ऐसी अग्नि से दी है जिसमें प्रेम और भाईचारे का प्रकाश तो है किंतु जो पाखण्ड, अन्याय और अत्याचार को जलाने की क्षमता भी रखती है। यह अग्नि महान संन्यासी स्वामी दयानन्द के हृदय से उत्पन्न हुई है।
मैडम ब्लैवेट्स्की ने स्वामीजी को भारत का लूथर बताया तथा लिखा कि यह पूर्ण सत्य है कि शंकराचार्य के पश्चात भारत में स्वामी दयानंद से बढक़र संस्कृत का विद्वान, उनसे बढक़र प्रत्येक बुराई को उखाड़ फेंकने वाला प्रबल वक्ता तथा गम्भीर दार्शनिक अन्य कोई नहीं हुआ।
स्वामी दयानन्द का स्मारक-डीएवी कालेज लाहौर स्वामीजी की मृत्यु का समाचार मिलते ही लाहौर के आर्य पुरूषों ने यह संकल्प किया कि उस महापुरूष की स्मृति में कोई महत्वपूर्ण स्मारक बनाना चाहिए। 8 नवंबर 1883 को जब लाहौर में स्वामीजी के निधन पर शोक प्रकट करने के लिए एक शोकसभा का आयोजन हुआ तो उनकी स्मृति में दयानंद ऐंग्लोवैदिक कालेज खोलने का निश्चय हुआ। इसके लिए 8 हजार रूपये तो तुरंत एकत्र हो गये। लाहौर की इस सभा के प्रस्ताव का अनुमोदन मुल्तान, रावलपिण्डी तथा पंजाब के अन्य नगरों की आर्य समाजों ने भी किया था। उधर 28 दिसंबर 1883 को ‘परोपकारिणी सभा’ का प्रथम अधिवेशन अजमेर में हुआ जिसमें स्वामीजी का अंतिम स्वीकार-पत्र पढ़ा गया।
प्रस्तुति: आर.एच. देव

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