महर्षि दयानंद जी महाराज के दार्शनिक जीवन पर एक दृष्टि

स्वामी दयानन्द का चरित्र
क्या यह बतलाने की आवश्यकता है कि स्वामीजी का आचार वैसा ही महान था जैसा कि एक महापुरूष का होना चाहिए? शुद्घ आचार के बिना कोई महापुरूष नहीं हो सकता। उनका जीवन, उनका प्रचार कार्य, उनका कृतित्व, उनके शुद्घाचारी होने की पूर्ण साक्षी है। कैरेक्टर का अर्थ आचार है, किन्तु यह शब्द भी उक्त अंग्रेजी शब्द के पूर्ण भाव को प्रकट नहीं करता।
हर महापुरूष में एक विशेष शक्ति होती है जो अन्य जनों को उसकी ओर आकर्षित करती है। लोग चाहें या न चाहें, वे उस महात्मा की ओर खिंचे चले आते हैं। स्वामीजी के जीवन में भी यह शक्ति दिखाई देती है। लोग प्रतिपक्षी की भांति उनसे शास्त्रार्थ करने आते थे, किन्तु जाते थे अनुयायी बनकर। इसी आकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक महापुरूष के जीवनकाल में उसके अनुयायियों की बहुत बड़ी संख्या हो जाती है, जिनमें से बहुत से तो अपनी धन सम्पत्ति तथा प्राणों तक को उसके सुपुर्द कर देते हैं। उसके संकेत पर मरने-मारने के लिए तैयार हो जाते हैं। यूरोप की प्रजातांत्रिक शासन पद्घति ने लोगों को दैहिक दीनता से तो स्वतंत्र कर दिया, परन्तु वह अपने शासकों में उस महान आचार को नहीं ला पाई जो लाखों लोगों को उनकी ओर आकृष्ट कर सके। इसीलिए महापुरूष यदि राजा के शासन को बदलते हैं तो कभी-कभी उसे नष्ट भी कर देते हैं।
महापुरूषों में एक असाधारण विशेषता होती है। यह उन्हें अन्य लोगों से पृथक करती है। स्वामीजी के बचपन में ही मनुष्यत्व की यह उच्चता दिखाई दी थी। शिवरात्रि की रात्रि को पिता के भय से भयातुर न होकर स्वतंत्रतापूर्वक अपने विचार सामने प्रस्तुत करना इसी महापुरूषत्व का लक्षण था। फिर माता, भाई, बहन के स्नेह तथा परिवार की ममता को छोडक़र गृहत्याग भी उस महापुरूषत्व की दूसरी साक्षी थी। संन्यासाश्रम के क्लेशों को निर्भयतापूर्वक सहन करते हुए अपने मंतव्यों पर दृढ़ रहना उनके मनुष्यत्व का तीसरा प्रमाण था। नर्मदा के किनारे कठिन मार्गों पर चलना तथा पीछे न लौटना उनके महापुरूषत्व का चौथा लक्षण था। स्वामी विरजानन्द की कटूक्तियों और मार की परवाह न कर निरन्तर विद्या प्राप्ति करना-उनके शुद्घाचार का एक अन्य प्रमाण था। सत्य यह है कि हम कहां तक गिनें, जिस व्यक्ति ने उनके जीवन को सावधानी से पढ़ा है, वह स्वयं इस तथ्य को पढ़े-पढ़े अनुभव करेगा। 

स्वामी दयानन्द अखण्ड बाल ब्रह्मचारी थे, जितेन्द्रिय थे। मृत्युपर्यन्त ब्रह्मचर्य का सामथ्र्य उनमें विद्यमान था। वे परम योगी, महावैराग्यवान थे। तथापि वे मनुष्य के स्वभाव की निर्बलता को जानते थे, इसलिए किसी स्त्री को अपने पास फटकने तक नहीं देते थे। यदि कोई स्त्री आती तो उसकी पीठ की ओर मुंह कर लेते। वे उन्हें यही शिक्षा देते कि अन्य पुरूषों के पास उपदेशार्थ न जाएं, बल्कि अपने पतियों को भेज दें, ताकि वे हमसे शिक्षा ग्रहण कर उन तक पहुंचा दें। नारी स्वतन्त्रता के वकील तनिक विचार कर स्वामी के आचरण के इस अंश का विचार करें। कहीं ऐसा न हो कि यूरोपीय अनुकरण वृत्ति के कारण वे अपनी जातीय मर्यादाओं को भी तिलांजलि दे दे।
स्वामीजी परदा प्रथा के विरोधी थे, किन्तु स्त्रियों की निर्बाध स्वतन्त्रता के भी पक्ष में नहीं थे। उन्होंने अपने जीवन मेंहिन्दू साधुओं की मर्यादा को देखा और जाना था। वे तथाकथित साधु संतों की नारी के प्रति लोलुपता से भी परिचित थे, इसलिए जब कोई स्त्री उनके समीप आती तो नकली साधुओं का यह विडम्बनापूर्ण आचरण भी उन्हें स्मरण हो आता और वे प्राय: यह कहते-माता मैं उन साधुओं में नहीं हूं जो पुत्र देते हैं। 

स्वामी के चरित्र का दूसरा गुण उनकी निर्भयता है। अहा, उनकी निर्भीकता का यह सत्य-सत्य वर्णन करना भी कठिन है। जनता की अप्रसन्नता और सर्वसाधारण के विरोध से लूथर जैसे महापुरूष की आत्मा भी कांप गयी थी। उसने अपने स्वतन्त्र विचारों का अभी थोड़ा ही परिचय दिया था कि पोप की ओर से उसके मार्ग में कांटे बिछाये जाने लगे। उसने तो यहां तक कहा कि यदि पोप और उसके साथी उसका पीछा छोड़ दें तो वह भी अपने लेखों और वक्तृता द्वारा उसका खण्डन बंद कर देगा। पोप तथा उसके निर्बुद्घि मित्रों ने इस बात का आग्रह किया कि लूथर अपने प्रकट किये हुए विचारों को फेर ले, आगे के लिए शपथ ले कि वह ऐसा कार्य कदापि न करेगा। परिणाम यह निकला कि लूथर को अपनी अंतरात्मा के विरूद्घ जाकर ऐसा ही करना पड़ा। परंतु दयानन्द ने पौराणिक मत के केन्द्रों में जाकर इस मत पर लगातार आक्रमण किये, प्रतिपक्षियों के दुर्वचन सहे, विष तक ग्रहण किया, नाना प्रकार के क्लेश सहे, निन्दात्मक वचन सुने परंतु कभी पीछे नहीं हटे। यदि वे मौन रहना ही स्वीकार कर लेते तो पौराणिकों से यथेच्छ पुरस्कार प्राप्त कर सकते थे। परन्तु इस प्रकार का निष्क्रिय जीवन उनका लक्ष्य नहीं था। अनके पंडितों, स्वजातीय ब्राह्मणों, समान आश्रम वाले संन्यासियों और राजा-महाराजाओं ने अनेक बार उन्हें समझाया कि आप मूर्तिपूजा का खण्डन न करें, परन्तु उन्होंने किसी की भी नहीं सुनी और न केवल पौराणिक मतमतान्तरों का खण्डन किया, अपितु समसामयिक शासन से भी न डरकर अनेक बार तो साम्प्रतिक राज्याधिकारियों के सामने ही धर्मविरूद्घ बातों का प्रबल खण्डन किया। अपने उद्देश्य की पूत्र्ति में बाधक न तो शासक की कारा से ही उन्हें भय लगा और न विरोधियों की तलवार ही उन्हें भयभीत कर सकी।
यह उन्हीं का साहस था कि इस विपरीत समय में वे कुलीन महाराजाओं के भ्रष्ट आचरण पर उनके सामने ही निडरता के साथ कटाक्ष करते रहे। न उन्हें प्राणों का भय था और न किसी अन्य बात का। उनके मुख का तेज ही विपक्षियों को भयभीत कर देता था। जितेन्द्रिय महापुरूषों में ही ऐसा दिव्य तेज होता है। स्वामीजी का शरीर ऐसा हृष्ट पुष्ट तथा दृढ़ था कि अत्यन्त साहसी पुरूष भी उनके समक्ष आने में डरते थे। अनेक बार तो जो लोग उनका वध करने का विचार लेकर आये वे उनके तेज को देखकर ही भाग गये। ऐसे समय वे भयकम्पित हो जाते तथा कोई बहाना बनाकर पलायन कर जाते। पंडित लेखराम ने उनके शारीरिक बल की अनेक कथाएं लिखी हैं।
एक बार स्व. विक्रमसिंह ने ब्रह्मचर्य की चर्चा के प्रसंग में कहा कि लोग कहते हैं कि ब्रह्मचर्य से अपूर्व बल प्राप्त होता है। स्वामी जी ने इसका अनुमोदन किया और कहा शास्त्रों में भी ऐसा ही लिखा है कि ब्रह्मचर्य पालन से बल प्राप्ति होती है। इस पर सरदार साहब ने चट कहा, आप भी तो ब्रह्मचारी हैं, किन्तु आपमें तो ऐसा बल प्रतीत नहीं होता। स्वामीजी उस समय तो मौन रहे किन्तु जब सरदार विक्रमसिंह अपनी बग्घी पर चढक़र चले, तो स्वामीजी ने पीछे से बग्घी को पकड़ लिया। घोड़ा चलने से रूक गया। जब सरदार ने पीछे देखा तो स्वामीजी ने हंसकर कहा कि यही ब्रह्मचर्य का बल है, जो मैंने आपको दिखाया है।
एक अन्य घटना इस प्रकार है। स्वामीजी एक सडक़ पर जा रहे थे। उसी स्थान पर एक बैलगाड़ी को कीचड़ में फंसे हुए उन्होंने देखा तो निकल नहीं रही थी। गाड़ी वाला बैलों को मारता, किन्तु बात नहीं बन रही थी। जब स्वामीजी ने यह दृश्य देखा तो उन्होंने बैलों को खोलकर एक ओर खड़ा कर दिया और अकेले ही माल से लदी गाड़ी को खींचकर कीचड़ से बाहर ला खड़ा किया।
मैडम ब्लैवेट्स्की ने उनके बारे में लिखा है-”उनकी शरीरकृति आकर्षक और सुडौल है। कद लम्बा, गौर वर्ण यूरोपियनों की भांति, नेत्र दीर्घ तथा मुखाकृति भव्य है। इनकी वाणी में गम्भीरता है जो उपदेश के समय मधुर तो होती है किन्तु पौराणिकों के मिथ्या विश्वासों का खण्डन करते समय उग्र तथा भयंकर हो जाती है। जहां-जहां वे जाते और लोग उनकी चरणधूलि लेने के लिए तत्पर रहते हैं। वे केशवचन्द्र सेन की भांति किसी नये मत की शिक्षा नहीं देते और न नये नियम ही बनाते हैं।”
अपनी दिनचर्या में स्वामीजी ईश्वरोपासना तथा व्यायाम को कभी नहीं छोड़ते थे। यद्यपि संन्यासियों के लिए कर्मकाण्ड की अनिवार्यता नहीं है, किन्तु स्वामीजी के लिए प्राणायाम पूर्वक संध्योपासना तथा व्यापार अनिवार्य आचरण था। जब कार्याधिक्य हुआ तो व्यायाम में थोड़ी कमी भी आई, जिसके फलस्वरूप वे कभी-कभी रोग के भी शिकार हुए। तथापि शारीरिक श्रम को उन्होंने कभी नहीं त्यागा।
स्वामी के विरोधी उन्हें क्रोधी कहते हैं, परन्तु वे क्रोध का लक्षण नहीं जानते। क्रोध अनुचित सन्ताप को कहते हैं, जो ईष्र्या, द्वेष, अभिमान, आत्मश्लाघा से उत्पन्न होता है। स्वामी में ये दुर्गुण थे ही नहीं। उनकी वाणी और लेखन में कहीं असभ्यता तथा अभद्रता दिखाई नहीं पड़ी।
अत्यन्त सूक्ष्म विषयों पर शास्त्रार्थ करते हुए भी उन्होंने कभी अनुचित भाषण नहीं किया। उनके जैसे निर्लोभी तथा विरक्त पुरूष को पाप और अधर्म पर क्रोध आना तो स्वाभाविक ही था, क्योंकि ऐसे अवसर पर क्रोध न आना ही पाप बन जाता है। इसीलिए परमात्मा ने अधर्मी पापियों की ताडऩा करने के लिए मनुष्य को क्रोध की शक्ति प्रदान की है। जो मनुष्य इस परिस्थिति में ऐसा आचरण नहीं करता, वह स्वधर्म से पतित हो जाता है। इसमें प्रमाण यह है कि वेदों में भगवान को ‘मन्यु रूप’ (सात्विक क्रोध-युक्त) कहा है तथा उनसे मन्यु देने की प्रार्थना की गयी है-‘मन्युरसि मन्युर्मयिधेहि।’
हां, यह अवश्य है कि स्वामीजी में उपहास, व्यंग्य तथा कभी-कभी तीव्र कटाक्ष करने की प्रवृत्ति अवश्य थी। किन्तु उनका हास्य और व्यंग्य भी असभ्य नहीं होता था। वाद विवाद तथा शास्त्रार्थ के समय वे कुछ न कुछ उपहास की बात अवश्य कह देते। महापुरूषों में ऐसे हास्य की प्रवृत्ति होती ही है। सुकरात और अफलातून जैसे दार्शनिकों में भी ऐसी वृत्ति दिखाई पड़ती है। महापुरूषों में दुष्टता, पाप और अधर्म के प्रति अमर्ष (क्रोध) का भाव तो सदा रहता ही है। आप लूथर के लेखों को पढ़ें, पैगम्बर मोहम्मद के जीवन चरित को देखें, गुरू गोविन्द सिंह की वाणी को सुनें, शंकराचार्य की कृतियों को देखें, हमें इन सभी महापुरूषों के आचरण तथा कृतित्व में उचित सीमा का क्रोध तथा हास्य की वृत्ति दिखाई देती है, परन्तु स्वामीजी की रचनाओं में वैसा हल्कापन तथा असभ्यता दिखाई नहीं देती-जैसी ईसाई पादरियों के लेखन में है। प्राय: मौलवियों, पादरियों तथा पौराणिक पंडितों के द्वारा प्रयुक्त वचनों को सुनकर तो सुनने वालों को ही लज्जा आती है, और आश्चर्य है कि ऐसे क्षुद्रमनस्क व्यक्ति ही स्वामीजी पर क्रोधी होने का दोष लगाते हैं।
वास्तव में क्रोध क्या है?-इसका पता तो तब लगे जब इन लोगों को वैसे ही कुुवाच्य वचनों तथा आक्रमणों का सामना करना पड़े-जैसा स्वामीजी के प्रति होता रहा था। लोग उन्हें नास्तिक, अंग्रेजों का गुप्तचर आदि न जाने क्या-क्या कहते थे?
पीछे ही नहीं, प्रत्यक्षतया उन पर आरोप लगाने में नहीं चूकते थे, तथापि स्वामीजी ने कदापि अपने विषय से हटकर उस गालीवर्षण की ओर ध्यान नहीं दिया। मैं समझता हूं कि जिस परिस्थिति में स्वामीजी को काम करना पड़ा, उसे देखते हुए तो हमें उनकी सहनशीलता की ही प्रशंसा करनी चाहिए, किन्तु आश्चर्य है कि लोग उन पर क्रोधी और असहिष्णु होने का आरोप लगाते हैं।
स्वामीजी के हास्य के कुछ नमूने
1. किसी व्यक्ति ने पूछा कि आप मुलतानी मिट्टी शरीर पर क्यों लगाते हैं?
उत्तर में स्वामीजी ने कहा कि यदि कोई मक्खी शरीर पर बैठेगी तो उसका मुख मिट्टी से भर जाएगा।

2. हरिद्वार की हर की पैड़ी को ‘हाड़ की पैड़ी’ कहते थे, क्योंकि वहां मृतकों की हड्डियां डाली जाती हैं।

3. एक बार हरिद्वार में पूछने लगे कि इन साधुओं में से किसकी दुकान अधिक चलती है।

4. जब कोई पंडित शास्त्रार्थ करने में यह आपत्ति करता है कि स्वामी जी का दर्शन करना भी पाप है तो बिना क्रोध किये कहते कि बीच में पर्दा डाल लो, परंतु शास्त्रार्थ अवश्य करो।
स्वामीजी का प्राय: ऐसे लोगों से भी वास्ता पड़ता था जो उनके प्राणों के ग्राहक बने रहते थे। इस प्रसंग में मैडम ब्लैवेट्स्की ने एक घटना का उल्लेख इस प्रकार किया है-हिन्दू देवमाला में नाग को भी देवता माना गया है। इसे शिव के कण्ठ का भूषण कहा गया। यही नाग शेषनाग के रूप में विष्णु की शैया भी है। एक बार स्वामीजी का सामना एक ऐसे ही नागपूजक ब्राह्मण से हुआ, जिसने वार्तालाप प्रसंग में अचानक उग्र होकर स्वामीजी के ऊपर उस सांप को फेंक दिया जो उसने अपनी टोकरी में छिपा रखा था और कहा अब महादेव का यह सर्प ही इस बात का न्याय करेगा कि सत्य का पक्ष किसका है? उसे तो यह पक्का विश्वास था कि सांप स्वामीजी का प्राणान्त कर देगा, परंतु हुआ उलटा ही। स्वामीजी ने एक ही झटके में सांप को हाथ से पकड़ लिया और तत्काल उसके सिर को कुचल डाला। तब उस ब्राह्मण की ओर अभिमुख होकर कहा-तेरे देवता ने तो बहुत देर लगाई और मैंने इसका झटपट फैसला कर दिया। फिर उपस्थित लोगों से कहा-जाओ और लोगों को बताओ कि झूठे देवताओं का यही हाल होता है।
स्वामीजी के साहस क्षमता तथा सहनशीलता के बारे में मैडम ब्लैवेट्स्की उक्त पुस्तक में लिखती है-‘कई बार तो ऐसा लगता है कि मानो इस महापुरूष के जीवन में कोई जादू है, क्योंकि वह भारत में प्रचलित अंधविश्वासों का भयंकर विरोध करता है। विपक्षियों के क्रोध से भी उसके मन में क्षोभ नहीं होता, लगताा है मानो वह प्रस्तर की मूर्ति ही है।’
प्रस्तुति : ज्ञान प्रकाश वैदिक

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