Categories
आज का चिंतन

श्री सम्प्रदाय के श्रीयामुनाचार्यजी राजा भी और सन्त भी

आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी

अल्पायु में पिता की छत्रछाया छिनी :-
संवत् 965 में आचार्य नाथमुनि अवतरित हुए हैं। उनके पुत्र का नाम ईश्वरमुनि तथा पौत्र थे यामुनाचार्य। ये सभी वैष्णव संप्रदाय से जुड़े हुए थे। बालक यामुनाचार्य विक्रमी संवत् 1010 को दक्षिणात्य आषाढ़ माह के उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में काट्टुमन्नार् कोविल, वीर नरायणपुराम , वर्तमान मदुरा के मन्नारगुडी गांव में पैदा हुए थे। बाद में इन्हे आळवन्दार् के नाम से जाना जाने लगा। वे अभी मात्र दस वर्ष के थे कि पिता ईश्वरमुनि की मृत्यु हो गई। पौत्र को भगवान के सहारे छोड़कर दादा नाथ मुनि ने संन्यास ले लिया था।
अलौकिक प्रतिभाएं
यामुनाचार्य का लालन-पालन पिता के अभाव में उनकी दादी तथा माता ने किया था। बचपन से ही उनकी अलौकिक प्रतिभा सामने आ गई थी। उनके गुरु थे, भाष्याचार्य। उनसे शिक्षा पाकर वह थोड़े समय में ही शास्त्रों में पारंगत हो गए थे। उनका स्वभाव मधुर था, इसलिए उनकी ओर लोग खिंचे चले आते। श्री आळवन्दार ने अपना विद्याध्यन, अपनी प्रारंभिक शिक्षा महाभष्य भट्टर् से प्राप्त किया था। उन दिनों पंडितों को मुख्य पंडित को कर चुकाना पडता था। उस समय काल में राजदरबार के विद्वान पंडित, राज पुरोहित कोलाहल थे।यामुनाचार्य के गुरु भाष्याचार्य एक बार राजा के दरबारी ‘कोलाहल नामक दिग्विजयी पंडित से शास्त्रार्थ में हार गए।
यामुनाचार्य ने शास्त्रार्थ करने को ललकारा था:-
एक बार आर्थिक तंगी के कारण यामुनाचार्य गुरु दो-तीन वर्ष तक कर नहीं दे पाए। एक दिन कोलाहल का एक शिष्य ‘वंजि’ आया और बकाया कर की वसूली के लिए वहां बैठे यामुनाचार्य को अपशब्द बोल दिए। गुरु की अनुपस्थिति में बारह वर्षीय इस शिष्य ने वंजि से कह दिया अपने गुरु तथा राजा को मेरा संदेश दे देना कि मैं उन महापंडित ‘कोलाहल’ जी से शास्त्रार्थ करके उन्हें पराजित कर दूंगा।
कोलाहल अपने प्रतिनिधियों को पंडितों के पास भेज कर उनसे कर वसुल करने को कहते थे। इसे सुनकर महाभाष्य भट्टर् चिन्तित हो जाते हैं और यामुनाचार्य जी से कहते हैं के वो इसका ख्याल रखेंगे। यामुनाचार्यजी एक श्लोक भेजते हैं, जिसमे वह स्पष्ट रूप से कहते है, वह उन सब कवियों का जो अपना स्वप्रचार के लिये अन्य विद्वानों पर अत्याचार करते है, उनका नाश करेंगे। यह देखकर कोलाहल को गुस्सा आता है और अपने सैनिकों को यमुनाचार्य को राजा के अदालत में लाने के लिए भेजता है।
यामुनाचार्यजी उन्हें बताते हैं कि वह केवल तभी आएगें जब उसे उचित सम्मान की पेशकश की जाएगी।
जब यह बात राजा तथा पंडित तक पहुंची, तो वह तिलमिला उठे। राजा ने यामुनाचार्य को लाने के लिए सवारी (डोला )भेज दी। तब तक गुरु भाष्याचार्य भी आ चुके थे। वह डरे हुए थे । शिष्य ने कहा, आप चिंता न करें। मैं उन्हें पराजित कर हर वर्ष देने वाले कर से आपको मुक्ति दिला दूंगा।
यामुनाचार्य जी अदालत आते हैं। वाद शुरू होने वाला है, रानी राजा को बताती है कि उन्हे यकीन है कि यामुनाचार्य जी जीतेगा और यदि वह हारेंगे तो वह राजा का सेवक बन जाएंगी। उधर राजा को भरोसा था कि कोलाहल जीतेंगे और वो कहते हैं कि अगर यामुनाचार्य जी जीतते हैं, तो राजा उन्हे आधा राज्य दे देंगे।
दोनो विद्वानो के मध्य शास्त्रार्थ हुआ। उस समय रानी भी वहां उपस्थिति थी। यमुनाचार्य ने 3 प्रश्न पूछे थे जो इस प्रकार है —
पहला – आप ( अक्की आलवान ) के माताजी बंध्या (बाँझ ) स्त्री नहीं है।
दूसरा – हमारे राजा धार्मिक पुण्यवान है, हमारे राजा समर्थ (काबिल/योग्य/सक्षम) है।
तीसरा – राजा की पत्नी (महारानी) पतिव्रता स्त्री है।
यह प्रश्न कर यमुनाचार्य ने कहा अब इन तीनो का खण्डन अपने शास्त्रार्थ के नैपुण्य से करिये । ये तीन प्रश्न सुनकर कोलाहल दंग रह गए । वह एक भी प्रश्न का खण्डन नही कर पाए क्योंकि, इन प्रश्नो का खंडन स्वयं की माता को बाँझ बताना , राजा को अधर्मी बतलाना और महारनी के पतिव्रत्य पर आक्षेप लगाना होता। वह ऐसे असमंजस मे पड गए की अगर वह जवाब दे तो राजा बुरा मान जायेंगे और अगर इसका समाधान नही (खण्डन) करें तो भी राजा बुरा मानेंगे क्योंकि वह एक बालक से हार गए । इसी विपरीत चिंतित अवस्था मे वह यामुनाचार्य से अपनी पराजय स्वीकार कर लेते है। यमुनाचार्य को ही इन प्रश्नो का खंडन कर समाधान करने की बात कहते है । इसके उत्तर मे यामुनाचार्य कुछ इस प्रकार कहते है।

पहला – शाश्त्रों के अनुसार , वह माँ बाँझ (निस्संतान) होती है जिसका एक ही पुत्र/पुत्री हो (आप अपनी माँ की एकलौती संतान हो, अतः आपकी माँ एक बाँझ (निस्संतान) स्त्री है ) ।

दूसरा – शास्त्रों में बतलाया है की , प्रजा के पाप पुण्य में राजा का भी भाग होता है, ऐसे में प्रजा के पाप का भागी होने से पुण्यवान नहीं कहलाता । हमारे राजा बिलकुल भी काबिल/समर्थ नही है क्योंकि वह केवल अपने राज्य का ही शासन करते है पूरे साम्राज्य के अधिपति नही है।

तीसरा – शास्त्रों के अनुसार राजा में अन्य देव भी विद्यमान रहते है , विवाह के समय कन्या को , पहले वेद मंत्रों से देवतावों को अर्पित करते है। इस कारण रानी को पवित्र नही मानते है।
कोलाहल’ यामुनाचार्य के सक्षम और आधिपत्य को स्वीकार करते हुए अपने आप को यमुनाचार्य से पराजित मानकर उनके शिष्य बन जाते है । राजाने ही निर्णय सुनाया। बारह वर्षीय बालक से हमारे ‘कोलाहल’ हार गए। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार आधा राज्य दे दिया। महान बहादुरी और ज्ञान के साथ, यामुनाचार्य जी ने कोलाहल के खिलाफ वाद जीता। कोलाहल इतने प्रभावित हो जाते हैं कि वो भी यामुनाचार्य जी का शिष्य बन जाते हैं। रानी ने उन्हें “आळवन्दार्” नाम उपाधि में दिया – वह जो उनकी रक्षा करने आये थे । पांडव देश की रानी शर्त रखी थी – अगर वह जीतते नही तो, रानी एक नौकर बन जाएगी। बाद में रानी भी उनकी शिष्य बन जाती हैं। राजा द्वारा वादा किए गए अनुसार यामुनाचार्य (आळवन्दार्) को आधा राज्य भी मिलता है।यामुनाचार्य की अभी केवल बारह वर्ष की आयु थी, अपनी प्रखर बुद्धि के बल पर पांडव राज्य का आधा हिस्सा अपने अधिकार में कर लिया।
यामुनाचार्य शाश्त्रों के आधार पर दिव्य स्पष्टीकरण से विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त की स्थापना करते है । महारानी उन्हें आळवन्दार नाम से सम्बोधित करती हैं (जिसका मतलब हैं की वह जो उनकी रक्षा करने , सब पर विजय पाने के लिए आये हैं) और उनकी शिष्या बन जाती हैं । राजा महारानी को दिए वचन अनुसार यामुनाचार्यजी को अपना आधा राज्य दे देता है |
श्री रंगनाथ के सेवक बने :-
एकदिन यामुनाचार्य से राम मिश्र मिलने आए। वह यामुनाचार्य के दादाजी के शिष्य थे। उन्होंने कहा महाराज आप मेरे साथ चलें। आपके दादाजी बहुत बड़ा खजाना छोड़ गए थे, इसे संभाल लीजिए। राजा यामुनाचार्य उसके साथ हो लिए। पैंतीस वर्षीय राजा को रंगनाथ मंदिर पहुंचाया गया। रास्ते में राम मिश्र का स्पर्श पा लेने तथा उनके भगवदविचार सुन लेने के कारण राजा यामुनाचार्य का हृदय बदल गया। वह भी रंगनाथ के सेवक बनकर वहीं रहने लगे। उन्होंने अपना राज्य भी त्याग दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने दादा द्वारा छोड़ा गया सच्चा धन प्राप्त कर लिया। उनके लिखे चार ग्रंथ हैं स्तोत्ररत्न, सिद्धित्रय, आगमप्रमाण्य और गीतार्थ संग्रह। श्रीरामानुज इनके प्रिय शिष्य हुए। यामुनाचार्य ने इस शिष्य को मृत्युपूर्व याद तो किया, मगर उन्हें बिना देखे चल बसे।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
onwin giriş
onwin giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş