Categories
गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-74

गीता का तेरहवां अध्याय और विश्व समाज

संसार के जितने भर भी चमकते हुए पदार्थ हैं-उनमें वह परमपिता परमेश्वर ज्योति की ज्योति अर्थात परम-ज्योति बनकर विराजमान है। यही वेद कहता है -‘ज्योतिषां ज्योतिरेकम्।’ वह अंधकार से परे है-वेद भी कहता है-‘तम स: परस्तात्’- श्रीकृष्ण जी भी उस ‘ज्ञेय’ का अर्जुन को कुछ ऐसा ही पता दे रहे हैं।
ज्योति में ज्योति वह परमेश्वर है महान।
अंधकार से है परे ऐसा-ऐसा जान।।
वही ‘ज्ञेय’ है, उसे ढूंढऩे की, खोजने की और उसे ही पाने की आवश्यकता है। वह महा चैतन्य है। वह ‘महाचैतन्य’ यदि पा लिया, खोज लिया या ढूंढ लिया तो सभी ज्योतित पदार्थों का विज्ञान अपने आप ही समझ आ जाएगा। वह आत्मा की आत्मा है-इसलिए वह परमात्मा है। परमेश्वर के विज्ञान में और उसके साम्राज्य में सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश है। वहां अंधकार का लेशमात्र भी नहीं है।
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि अर्जुन! मैंने तुझे ‘ज्ञेय’ या ‘क्षेत्रज्ञ’ के विषय में या उसके ज्ञान के विषय में जो कुछ बताया है-इसे जानकर मेरा भक्त मेरी भावना को पाने के योग्य बनता है। ऐसा भक्त यह समझ जाता है कि उससे मेरी अपेक्षा क्या है? मैं सभी जीवों को सन्मार्ग पर लाना चाहता है। सभी प्राण धारियों में मनुष्य सबसे ज्ञानवान है। इसलिए मेरे भक्त यह समझ जाते हैं कि मैं उन्हें संसार की कीचड़ से मुक्ति दिलाकर आनन्दधाम अर्थात मोक्षधाम की ओर लेकर चलना चाहता हूं। जो भक्त मेरी इस भावना को समझ जाते हैं-वह मुझमें अपना मन डाल देते हैं। अपने मन को मुझमें डालने का अभिप्राय है कि वे अपने मन पर अधिकार स्थापित कर लेते हैं। ईश्वर परायण हो जाते हैं। जो मनुष्य ईश्वर परायण हो जाते हैं उन्हें संसार के प्रत्येक कार्य को करने में आनन्द आने लगता है। ऐसे लोगों को संसार के लोगों से किसी प्रकार की शिकायत नहीं रहती। वे समझ जाते हैं कि यह संसार ऐसे लोगों से बना है जो ना चलने वाले बच्चे को चलना सिखाते हैं और उसे गिरने से रोकते हैं-पर जब वह चलना सीख जाता है, तो उस सब गिराने लगते हैं। जहां पर ऐसे लोग मिलते हों और जहां पर ऐसे लोगों का मिलना ही अनिवार्य हो-वहां पर कैसी शिकायत? किसकी शिकायत? और किससे शिकायत?
ईश्वर पारायण भक्त प्रकृति के मायाजाल से मुक्त होकर ईश्वर की शरण में आ जाते हैं।
प्रकृति पुरूष और परमात्मा
तेरहवें अध्याय के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि प्रकृति और पुरूष ये दोनों अनादि हैं। प्रकृति के विकार और गुण (त्रिगुण) ये सभी प्रकृति से ही पैदा होते हैं। यह प्रकृति जड़ है। पुरूष चेतन है। परमात्मा परम चेतन है। वह चेतनों में भी चेतन परम चेतन है। संसार में कार्य-कारण का सिद्घांत काम कर रहा है। प्रकृति भी इसी नियम के वशीभूत होकर कार्य कर रही है। पुरूष प्रकृति में स्थित होकर प्रकृति से पैदा होने वाले गुणों का भोग करता है।
इन गुणों के साथ संग हो जाना ही इस पुरूष के अच्छी या बुरी योनियों में जनम लेने का कारण बनता है।
मनुज की जैसी संगत होत है वैसी रंगत होय।
परमपुरूष को जानता जो शिष्य गुरू का होय।
जैसी संगत होती है वैसी रंगत मिलती है। इस देह में परम पुरूष है, जिसे परमात्मा कहा जाता है। वह परम पुरूष ऐसे गुरू की शरण में जाने से ही मिलता है जो स्वयं उससे साक्षात्कार करता हो। जिसका अपना उससे परिचय हो गया हो-वही तो शिष्य को बताएगा कि वह ऐसा-ऐसा है और ऐसे-ऐसे मिलता है? उसे ही विद्वान लोग अनुमन्ता भी कहते हैं, कत्र्ता कहते हैं, भोक्ता और उसे ही महेश्वर कहते हैं। वह अनुमन्ता इसलिए है कि उसे जानकर जीव में ऐसी चेतना या विवेकशक्ति आती है कि जो जीवन जी रहा हूं-वह मनुष्य के योग्य नहीं है, मेरे भीतर तो पाशविकता है या राक्षसपन है इत्यादि। ऐसी सोच से व्यक्ति का परिष्कार होने लगता है।
ईश्वर भत्र्ता इसलिए है कि वह हमें संसार समर में पराजित नहीं होने देता, हमारी जीवन बैटरी को चार्ज किये रखता है। अपने भक्तों को वह निराशा-निशा में डूबने नहीं देता, सदा प्रोत्साहित रखता है। उनमें ऊर्जा भरे रखता है। जो इस प्रकार के प्रकृति पुरूष और परमात्मा के विषय में जान जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। संसार के कुछ लोग ध्यानयोग, कुछ ज्ञानयोग से और कुछ कर्मयोग से अपने आत्मा को देख लेते हैं। जबकि कुछ लोग दूसरे लोगों से इनके विषय में सुनकर ही मृत्यु को तर जाते हैं।
संसार में जो कुछ उत्पन्न हो रहा है-वह ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के संयोग से ही उत्पन्न हो रहा है। इस चराचर जगत में अविनाशी परमेश्वर को देखने का प्रयास करना चाहिए। वह सम्पूर्ण जड़ जगत में और चेतन में समभाव से विराजमान है। ईश्वर को जो सर्वत्र विराजमान, विद्यमान देखते हैं-वे परमगति को प्राप्त करते हैं। आत्मा को अकत्र्ता मानना चाहिए, वह कर्म करने वाला नहीं है। जो ऐसा सोचता है-वास्तव में वही देखता है। जब साधक यह समझ जाता है कि प्रकृति का मायावाद अलग है और वह आत्मा-परमात्मा का जगत अलग है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
हे कौन्तेय! यह अविनाशी परमात्मा शरीर में रहता हुआ भी न कुछ कर्म करता है और न किसी कर्म में लिप्त होता है। ऐसी ही स्थिति इसमें रहने वाले आत्मा की भी है। जैसे यह सूर्य सारे लोक को प्रकाशित करता है-वैसे ही यह ‘क्षेत्रज्ञ’ अर्थात क्षेत्र का स्वामी सम्पूर्ण ‘क्षेत्र’ को प्रकाशित करता है। विद्वान लोग इस ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के अंतर को जानकर परम पद को प्राप्त करते हैं।
जब ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ का अन्तर स्पष्ट हो जाता है-तब कर्म और उसके फल की आसक्ति का अन्तर या रहस्य भी स्वयं ही प्रकट हो जाता है। यही गीता का मूल विषय है। ‘क्षेत्र’ अलग है-‘क्षेत्रज्ञ’ अलग है। इसी प्रकार कर्म अलग है और उसका फल अलग है। कर्म क्षेत्र में किया जाता है-इसीलिए उसे ‘कर्मक्षेत्र’ कहा जाता है। फल क्षेत्रज्ञ के हाथों है। कर्मक्षेत्र में जो पुरूषार्थ किया उसका फल कोई और देगा।
विनोबा भावे जी कहते हैं-”आंखों से हम जिस रूप को देखते हैं-उसे हम मूत्र्ति आकार, देह कहते हैं। इस देह के भीतर, इससे पृथक एक तत्व है- जिसे आत्मा कहते हैं। देह तो आत्मा का ऊपरी छिलका है, इसके भीतर जो इस फल का गूदा है उसी को हमने चखना है। नारियल फोडक़र भीतर जो है-उसे पाना है। कटहल पर बाहर कांटे भरे रहते हैं तो भी भीतर बढिय़ा रसीला गूदा रहता है, भीतर और बाहर का यह पृथक्करण आवश्यक है। बाहय देह और भीतरी आत्मा-इस तरह प्रत्येक वस्तु का दोहरा रूप है। कर्म में भी यही बात है। बाहरी फल कर्म का शरीर है और कर्म की बदौलत जो फल कर्म का शरीर है और कर्म की बदौलत जो चित्त शुद्घि होती है वह कर्म का आत्मा है। गीता क्या कहती है? गीता का कहना है कि कर्म के फल का संग छोड़ दो यह तो कर्म रूपी नारियल का बाहरी छिलका है, कर्म से चित्त शुद्घ होती है, उसे पकड़ो, यह कर्मरूपी नारियल का भीतरी गूदा है। यह भावना तब जाग जाती है जब हम शरीर तथा आत्मा को अलग-अलग देखने लगते हैं, आत्मा-अनात्मा में भेद करने लगते हैं।” क्रमश:

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
milanobet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
interbahis giriş
interbahis giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vipslot giriş
vipslot giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
aresbet giriş
aresbet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
Grandpashabet Giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
vipslot giriş
vipslot giriş
orisbet giriş
orisbet giriş
bahiscasino giriş
bahiscasino giriş
perabet giriş
perabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş