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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-83

गीता का सोलहवां अध्याय
माना कि अर्जुन तू और तेरे अन्य चार भाई दुर्योधन और उसके भाइयों के रक्त के प्यासे नहीं हो, पर तुम्हारा यह कत्र्तव्य है कि संसार में ‘दैवीय सम्पद’ लोगों की सुरक्षा की जाए और ‘आसुरी सम्पद’ लोगों की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए उनके विरूद्घ युद्घ किया जाए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो संसार में दैवी सम्पदा जन समाप्त हो जाएंगे। दैवीय सम्पद लोगों को समाप्त कराने का पाप तू मल ले। उनकी रक्षा कर। यदि ये ‘दैवीय सम्पद’ लोग समाप्त हो गये तो अर्जुन यह समझ लेना कि यह संसार ही समाप्त हो जाएगा। आसुरी सम्पद लोगों को तुम जैसे वीरों को अपना स्वाभाविक शत्रु मानना चाहिए। क्योंकि तुम जैसे लोग ईश्वरीय व्यवस्था के संवाहक और संचालक होते हैं। ईश्वर अपनी व्यवस्था को निरन्तर गतिशील बनाये रखना चाहते हैं और उनकी व्यवस्था की यह गतिशीलता तेरे जैसे लोगों के हाथों में ही सौंपी जाती है। अत: तू यह समझ कि युद्घ करके ‘आसुरी सम्पद’ लोगों का नाश करके तू कितने बड़े पुण्य का भागी बनने जा रहा है?
हमारे शास्त्रों में ‘दैवीय सम्पद’ और ‘आसुरी सम्पद’ लोगों के मध्य शाश्वत संघर्ष होने की कल्पना की गयी है। इसका अभिप्राय भी यही है कि संसार पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए सृजनकारी अर्थात ‘दैवीय सम्पद’ लोगों में और विध्वंसकारी अर्थात ‘आसुरी सम्पद’ लोगों में निरन्तर संघर्ष होता रहता है। इसी संघर्ष के लिए महाभारत का साज सजा। उस साज के बजाने में अर्जुन कोई प्रमाद न कर बैठे या मोहवश कोई ऐसा निर्णय न ले बैठे जो अतार्किक हो, इसीलिए उसे ‘गीतामृत’ चढ़ाया जा रहा है।
 वास्तव में विद्वानों की दृष्टि में अर्जुन आज एक ऐसा न्यायाधीश बन चुका है जिसने मुकदमा तो सुन लिया है पर वह दण्ड देने में भयभीत हो रहा है। क्योंकि जिन्हें वह दण्ड देने वाला है-ये सभी उसी के ‘अपने’ हैं। इस अपने के भाव को श्रीकृष्ण जी अर्जुन के मनमस्तिष्क से हटा व मिटा देना चाहते हैं। 16वें अध्याय में उसे बता रहे हैं कि अर्जुन तू स्वयं ‘दैवी सम्पद’ लोगों में से एक है, तुझे ‘दैवी सम्पद’ सम्पन्न लोगों को ही अपना मानना चाहिए और उन अपनों को मिटाने वालों को अपना स्वाभाविक शत्रु मानना चाहिए।
‘दैवी सम्पद’ तथा ‘आसुरी सम्पद’ प्रकृति के परिणाम
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि अर्जुन ‘दैवी सम्पद’ मोक्ष देने वाली है अर्थात परमकल्याणकारी और आनन्द देने वाली हैं। ‘दैवी सम्पद’ को जो लोग हृदय से अपने जीवन में अपना लेते हैं, उनके जीवन का कायाकल्प हो जाता है। ‘दैवी सम्पद’ सम्पन्न लोग संसार के लिए सबसे श्रेष्ठ पथप्रदर्शक होते हैं। उनकी आत्मा की श्रेष्ठता और पवित्रता को लोग नमन करते हैं और उनका अनुयायी बनने में स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
इसके विपरीत ‘आसुरी सम्पद’ बंधन में डालने वाली है। जो लोग आसुरी सम्पद को अपना लेते हैं वे संसार में नाना प्रकार के कष्टों और दु:खों को पाते हैं। इतना ही नहीं मैं संसार के अन्य प्राणियों को अपने कुकर्मों से कष्ट पहुंचाते रहते हैं। संसार के जन ऐसे ‘आसुरी सम्पद’ लोगों की प्रतीक्षा करते रहते हैं। वे सोचते रहते हैं कि यह दुष्ट इस संसार से जितनी शीघ्रता से चला जाए-उतना ही अच्छा है। उनका जीवन कष्टमय होता है। तू अर्जुन अपने आपको समझ और दु:खी मत हो। क्योंकि तू ‘दैवी सम्पद’ लेकर जन्मा है। तेरे पास वास्तव में ही ‘दैवी सम्पद’ की बहुत बड़ी पूंजी है। तू इसे व्यर्थ मत गंवा। इसके मूल्य को समझ। जब तू इसके मूल्य को समझ जाएगा तो तेरे स्वयं का मूल्य बहुत अधिक बढ़ जाएगा।
अर्जुन के शुभकर्मों की पड़ताल करके श्रीकृष्णजी उसे बता रहे हैं कि यह तो तेरे लिए परम सौभाग्य की बात है कि तू ‘दैवी सम्पद ‘ लेकर जन्मा है। तुझे स्मरण रखना चाहिए कि इस संसार में दो प्रकार के प्राणियों की सृष्टि है। उनमें एक हैं-दैवी तो दूसरे हैं आसुरी। अभी तक दैवी सम्पद के प्राणियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। अब श्री कृष्णजी आसुरी का वर्णन करने लगे हैं।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन ये जो आसुरी प्रकृति के लोग होते हैं-ये अपने कर्मों के विषय में भी नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं? एक प्रकार से अन्धे होकर कार्य करते रहते हैं। जो मन में आया वह कर दिया जो नहीं आया, वह नहीं किया। ऐसे लोगों को प्रवृत्ति और निवृत्ति का कोई ज्ञान नहीं होता। उनमें शारीरिक पवित्रता और मानसिक सदाचार का अभाव होता है। इसी प्रकार आध्यात्मिक सत्य भी उनमें नहीं पाया जाता।
जिसके पास शारीरिक पवित्रता, मानसिक सदाचार और आध्यात्मिक सत्य का अभाव होता है उनकी गति कैसी होती होगी?- यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
जगत को असत्य मानते आसुरी प्रकृति के लोग।
दैवी सम्पदा के लोग तो करें ईश से योग।।
आसुरी प्रकृति के लोग जगत को असत्य मानते हैं। उनकी दृष्टि में यह सृष्टि यूं ही बन गयी और यूं ही चल रही है, वे नहीं जानते कि इसका कोई आधार है और ये यूं ही नहीं बन गयी है इसके बनने के पीछे भी कोई कारण है, कोई रहस्य है, कोई विज्ञान है और किसी व्यवस्थापक का अपना विधान है।
आसुरी प्रकृति के लोगों की दृष्टि में इस सृष्टि का कोई ईश्वर नहीं है। इसके लिए श्रीकृष्णजी ने ‘अपरस्पर सम्भूत’ शब्द का प्रयोग किया है। इसका अभिप्राय है कि यह जगत समाज में व्यक्तियों के मिलने जुलने से नहीं बना। यह तो लोगों की परस्पर की वैयक्तिक स्वार्थपूर्ण कामनाओं से ही बन गया है। इसलिए यह ‘काम हैतुक’ है। इसके पीछे कोई तरतीब नहीं है। इस प्रकार की सोच संसार के जिन लोगों की है-वे व्यक्तिवादी और स्वार्थवादी कहलाते हैं। श्रीकृष्ण जी की बात का अभिप्राय है कि ऐसे लोगों ने ही यह संसार मतलबियों का बना दिया है। ऐसी सोच के कारण ही लोग संसार को ‘मतलब का’ कहने लगे हैं। पश्चिम का भौतिकवाद आज इसी प्रकार की स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति पर आधारित है। हमारे यहां संसार के विषय में ऐसी धारणा चार्वाक जैसे लोगों ने विकसित की थी।
वेदान्ती कहते हैं कि ‘सत्यस्य सत्यम्’ अर्थात सत्य का भी सत्य है और वह जो सत्य का भी सत्य है-वही जगत का आधार है, सारा जगत उसी में प्रतिष्ठित है। इस जगत की प्रतिष्ठा इसी प्रतिष्ठित के कारण है। यह सृष्टि मतलब की नहीं है और ना ही यह मतलब के लिए बनायी गयी है यह तो एक दूसरे के काम आने के लिए और एक दूसरे का हाथ पकडक़र चलने के लिए बनायी गयी है, इसमें सर्वत्र सहयोग और सदभाव की गंगा यमुना बह रही हैं। इन्हीं से इस संसार का सारा कार्य व्यवहार चल रहा है।
जिन लोगों ने संसार को स्वार्थपूर्ण मान लिया और बना दिया-उनके कारण ही संसार की दुर्गति हुई है। क्योंकि ऐसी सोच दुर्गति की सृष्टि करती है और दुर्गति से दुर्मति का होना अवश्यम्भावी है। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि इस प्रकार के स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण को पकडक़र ये अल्पबुद्घि, नष्टात्मा भयंकर कार्य करने वाले लोग जगत के शत्रु बनकर उसके विनाश के लिए उभरा करते हैं।
क्रमश:

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