पूर्वोत्तर के तीन छोटे छोटे प्रान्तों त्रिपुरा, नागालैंड व मेघालय के चुनाव परिणाम आ गए हैं। इन चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि पूर्वोत्तर भी अब भाजपा के भगवा रंग में रंग गया है और कॉंग्रेस को यहाँ से भी चलता कर दिया गया है। त्रिपुरा विधानसभा की कुल 60 सीटों में से 43 सीट जीतकर भाजपा ने वामदल के 25 वर्ष पुराने किले को ध्वस्त करने में गौरवपूर्ण जीत प्राप्त की है। इसी प्रकार नागालैंड में भी भाजपा सरकार बनाने जा रही है। यह अत्यंत चौकानें वाली बात है कि त्रिपुरा और नागालैंड दोनों प्रान्तों में ही कॉंग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई है। मेघालय की विधानसभा की 60 सीटों में से 21 सीट जीतकर कॉंग्रेस बड़े दल के रूप में उभरी है। यद्यपि यहाँ भी उसकी सरकार बनने पर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है।

पूर्वोत्तर में भगवा की इस शानदार जीत को दिलाने में निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी का और उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण योगदान है। साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी वहाँ पर अपने प्रभाव और व्यक्तित्व से भाजपा को अच्छी जीत दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस जीत से कॉंग्रेस शासित राज्यों की संख्या और भी कम हो गई है। जिन प्रदेशों में कॉंग्रेस या अन्य दलों का शासन इस समय है उनमें अब पंजाब, तमिलनाडू, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मिज़ोरम व केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी व दिल्ली सम्मिलित हैं।
भाजपा के पीएम मोदी और अमित शाह बार-बार कॉंग्रेस मुक्त भारत की बात कहते आ रहे हैं और जनता है कि एक के बाद एक प्रदेश को कॉंग्रेस से झटककर भाजपा को दिए जा रही है। इसका अभिप्राय है कि जनता भी सचमुच में परिवर्तन चाहती है। पूर्वोत्तर में काँग्रेस के समय में भारत और भारतीयता को, हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान को मिटाने का गंभीर षड्यंत्र रचा गया। धर्मांतरण के नाम पर यहाँ के राष्ट्रवादी लोगों का जमकर उत्पीडऩ किया गया। यह बहुत ही दुख का विषय रहा कि केंद्र की कॉंग्रेसी सरकारें सारे षडयंत्रों पर आपराधिक मौन साधे रहीं। सोनिया गांधी जब से सत्ता का केंद्र बनीं तब से इन प्रदेशों में और भी तीव्र गति से धर्मांतरण की प्रक्रिया आरंभ हो गयी। इस प्रकार यहाँ के राष्ट्रवादी लोगों को लगा कि उनके बुरे दिनों के लिए केंद्र की कॉंग्रेसी सरकार पूर्णत: जिम्मेदार है। धर्मांतरण के माध्यम से लोगों का मर्मांतरण किया गया और लोगों को राम के स्थान पर रोम से जोडऩे का घातक कुचक्र चलाया गया। यही कारण रहा कि वर्तमान में सम्पन्न हुए चुनावों में चर्च ने भी अपने प्रभाव का पहली बार जमकर प्रयोग किया। चर्च के इस हस्तक्षेप का अर्थ है कि वह यह समझने की भूल कर बैठा था कि यहाँ के लोग अपने देश और अपने राष्ट्रवाद को भूल चुके हैं। जबकि सच यह था कि शासन के उग्रवाद के कारण लोग अपने आप को मौन किए बैठे थे, उन्हे उचित अवसर की प्रतीक्षा थी और उन्होने इन चुनावों को अपने लिए उचित अवसर मानकर अपने मन की बात मतपेटी के माध्यम से व्यक्त कर दी।
जहां तक वामदलों का प्रश्न है तो ये दल प्रारम्भ से भारत और भारतीयता के विरोधी रहे हैं। भारत में मजहबी तुष्टीकरण और मजहबी कट्टरता को हिन्दू के विरुद्ध उभारने में वामदलों का प्रमुख योगदान रहा है। पश्चिम बंगाल में इन्होने जितनी देर भी शासन किया वहाँ पर हिन्दू के विरुद्ध अपनी इसी सोच को ये प्रकट करते रहे और लोकतन्त्र को पूर्णत: एक पार्टी का तंत्र बनाकर उसका अपहरण करने का पूरा प्रबंध इन्होनें कर लिया था। यही स्थिति त्रिपुरा की बना दी गई थी, यहाँ का लोक और तंत्र दोनों ही पिछले 25 वर्ष से कंस की जेल में पड़े थे। अब जब त्रिपुरा की जनता के लिए स्वतंत्र चुनाव करने का पूरा प्रबंध देश के चुनाव आयोग ने किया और उसे यह विश्वास दिलाया गया कि तुम अपने मन की बात कहो- तो जनता ने अपना सही निर्णय सुना दिया। त्रिपुरा की जनता ने देश के अन्य प्रान्तों के लोगों को यह समझाने का प्रयास किया है कि धर्मांतरण एक घातक बीमारी है और यदि इसे नहीं रोका गया तो यह फि र देश तोडऩे का काम करेगा, अत: समय रहते जाग जाओ, अन्यथा पछताना पड़ेगा। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सेकुलरिज़्म देश के लिए और इस देश के धर्म व संस्कृति के लिए सबसे खतरनाक विचार है। जिसे कम्यूनिस्ट अपनी मर्जी से और अपने ढंग से थोपने का काम कर रहे हैं। यह विचार भारत के सर्वसंप्रदाय समभाव के मौलिक चिंतन से सर्वथा विपरीत है। वामदलों के चिंतन में भारत का सर्वसंप्रदाय समभाव एक घिसी पिटी और पुरानी पड़ गई रूढि़वादी सोच का प्रतीक है जबकि सेकुलरिज़्म उनके लिए प्रगतिशीलता का प्रतीक है। यह अलग बात है कि उनका सेकुलरिज़्म भारत की आत्मा को खा रहा है और उनका सर्वसंप्रदाय समभाव का विचार हिन्दू मिटाओ देश मिटाओ के आधार पर कार्य कर रहा है। जो हिन्दू उनकी इस कार्यशैली से सहमत है उन्हे वह सेकुलरिस्ट मानकर प्रगतिशील होने का प्रमाण पत्र देते हैं। हमारे कितने ही लोग इस प्रकार के सम्मान पाने के प्रवाह में बह जाते हैं और जाने अनजाने देश विरोधी होने का काम करने लगते हैं।
भारत अपने सर्वसंप्रदाय समभाव के कारण ही विश्वगुरु था और भविष्य में विश्वगुरु बनेगा। पूर्वोत्तर की जनता ने भगवा में अपनी आस्था व्यक्त करके यह स्पष्ट किया है कि भारत से अब राजनीति छद्मवाद के दिन लद चुके हैं। जनता जाग चुकी है। लोकतन्त्र के लिए यह बहुत ही आवश्यक होता है कि जागरूक होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करे। निश्चित रूप से यह देश हम सबका है। परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं कि जो इसे मिटाने के षड्यंत्र रचते हैं और इस देश के धर्म और संस्कृति को विनष्ट करने की योजनाओं में लगे रहते हैं- यह देश उनका भी है। ऐसे लोगों का विनाश करना और उन्हें उनके सही स्थान पर पहुंचाना जनता और शासन दोनों का काम है। पूर्वोत्तर की जनता ने अपना काम कर दिया है अब देखना होगा कि शासन अपना काम किस प्रकार करता है? जनता के निर्णय को समझकर और उसके मन की बात को जानकर ही शासन को अपने कार्य की शुरुआत करनी होगी। जनता का निर्णय स्पष्ट है कि यहाँ के राष्ट्रविरोधी तत्वों और जनता को धर्मांतरण के नाम पर बरगलाने वाले लोगों के विरुद्ध कठोर से कठोर कार्यवाही हो और जो लोग पूर्वोत्तर को ईसाइयत के रंग में रंगकर देश तोडऩे के कार्य में लगे हुए हैं उनके विरुद्ध कानून उसी प्रकार निपटने की तैयारी करे जैसी अपेक्षा ऐसे लोगों के विरुद्ध देश की जनता को है।
फिलहाल हम पूर्वोत्तर के लोगों का हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होने सही समय पर सही निर्णय लेकर देश कि एकता और अखंडता को बलवती करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब देश की मोदी सरकार को भी देखना होगा कि पूर्वोत्तर से जो संदेश उसे मिला है- उसका सम्मान होना चाहिए।

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