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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-88

गीता का सत्रहवां अध्याय

अन्त में श्रीकृष्णजी तामसिक यज्ञ पर आते हैं। वे कहने लगे हैं कि जो यज्ञ विधिहीन है, जिसमें अन्नदान नहीं किया जाता, जिसमें मंत्र का विधिवत और सम्यक पाठ भी नहीं होता और ना ही कोई दक्षिणा दी जाती है, वह तामस यज्ञ कहलाता है। इस प्रकार के यज्ञों को अशिक्षित, मूर्ख और मतिमूढ़ लोग करते पाये जाते हैं। उन्हें यज्ञ की कोई विधि नहीं आती, इसलिए अपने तरीके से यज्ञ करते हैं। विधिहीन और दक्षिणा आदि से विहीन ऐसा यज्ञ तामस यज्ञ की श्रेणी में आता है। यज्ञ तभी सफल होता है जब उसमें लोककल्याण के लिए कुछ न कुछ दिया जाए। हमारी याज्ञिक परम्परा में दान पर सबसे अधिक प्रकाश डाला गया है। कहा गया है कि बिना दान के यज्ञ सफल नहीं होता। अत: जो लोग बिना दान के यज्ञ करते हैं, उनके ऐसे यज्ञ तामस यज्ञ कहे जाते हैं। इसका कारण यही है कि ऐसे तामस यज्ञ व्यक्ति को संसार के भवसागर से पार लगाने में सहायक नहीं होते, अपितु उल्टा डुबा देते हैं। सात्विक यज्ञ को गीता ने ‘विधिदृष्ट’ कहा है। ‘विधिदृष्ट’ का अभिप्राय है कि शास्त्रों के द्वारा आदिष्ट। गीता सर्वोत्तम यज्ञ सात्विक यज्ञ को ही मानती है-इसलिए वह संसार के लोगों से अपेक्षा करती है कि वे सब सात्विक यज्ञ करें और संसार में सुख शान्ति स्थापित कराने में सहयोगी बनें।
त्रिविध तप क्या हैं?
श्रीकृष्णजी ने अपनी बात को निरंतर जारी रखते हुए आगे त्रिविध तप को स्पष्ट किया है। गीता ने पहले तप के कायिक, वाचिक तथा मानसिक ये तीन भेद किये हैं। कायिक का अभिप्राय काया अर्थात देह से किये जाने वाले तप, वाचिक का अभिप्राय वाणी से किया जाने वाला तप और मानसिक तप से अभिप्राय मन के द्वारा किये जाने वाला तप है।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि देवताओं, ब्राह्मणों, गुरूओं और विद्वानों की पूजा करना, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसापूर्वक जीवन बिताना-यह सब शरीर का तप है। जो लोग संसार में रहकर देवताओं आदि की पूजा करते हैं, अर्थात उन्हें भोजन, वस्त्रादि का दान देकर और उनके रोग, शोक आदि में सम्मिलित होकर उनके निवारण का भी उपाय करते हैं-वे लोग अपने स्वयं के सुख को तिलांजलि देकर-ऐसा करते हैं। इसलिए उनके इस प्रकार के कार्यों को श्रीकृष्णजी ने तप की श्रेणी में रखा है। तप द्वन्द्वों को सहन करने को भी कहा जाता है। संसार में रहकर पवित्र, सरल और ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना बड़ा कठिन है। संसार के सुख और ऐश्वर्य जब व्यक्ति को अपनी ओर खींचते हैं-तो व्यक्ति नैतिक रूप से कई बार स्खलित हो जाता है। यहां कृष्णजी कह रहे हैं कि जो लोग संसार की फिसलन को उपेक्षित कर पवित्र, सरल रहकर ब्रह्मचर्यपूर्वक अहिंसात्मक जीवन यापन करते हैं-वे यथार्थ में शरीर का तप अर्थात कायिक तप करते हैं।
ऐसे वाक्य बोलना जिनसे दूसरे लोग उत्तेजित न हों, उद्विग्न न हों, किसी प्रकार का कष्ट अनुभव न करें, आपके वचनों से स्वयं को पीडि़त या आहत अनुभव न करें-जो सत्य होने के साथ-साथ प्रिय हों अर्थात सबको अच्छे लगते हों, सबके लिए हितकारी हों, अच्छे और उत्कृष्ट साहित्य का स्वाध्याय करना और स्वाध्याय किये हुए का अभ्यास करना-यह वाणी का तप कहलाता है। इस प्रकार के तप से संसार में शान्ति व्याप्त होती है। जिसका अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं होता-वह व्यक्ति कभी भी कोई भी उत्पात कर सकता है अथवा कहिए कि उसकी वाणी उसके नियंत्रण में न होने के कारण उसका कहीं भी अपमान करा सकती है। अत: श्रीकृष्णजी वाणी के तप को अर्थात वाचिक तप को मनुष्य के लिए आवश्यक मानते हुए उससे अपेक्षा करते हैं कि वाणी को सदैव सन्तुलित करके बोलना।
संसार के जितने भर भी युद्घ हुए हैं उन सबका मूल कारण वाचिक तप का अंग होना ही रहा है इसलिए मनुष्य के जीवन में वाचिक तप बहुत महत्वपूर्ण है।
योगेश्वर श्रीकृष्णजी मानसिक तप पर प्रकाश डालते हुए अर्जुन को समझा रहे हैं कि जो लोग अपने मन को प्रसन्न रखते हैं, साम्यता, मौन, आत्मसंयम और चित्त में शुद्घ भावना रखते हैं-वे सभी मानसिक तप करते हैं।
इस प्रकार के वचन बोलकर एक प्रकार से श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को स्पष्ट किया है कि दुर्योधन आदि कायिक, वाचिक और मानसिक तप न करने के कारण इस अवस्था में पहुंच गये हैं कि अब उनका अन्त हो ही जाना चाहिए। यदि ये लोग त्रिविध तप को करने वाले होते तो उनके लिए और संसार के लिए यह दु:खद स्थिति नहीं आती कि लोग इतनी बड़ी संख्या में एक दूसरे को मारने के लिए युद्घ के मैदान में आ डटे होते। इनका तप भंग हो गया अर्थात कायिक, वाचिक और मानसिक तप नष्ट हो गया, इसीलिए इनकी मति भंग हो गयी। जिसका परिणाम यह निकला है कि संसार को एक महाभयंकर युद्घ देखना पड़ रहा है। त्रिविध तप को आज के संसार को इसी दृष्टिकोण से देखना और समझना चाहिए कि यदि तप भंग जाएगा तो परिणाम बहुत ही भयंकर आएगा।
इन तीनों के तपों को यदि मनुष्य फल की आकांक्षा छोडक़र लगन और परम श्रद्घा के साथ करे तो कायिक, वाचिक तथा मानसिक तप सात्विक बन जाते हैं। श्रीकृष्ण जी ऐसे ही सात्विक तप को व्यक्ति और मानव समाज के लिए उपयोगी मानते हैं। यदि संसार ऐसे सात्विक तप को करने वाला बन जाए तो सर्वत्र सुख और शान्ति का साम्राज्य स्थापित होने में देर नहीं लगेगी।
जो लोग इन तीनों प्रकार के तपों को अपने लिए सम्मान पाने, अपनी पूजा कराने, सत्कार कराने, अपने दम्भ, पाखण्ड और दिखावे को प्रदर्शित करने के लिए करते हैं-उनके ऐसे तप राजस कहलाते हैं। श्रीकृष्णजी का मानना है कि ऐसे राजस प्रवृत्ति के लोगों के राजस तप अधिक देर तक नहीं चल पाते, वे अस्थिर होने के कारण नष्ट हो जाते हैं।
जो तप संसार के लोगों द्वारा मूर्खतापूर्ण दुराग्रह के साथ अपने आपको कष्ट देकर या दूसरों को हानि पहुंचाकर उनसे अपना काम निकालने की नीयत से किये जाते हैं-उनके ऐसे तप तामसिक तप कहलाते हैं। इस प्रकार के तप में घोर अज्ञानता और मूर्खता छिपी होती है।
क्या है त्रिविध दान
अपनी ज्ञानप्रद, शिक्षाप्रद, उत्साहप्रद और मोक्षप्रद चर्चा को निरन्तर आगे बढ़ाते हुए अब श्रीकृष्णजी त्रिविध दान पर आ गये हैं। दान की महिमा हमारे शास्त्रों में मुक्तकण्ठ से प्रशंसित की गयी है। अत: ऐसा नहीं हो सकता कि गीता अन्य विषयों पर तो चर्चा करे और दान को छोड़ दे।
गीता जैसे ग्रन्थ में दान की चर्चा होनी ही चाहिए। इसलिए श्रीकृष्णजी अब दान के विषय में अर्जुन से कहने लगे हैं।
क्रमश:

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