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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विशेष संपादकीय

योगी का उत्तर प्रदेश और पर्यटन विकास

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों प्रदेश की राजधानी लखनऊ में निवेशकों की बैठक कराकर जिस प्रकार प्रदेश के लिए निवेशकों को लुभाया है उससे उनकी विकास पुरुष की छवि बनी है। लोगों को लगा है कि वह वास्तव में प्रदेश को वर्तमान दुर्दशा के दुर्दिनों के दौर से निकालने की कोई दूरदर्शी योजना रखते हैं। 4 लाख 28 हजार करोड़ का निवेश अब प्रदेश में होगा जिससे 20 लाख युवाओं को रोजगार मिलेगा। इससे पूर्व प्रदेश में कोई भी मुख्यमंत्री निवेशकों को इस सीमा तक प्रभावित नहीं कर पाया था। निवेशकों का उत्तर प्रदेश की ओर इतना आकर्षित होने का एक कारण यह भी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आपराधिक तत्वों को ठिकाने लगाने का जो अभियान चलाया है, उससे निवेशकों के लिए सुरक्षित वातावरण सृजित हुआ है। इसके लिए योगी आदित्यनाथ सचमुच बधाई के पात्र हैं।
उत्तर प्रदेश भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जिससे दूसरे प्रदेशों की सीमाएं सबसे अधिक छूती हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं दिल्ली- यह सभी राज्य उत्तर प्रदेश से मिले हैं। इस प्रकार देश की लगभग आधी जनसंख्या से उत्तर प्रदेश के लोगों का मेल है। यह प्रदेश भारत के सभी राज्यों से अधिक जनसंख्या (लगभग 22 करोड़) रखता है। स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की जनसमस्याएँ भी बड़ी ही होंगी। विश्व के मात्र 6 देश ही जनसंख्या की दृष्टि से उत्तर प्रदेश से बड़े हैं। कहना न होगा कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होना किसी देश के शासनाध्यक्ष होने जैसा है। यहां से देश की संसद के लिए (795 सांसदों में से) 111 सांसद (80 सांसद लोकसभा के लिए तो 31 सांसद राज्यसभा के लिए) जाते हैं।
ऐसे महत्वपूर्ण प्रदेश की जनसमस्याओं को सुलझाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गंभीर होना एक शुभ संकेत है। लोगों को मंदिर-मस्जिद से पहले भोजन, वस्त्र और आवास चाहिए- यदि यह तीनों होंगे तो तभी व्यक्ति मंदिर-मस्जिद जाने की बात सोचेगा। आस्था से पहले पेट की व्यवस्था का प्रबंध सदा ही गंभीर और जटिल रहा है। राजनीति को आप चौबीसों घंटे ‘आस्था’ के नाम से नहीं चला सकते, और यदि आप फिर भी चलाने की हट रखते हैं तो ऐसी राजनीति पाखंड बन कर रह जाएगी। यह अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘आस्था’ से पहले ‘पेट की व्यवस्था’ की ओर ध्यान दिया है।
मुख्यमंत्री योगी जी का ध्यान इस ओर दिलाना चाहेंगे कि उत्तर प्रदेश में पर्यटन विकास की असीम संभावनाएं हैं। ‘रामायण’ और महाभारत कालीन ऐतिहासिक नगर इसी प्रदेश की विरासत हंै। जिन पर इसे गर्व हो सकता है- पर दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इस विरासत को उत्तर प्रदेश पर गर्व नहीं है। क्योंकि इन नगरों का विकास धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण की राष्ट्रघाती राजनीति की भेंट चढ़ गया है। जबकि यदि इन स्थानों/नगरों का और इसी प्रकार के ऐतिहासिक महत्व के अन्य नगरों का विकास किया जाता तो प्रदेश को पर्यटन से भारी राजस्व की प्राप्ति होती। जिससे प्रदेश में स्कूलों, सडक़ों व अस्पतालों को फैलाने या स्थापित करने में सहायता मिलती।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित हस्तिनापुर, बागपत, जानसठ (जयंत), मेरठ को महाभारत मण्डल के रूप में पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसी प्रकार मथुरा और ब्रज को भी ब्रजमंडल के रूप में विकसित कर विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया जाना अपेक्षित है। जबकि रामायण मण्डल के रूप में विकसित कर यह सम्मान पूर्वांचल की अयोध्या नगरी को दिया जा सकता है। इसमें पश्चिमांचल व पूर्वांचल दोनों का लाभ होगा और मुख्यमंत्री की राजनीति भी सध जाएगी।
उत्तर प्रदेश में ही स्थित इलाहाबाद, वाराणसी, चित्रकूट, श्रावस्ती, कुशीनगर, कौशांबी, आदि तीर्थ स्थान हैं। आगरा, लखनऊ, बहराइच, नोएडा का कासना, हापुड़, गढ़मुक्तेश्वर, काल्पी, फतेहपुर सीकरी, कन्नौज, गोरखपुर आदि स्थानों पर भी पर्यटकों को आकर्षित करने की अपार संभावनाएं हैं। मुख्यमंत्री को चाहिए कि वह ताम्रपत्र गाडऩे की शासकों की मूर्खता को न दोहराकर जीता जागता ताम्रपत्र प्रांत की राजधानी लखनऊ में राष्ट्र मंदिर के रूप में स्थापित कराएं। जिसमें प्रदेश के इतिहास को चित्रों के माध्यम से स्पष्ट किया जाए। इसमें रामायण काल से भी पुरातन भारत के इतिहास को लेकर वर्तमान तक के सारे इतिहास को चित्रांकित किया जाए। गड़े हुए इतिहास को (ताम्रपत्र) कोई पढे या ना पढे पर इस जीते जागते इतिहास को सब पढ़ें और यह जानें कि उत्तर प्रदेश क्या था- क्या है और क्या होगा?
यदि ऐसी व्यवस्था योगी करते हैं तो यह बहुत ही उत्तम होगा। यह कार्य काशी के विश्वनाथ मंदिर के भीतर भी किया जा सकता है। वहां विश्वनाथ बाबा का मंदिर है और भारत भी तो विश्व के लिए विश्वनाथ ही है। अत: विश्वनाथ के दरबार से ही यदि विश्वनाथ का निनाद हो- तो कितना उत्तम रहेगा?
इसके अतिरिक्त योगी आदित्यनाथ जी को यह भी देखना चाहिए कि प्रदेश के परंपरागत रोजगार मर रहे हैं। परंपरागत लौहार, बढ़ई, दर्जी, जुलाहे आदि समाप्त हो गए हैं। उनके बच्चों ने परंपरागत रोजगारों को छोडक़र नए रोजगार अपनाने की दिशा पकड़ ली है। इससे बड़ी विकट स्थिति उत्पन्न हो गई है। कोई भी सरकार अपने सभी नागरिकों के लिए रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं करा सकती। यही कारण था कि हमारे ऋषियों ने और राजनीतिक शास्त्रियों ने प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था स्थापित की थी। जिसमें कौशल विकास के लिए अलग से किसी बच्चे को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। हर एक युवा अपनी किशोरावस्था में ही अपने परंपरागत व्यवसाय में कुशल हो जाता था। वह शिक्षा केवल इसलिए पाता था कि वह संस्कारित हो सके। इस प्रकार कौशल उसे पिता से मिलता था तो संस्कार उसे शाला से मिलता था, गुरु से मिलता था। जिससे व्यवसाय और शिक्षा दोनों मिलकर मानव निर्माण करते थे। पर आज की शिक्षा केवल रोजगार ही दे रही है और उसमें भी अब एक ऐसी अवस्था आ गई है कि शिक्षित बेरोजगारों की फौज सडक़ों पर घूम रही है। स्पष्ट है कि शिक्षा रोजगारप्रद नहीं रही है। वह वचन भंग की दोषी है। अपनी दुर्बलता को छुपाने के लिए वह पढ़े-लिखे लुटेरे व जेबकतरों को उत्पन्न कर रही है। और इसे भी एक रोजगार के रूप में हताशा युवा वर्ग अपना रहा है।
मुख्यमंत्री योगी जी को चाहिए कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करें। शिक्षा को संस्कारप्रद पहले बनाएं इसके लिए प्रदेश के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा, वेद की शिक्षा, रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद आदि के रोचक और शिक्षाप्रद उपदेशों को सम्मिलित कराएं। जिससे कि भारत विश्वमानस के धनी अमृत पुत्रों के निर्माण की अपनी पुरातन परंपरा का निर्वाह करने वाला देश बन सके। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्योंकि एक आध्यात्मिक व्यक्ति है, इसलिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि हमारे सुझावों की ओर गंभीरता से ध्यान देंगे और इन्हे क्रियान्वित करने की दिशा में ठोस और सकारात्मक कदम उठाएंगे। वर्तमान में उन्होंने निवेशकों की सफल बैठक कराकर अपने भविष्य की निर्माण योजना का एक ठोस और सकारात्मक संकेत अवश्य दे दिया है, इससे उनके विरोधी भी सकते में है, और उन्हें लगने लगा है कि यदि योगी अपनी योजना में सफल हो गए तो मोदी के बाद कौन? का उत्तर भी भाजपा को और भाजपा समर्थकों को स्वयं ही मिल जाएगा।
कदम कदम तू बढ़ता चल और नेक कर्म करता चल।
मंजिल तुझको मिल जाएगी अपना फर्ज निभाता चल॥

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