मेरठ में राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनस्र्थापना में आर्य समाज का योगदान, भाग-3

स्वामी दयानन्द की इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि महर्षि दयानंद सरस्वती जनता में इतना संभल कर बोलते थे कि स्वतंत्रता की भावना तो जनमानस में रच-बस जाए, परंतु क्रूर अंग्रेज शासकों के पंजे से भी बचा जा सके, स्वदेशी आंदोलन का प्रचार प्रसार करने, उसके लिए जनमत तैयार करने एवं पराकाष्ठा तक पहुंचाने में आर्य समाज का अधिकाधिक योगदान रहा। स्वदेशी आंदोलन के स्थिल पडऩे के उपरांत आर्य समाज पुन: समाज सुधार के कार्य में व्यस्त हो गया।
मवाना एवं मेरठ नगर में आर्य समाज ने अपनी गतिविधियों से जनता में भारत के गौरवशाली अतीत के प्रति चेतना जागृत की और ये बोध कराया कि वह महान वैदिक ऋषियों और आर्षजनों की संतान हैं। इसके साथ ही आर्य समाज में अंधविश्वासों, रूढिय़ों व पुराने रीति रिवाजों को तिलांजलि देने पर जोर दिया।
यह अभियान मेरठ में अत्यंत परिणामकारी रहा क्योंकि आर्यसमाजी उपदेशक और प्रचारक बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते थे। भजनीक अर्थपूर्ण प्रभावी भजनों व रागनियों के द्वारा आम जनता को आकृष्ट करते थे। उनके गायन जनता में राष्ट्रीयता के भाव भरते तथा भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम का संचार करते थे। नगर और ग्राम वासी जनता के बीच धार्मिक और सामाजिक सुधार की जो धारा इन भजनोपदेशको ने प्रवाहित की उसमें अवगाहना कर जनता अंधविश्वास जडता और रूढि़वाद के प्रभाव से मुक्त हुई।
उस समय के भजनों में प्रमुख थे-
भीम से बलधारी, भीष्म से ब्रह्मचारी।
अर्जुन से धनुर्धारी, आएं तो बेड़ा पार हो।।
भारत के बच्चे, बच्चों को हम, अर्जुन भीम बनाएंगे।
इस देश के बांके वीरों को, शस्त्र विद्या सिखाएंगे।।
यही नहीं भजनीक आल्हा-उदल, महाराणा प्रताप, शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह आदि प्रोधाओं पर भी भजन बनाकर उन्हें गाते हुए जन चेतना जगाते हुए घूमते थे।
स्त्रियों को शिक्षित समर्थ और योग्य बनाने, अंधकार से निकलकर प्रकाश में आने और भारतीय आदर्श अनुसार जीवन निर्माण करने का संदेश भी भजनों के माध्यम से भजनीक देते थे। इन भजनों में तत्कालीन निम्न भजन प्रमुख थे।
देखो बहनों यह पहले कैसी नारी तुम थी, वेदों की ज्ञाता विवेकी धर्मधारी तुम में थी।
लोपामुद्रा और गार्गी, उर्वशी सी हो चुकी, किये शास्त्रार्थ पुरुषों से ऐसी नारी तुम में थी॥
हम आर्य नारियाँ अब, कुछ कर के दिखाएंगी।
पुरुषार्थ, त्याग द्वारा, निज बिगड़ी बनाएँगी॥
समाज सुधार के लिए भजनीक सामाजिक कुरीतियों का यथार्थ चित्रण करते हुए कहते थे-
दुखदाई बाल विवाह से, भारत कैसे सुधरेगा?
जिसके यह न समझ में आई, किस मतलब से हुई सगाई।
वधू वही बालिका बनाई, कच्चे बच्चे नहा से।
क्या जीवन प्रेम पकेगा, भारत कैसे सुधरेगा?
यद्यपि विदेशी दासता से मुक्त होने का मेरठ की जनता का संकल्प 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में ही प्रकट हो गया था, किंतु उसकी विफलता के बाद आजाद होने का भाव भूमि के भीतर छिपी जल धारा के समान बन गया था। इस भाव के पुनर्जागरण का कार्य मेरठ जनपद में प्रभावी रूप से आर्य समाज ने किया। यही कारण रहा कि मेरठ की जनता ने देश की आजादी के लिए चल रहे आंदोलन में आगे बढक़र अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। क्रांतिकारी आंदोलन में मेरठ के विष्णुशरण दुबलिश आर्य समाज के विचारों से प्रभावित ऐसे युवक थे, जिन्होंने काकोरी केस में सहभागिता के कारण 8 वर्षों का कारावास अंडमान में रहकर भोगा। वह काकोरी केस के नियोजक थे। इसकी योजना भी मेरठ के अनाथालय में बैठकर बनी थी। गांधीवादी आंदोलन में तो आर्य समाज से प्रभावित युवकों, वृद्धों, महिलाओं की मेरठ में एक लंबी कतार रही है। जो जेल गए तथा भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया। आर्य समाज के महिला जागरण का यह प्रभाव रहा कि स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं ने बढ़-चढक़र भाग लिया। इनमें प्रकाशवती सूद, कुसुमलता गर्ग, विद्यावती, ब्रह्मावती, उर्मिला शास्त्री, सत्यवती स्नातिका, विमला पुरी, शकुंतला गोयल, सावित्री रस्तोगी आदि मुख्य थी।
मेरठ जनपद के स्वतंत्रता सेनानियों ने भी आर्य समाज के योगदान को स्वीकार किया है। मेरठ के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विष्णुशरण दुबलिश भी बताया करते थे कि वह बाल्यावस्था से ही आर्य समाज के सत्संग में जाते थे। उन्हे भारत के भविष्य व गौरवशाली अतीत और उसकी महानता की जानकारी आर्य समाज के सत्संग में जाने से ही प्राप्त हुई। तभी उन्हें ज्ञान हुआ कि अपने पतन का कारण हम स्वयं ही थे। आर्य समाज ने ही हमारे पूर्वजों के त्याग, बलिदान, देशभक्ति, और महानता की गौरव गाथा सुनाकर हमें सचेत किया और उन जैसे बनने की प्रेरणा दी थी।
स्वतंत्रता सेनानी रामपाल सिंह त्यागी आर्य समाज की सभा में पडऩे वाले प्रभाव का अक्षर स्मरण किया करते थे और कहते थे कि ”उन्हें आर्य समाज के मंचों पर दिए जाने वाले उद्बोधनों से ही भारत के पतन और गुलामी के कारणों का बोध हुआ। आर्य समाज ने उनके मन में भारत के गौरवशाली अतीत के प्रति स्वाभिमान जागृत किया तथा उन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपने को समर्पित करने की प्रेरणा दी। तभी उनमें भारत को उसके प्राचीन गौरव प्राप्त करने हेतु अपना तन-मन-धन लगाने की लालसा उत्पन्न हुई”। मेरठ के ही स्वतंत्रा सेनानी गंगासहाय के जीवन अध्ययन से स्पष्ट होता है कि आर्य समाज आंदोलन में अनपढ़, पिछड़े हुए, रूढिग़्रस्त, परंपरावादी ग्रामीण जनों के जीवन में भी महान परिवर्तन किया था। स्वयं गंगा सहाय को भी आर्य समाज में शिक्षा प्राप्ति में सहायता प्रदान की थी। जिससे उनके संकरण और परंपरावादी दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। परिणामत: वह एक प्रसिद्ध आर्य समाजी नेता और स्वतंत्रता सेनानी बन गए थे।
स्वतंत्रता सेनानी भरत सिंह भी स्वीकार करते थे कि आर्य समाज में सामाजिक व राष्ट्रीय जीवन की कमियां और बुराइयों को उजागर कर राष्ट्र की महान सेवा की। समाज के दुर्गुणों को दूर करने की प्रेरणा भी जनसाधारण को आर्य समाज से ही प्राप्त हुई थी। मेरठ जनपद में राष्ट्रीय संचेतना की बलवती करने में आर्य समाज की प्रभावी भूमिका रही है। स्वाधीनता संघर्ष के रूप में कार्य किया है। हम कह सकते हैं कि आर्य समाज ने जो राष्ट्रीय चेतना जगाई वह आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम में प्रभाव योगदान देने वाली कार्यशाला प्रमाणित हुई। आर्य समाज से जुड़े युवकों ने जहां शपथ क्रांति में योगदान देकर फांसी के फंदे चूमे वही आर्य समाज के अनुयायियों ने महात्मा गांधी के आव्हान पर देश के लिए सर्वस्व समर्पण कर दिया। वास्तव में स्वामी दयानंद ने आर्य समाज के माध्यम से सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पुनर्जागरण को वैचारिक आधार दिया जिसके प्रतिपादित विचार, व्यवहार और राष्ट्रगौरव का भाव पैदा किया। हीन भावना समाप्त कर आत्मविश्वास पूर्ण आक्रमक रुख अपनाने की प्रेरणा प्रदान की और सच्चे अर्थों में भारत में राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनस्र्थापना का सूत्रपात किया।
क्रमश:

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