rishi dayanand

युगों युगों से आर्य समाज ने समस्त भूमंडल को एवं भारत राष्ट्र को वैदिक शिक्षा प्रदान करते हुए मार्गदर्शन किया है। आर्य समाज की महत्वपूर्ण और अग्रणी भूमिका इस राष्ट्र की स्वतंत्रता प्राप्ति में भी रही है। यदि वेद की विद्या आर्यावर्त में और भारत राष्ट्र में विद्यमान न होती तो भारत कभी विश्व गुरु नहीं बन सकता था । यह वैदिक विद्या का ही प्रभाव ,प्रताप और प्रकाश था जिससे कि भारतवर्ष का गौरवशाली और गरिमा पूर्ण स्थान विश्व में रहा है।
इस विश्व का ज्ञान कराने वाला शब्द रूपी ब्रह्म वेद ही है। वेद में जो विज्ञान वर्णित है वही विश्व में विविध तत्व एवं शक्तियों के रूप में कार्य कर रहा है। इन तत्वों को वेद में देवता वाची ग्राही होकर मंत्र रूप से जो ज्ञान का बीज दिया है , उसके साहचर्य से उस मंत्र के प्रकाश में हम आज भी इस युग में अपना पथ प्रदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। हमारा ज्ञान विज्ञान चाहे वेद के शब्दों के माध्यम से मंत्र साधन द्वारा बढे या वेद के मंत्र विश्व की जिन दिव्य शक्तियों के लिए प्रयुक्त हुए हैं उनके आश्रय से बढे फिर भी उस ज्ञान का अंत नहीं होगा।
वेद का अर्थ ही ज्ञान है। “विद् ज्ञाने ” धातु से यह शब्द बनता है। अतः वेद ज्ञान राशि है । वेद ज्ञान संग्रह है। वेद ज्ञान का आदि स्रोत है। वेद ईश्वरीय पुस्तक है।
जब यह ज्ञान राशि हमारे मनन, चिंतन आदि का विषय बन जाती है तो “विद” विचारणे धातु का वेद शब्द अपने कार्य करने लगता है।जब उस विचार चिंतन आदि से ज्ञान की लाभ प्राप्ति होती है तो ‘ ‘ विद ‘ लाभे धातु का रूप क्रियाशील हो जाता है ।इससे भी अधिक उच्चतम लाभ विद धातु के’ चेतना’ अर्थ के अनुसार दिव्य चैतन्य की प्राप्ति पर जो प्रकृति के राज्य से परे की वस्तु है, होता है।
अतः अब वेद के कुछ मंत्रों में दिए गए आदेश एवं संदेश का अध्ययन एवं विचार करते हैं।

यजुर्वेद का दसवें काण्ड सातवें सूक्त का 20 वा मंत्र निम्न प्रकार है।
यस्मादृचो अपातक्षन यजु यजुरयस्मादपाकषन ।
सामानि मस्त लोमान्यथवान्गिरसो मुखम।
स्कम्भं तो बूहि कतम:स्विदेव स:।।
पदार्थ —–जिससे ऋचाएं बनी, जिससे यजु बने ,जिसके लोम साम हैं, जिसका मुख अंगिरास अथर्वा है, उस सर्वाधार के विषय में कहें कि वह कौन है?
अर्थात जिस सर्वशक्तिमान परब्रह्म से ऋग्वेद ,यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्व वेद प्राप्त हुए हैं। उस सर्वाधार ब्रह्म को जानें और प्रवचन आदि द्वारा प्रकट करें। ध्यान देने योग्य बात है कि प्रवचन आदि द्वारा उस ब्रह्म को ज्ञान कराएं और जानें। अर्थात स्वयं भी जाने और दूसरों को भी जनाऐ।
अर्थात ज्ञानार्जन एवं ज्ञान वर्धन करने के पश्चात उस ज्ञान को समष्टी को बांटे। ऐसा करना उद्देश्य साधक सार्थक है।
अब यहां प्रश्न उठता है कि वह ब्रह्म एवं उसकी वेद वाणी कैसी है?
इसको जान लें।
भारतीय जनमानस में वेदों के द्वारा दिया गया संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी हमको प्राप्त होता रहता है।
इसलिए भारत की जनता वेदों को कभी विस्मृत नहीं कर सकेगी अथवा अपने से दूर नहीं कर सकेगी । क्योंकि सृष्टि के आदिकाल से प्रलयपर्यंत भारत की जनता वेदों को अपना मार्गदर्शक मानती रही है और आगे भी मानती रहेगी। किन्ही परिस्थितियों में वेदों का अध्ययन करना यदि भारतीय जनता ने छोड़ भी दिया हो तथापि वेद शब्द की ध्वनि मात्र से भी उनके कानों में पड़ जाने पर वह अनेक जन्मों के वेद के समस्त संस्कारों से झंकृत हो जाता है। इसका कारण यही है कि वेद हमारे रुधिर में बह रहा है। वेद हमको उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है। वेद की विद्या हमें अपने पूर्वजों से संस्कारों में प्राप्त होती रही है। भारत का बिना पढ़ा व्यक्ति भी वेद सिद्धांतों को जीवन में संस्कार में उत्तराधिकार में प्राप्त करने के कारण ज्ञान रखता है। तत्व को, सार को बिना पढ़ा भी जानता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि वह अनपढ़ व्यक्ति अपनी कहावत में, स्थानीय भाषा में वेद के सिद्धांतों की बात कह जाते हैं।
देश एवं मानव जाति के लिए यह परम सौभाग्य का अवसर है कि आज के वैज्ञानिक और नास्तिक युग में जबकि ईश्वर ,धर्म एवं वेद को सब ओर से तिरस्कृत किया जा रहा है और भारतवासी भी उसी प्रवाह में बहकर अपने को सबसे शिक्षित एवं प्रगतिवादी कहलाने का गौरव अनुभव करने लगे हैं, तथापि ऐसे समय में भारतीय संस्कृति के उपासकों में यह शुभ भावना जागृत हुई कि आज के मानव को यह बताया जाए कि आज चाहे संसार ने कितनी ही उन्नति कर ली हो, वर्तमान समय की सब प्रमुख समस्याओं का जैसा हल वेद के द्वारा संपन्न हो सकता है वैसा अन्य प्रकार से नहीं हो सकता। वेद वर्तमान समय की सब प्रमुख समस्याओं का हल करने में समर्थ है। क्योंकि वेद सब सत्य विद्याओं, विधाओं, कला, सभ्यता एवं मूल संस्कृति की पुस्तक है। इसीलिए महर्षि दयानंद ने आर्य समाज के नियमों में वेद का पढ़ना पढ़ाना हमारा सबका परम धर्म बताया है। अतः वेद का वैश्विक नेतृत्व स्थापित होना चाहिए और भारतवर्ष को पुनः उसके प्राचीन विश्व गुरु के पद पर पदस्थापित करने का प्रत्येक आर्य समाजी को प्रण लेना चाहिए।
वैदिक विद्या से ही मानव जीवन की सभी प्रमुख समस्याओं का हल प्राप्त होता है। लेकिन सभी प्रमुख समस्याओं में सर्वप्रथम आध्यात्मिक समस्या है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए तथा आत्मा की उन्नति जीवन के लिए सर्व प्रमुख है।
यदि इस आध्यात्मिक विषय को प्रमुखता न दी जाए और उसे गौण कर दिया जाए तो मनुष्य इस ओर प्रवृत्त ही नहीं होगा। संसार के विषय इतने बलवान हैं पूरे मनुष्य को अपने आकर्षण से विमुख नहीं होने देते। इसीलिए ऋषि महर्षियों ने जीवन के प्रारंभिक काल का नाम ब्रह्मचर्य आश्रम रखा। इस में निवास करने वाले ब्रह्मचारियों को उनके गुरुजन ब्रह्म अर्थात वेद एवं परमात्मा का ज्ञान अध्यात्म विद्या की स्थापना एवं आत्मिक उन्नति के लिए कराया करते थे। इस प्रकार वास्तविक समस्या तो ब्रह्म ज्ञान की एवं धर्म की प्राप्ति ही है जिसके लिए ही यह जीवन है।

अश्मन्वती रीयते संरभज्वमुत्तिष्ठत प्रतरता सखाय।
अत्रा जहिमोअशिवा यअसन्छिवान वयमुत्तरेमाभिवाजान।।
(यजुर्वेद 35 बटा 10,)
‌ पदार्थ—– मित्रों ! जीवन प्राणमय संसार रूपी नदी बह रही है। उसमें बड़े अज्ञान रूपी पत्थर पड़े हैं ।उठो, चलो और अच्छी प्रकार से उसको तरने के लिए अर्थात सत्व चैतन्य की प्राप्ति के लिए अशुभ संकल्प एवं आचरणों को छोड़कर शिव संकल्पों का एवं शुभआचरणो का आश्रय लो।

उद्वयं तमसस्परि स्व: पश्यन्त उत्तरम।
देव देवतरा सूर्यमगन्म ज्योतिरूक्तमम।।

पदार्थ —-इस जीवन में हम प्रकृति -प्राण के जड़ता रूपी अनेक प्रकार के अंधकारो से व्याप्त हैं। अतः प्रकाश प्राप्त नहीं कर पाते। परंतु प्रकृति के इन संस्कारों से परे चैतन्य स्वरूप एक महान ज्योति आप(ईश्वर) हैं।उस आपकी महान ज्योति को ब्रह्मांड की सब चेतन शक्तियों प्राप्त कर रही हैं। हम भी उस महान प्रकाशको के प्रकाशक, श्रेष्ठ, ज्योतिर्मय सूर्य रूपी चैतन्य ज्योति को प्राप्त कर अपने सर्व प्रकार के प्रकृति के जड़त्व रूपी अंधकारों को पार करके सुखी हो।
वेद का यह संदेश एवं वेद का यह आदेश आर्य समाज के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है।आर्य समाज के लोग आध्यात्मिक विषय को प्रमुखता देते हुए आत्म विद ,आत्मज्ञानी बनते हुए अपनी आत्मा का विकास करें। सर्वप्रथम आत्मा उन्नति करें। जिसके लिए आत्म परिष्कार, आत्मसाक्षात्कार किया जाना आवश्यक है।
आर्य समाज के भिन्न-भिन्न व्हाट्सएप समूहों पर भिन्न-भिन्न प्रकृति के सदस्य सदस्यता ग्रहण किए हुए हैं। जिनकी मानसिकता भिन्न-भिन्न, विचारधारा भिन्न-भिन्न, उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं, ऐसे कुछ विद्वानों की टिप्पणी समूह पटल पर सुनता अथवा पढ़ता रहता हूं कि कुछ ठोस किया जाए ,प्रवचन आदि लिखने से और बोलने से कोई लाभ नहीं होगा।
मैं उन आर्य समाजी विद्वानों से एक यक्ष प्रश्न पूछना चाहता हूं कि वेद का आदेश है कि प्रवचन करके ब्रह्म को जानना चाहिए तो वेद के उपरोक्त आदेश अथवा संदेश त्याग करके हमें प्रवचन आदि नहीं करना चाहिए और ब्रह्म को नहीं जानना चाहिए?
अध्यात्म धारण करके और आत्म विकास नहीं करना चाहिए?
कुछ विद्वान वर्तमान राजनीति पर चर्चा करते हैं। मैं राजनीतिक चर्चा से अपने आप को पृथक करता हूं। क्योंकि ब्रह्म को जानने की हम बात करें। उसी का प्रवचन आदि द्वारा हम भारत की जनता के समक्ष प्रस्तुत करें। अथर्ववेद के उपरोक्त आदेश का पालन करें। आत्मोन्नति करके समाज एवं राष्ट्र के उत्थान की बात करें।
आत्मोन्नति करने के पश्चात अपनी ही उन्नति में संतुष्ट में न रहकर दूसरों की भी उन्नति करने- कराने में सहयोगी होना चाहिए ।जो प्रवचन से भी संभव है। प्रवचन से भी सन्मार्ग पर लोगों को लाया जा सकता है । ऐसा करने से भी “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का नारा साक्षात होता दृष्टिगोचर होगा। शायद ऐसा करने से मनुष्य के “मनुर्भव “वेद के आदेश का पालन होगा अन्यथा ऋषि , मनीषियों , ज्ञानियों, तपस्वियों, साधुओं, सन्यासियों , मनीषियों को मानव को प्रवचन करने की फिर क्या आवश्यकता थी ?
महर्षि दयानंद को इतना आर्ष एवं सत्साहित्य लिखने की फिर क्या आवश्यकता थी ?वह भी कुछ और ठोस ही कर लेते ।तो वह ठोस क्या है?
क्या वर्तमान समय में आर्य समाज के उद्भट विद्वान, मनीषी ,वेदों के, शास्त्रों के प्रकांड पंडित ,आदर के योग्य, श्रद्धेय स्वामी विवेकानंद जी परिव्राजक व आदरणीय बड़े भ्राता आचार्य वागीश जी तथा अन्य आर्य समाजी मूर्धन्य विद्वान जो वैदिक विद्या का प्रचार प्रसार प्रवचन के माध्यम से कर रहे हैं यह क्या गलत है? अथवा यह ठोस नहीं है?
मैं आर्य समाजिओं से अपेक्षा करता हूं कि वे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय , विज्ञानमय एवं आनंदमय कोष की चर्चा करें। आर्य समाज के लोग मानव देह को एक स्थली के रूप में समाज के समक्ष स्थापित करने का प्रयास करें ।जिसके द्वारा समुचित साधना से लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रवचन करें ।इस उत्तम देह को प्राप्त करके मनुष्य इस देह में ही रम जाता है। तथा ‘पश्येम शरद: शतम ‘ के अनुसार अपने सब प्रयत्नो को स्थूल देह तथा भौतिक साधनों तक ही जब सीमित कर देता है तो वह लक्ष्य को भूल जाता है।
इस पांच भौतिक स्थूल देह के दर्शन एवं जीवनीय शक्ति के आश्रय रूप जो सूक्ष्म कारण शरीर हैं अथवा आनंदमय कोष के अतिरिक्त जो हमारे अन्य कोष हैं, उनकी जो चेतन दिव्य दर्शन शक्ति, श्रवण शक्ति तथा जीवन शक्ति और उन को जागृत करने के लिए यह पांच भौतिक शरीर हमको प्राप्त हुआ है ,इसकी बात करें।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र ग्रेटर नोएडा

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