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इतिहास के पन्नों से

एक राजा के प्रतिशोध की भेंट चढ़ गया चोल राजवंश

सुविज्ञा जैन

कहते हैं कि युद्ध में पराजय के बाद प्रतिशोध की आग से बचना बड़ा मुश्किल होता है। एक बार युद्ध हुआ, तो शुरू हो जाता है ऐसा दुष्चक्र, जिसका टूटना बहुत मुश्किल रहता है। युद्धों के इस सबक का एक उदाहरण है प्राचीन भारतीय इतिहास के दो राजवंश, पाण्ड्य और चोल के बीच की बैर गाथा।

इन दोनों राजवंशों के बीच यह सिलसिला दशकों नहीं, बल्कि सदियों तक चला। फिर एक समय आया, जब चोल राजवंश एक पाण्ड्य राजा के प्रतिशोध की भेंट चढ़ गया। इतिहासकार इसी घटना को महान चोलवंश के पतन की शुरुआत मानते हैं।

इस पतन की कहानी को जानने के लिए चलना होगा शुरू से।

दक्षिण भारतीय राजवंशों के इतिहास की शुरुआत मानी जाती है संगम काल से। यह कालखंड ईसा पूर्व छठी सदी से लेकर ईसा बाद की तीसरी सदी का दौर था। तब वहां तीन प्रमुख राजवंश थे- चेर, चोल और पाण्ड्य। ये तीनों ही विलक्षण योद्धा होने के साथ ज्ञान और साहित्यप्रिय राज्यवंश भी थे। उस दौर में इन तीन साम्राज्यों के कवियों और विद्वानों के बीच तीन ऐतिहासिक समागम यानी संगम आयोजित हुए। इन्हीं संगमों के समय रचे गए ग्रंथों को संगम साहित्य कहा जाता है। इतिहासकारों को संगम साहित्य से ही उस दौर के इतिहास को समझने का मौका मिला।

उस दौर में साहित्यकारों के समागम का आयोजन पाण्ड्य शासक कराते थे। इन संगमों का पूरा खर्च पाण्ड्य राजकोष से होता था। इसी आधार पर उस काल की कला और साहित्य के विकास में पाण्ड्य शासकों का नाम प्रमुखता से लिया गया है। इतना ही नहीं, कई पाण्ड्य राजा ख़ुद भी उच्चकोटि के कवि और लेखक थे। उन्होंने भी कई ऐतिहासिक रचनाएं सृजित कीं, जो आज भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

उस दौर को जानने के लिए संगम साहित्य के अलावा कुछ पुरातात्विक साक्ष्य भी हैं। मसलन, अशोक के शिलालेखों में भी एक स्वतंत्र पाण्ड्य राज्य का ज़िक्र है, जो 300 ईसा पूर्व में पाण्ड्य शासन का एक पुख्ता सबूत है। ये तथ्य भारतीय इतिहास में पाण्ड्य साम्राज्य के एक बहुत लंबे दौर तक रहे शासन की तस्दीक करते हैं।

पाण्ड्य और चोल राजवंशों के बीच प्रतिशोध की कहानी सुनने के पहले पाण्ड्य साम्राज्य की समृद्धि और संपन्नता का ज़िक्र भी ज़रूरी है।

ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि पाण्ड्य राजवंश के दौर में भारत से दुनियाभर में मोतियों का निर्यात होता था। विश्वस्तरीय गुणवत्ता के ये मोती रोम तक भेजे जाते। पाण्ड्य शासकों के रोम के राजा ऑगस्टस के पास राजदूत भेजे जाने की बात ग्रीक इतिहासकार निकोलौस ऑफ़ डमस्कस के दस्तावेज में मौजूद है।

विश्वकोश ब्रिटेनिका में यह तथ्य दर्ज हो चुका है कि ईसापूर्व 361 में पाण्ड्य राजा ने यूनान में अपना राजदूत भेजा। तथ्यों की विश्वसनीयता के लिए एक हवाला यह भी दिया जा सकता है कि पुरातात्विक खुदाई में पाण्ड्य राज्य में कई रोमन सिक्के मिल चुके हैं। इन तथ्यों से साबित होता है कि संगम काल में पाण्ड्य साम्राज्य खासा संपन्न था और अपने व्यापार कौशल से उसके शासकों ने कई देशों से अच्छे रिश्ते भी बना लिए थे।

सिलसिलेवार इतिहास से पता चलता है कि संगम काल की समाप्ति के बाद कुछ सदियों तक पाण्ड्य साम्राज्य कुछ कमज़ोर रहा। इसीलिए ईसा बाद की तीसरी से छठी सदी तक पाण्ड्य राज्य के उल्लेखनीय प्रमाण नहीं मिलते। लेकिन, छठी सदी के अंत में पाण्ड्य राज्य के फिर से उदय के साक्ष्य हैं। मसलन, 590 ईसवीं में पाण्ड्य राजा कंडूगोन ने पाण्ड्य शासन को दक्षिण के कुछ क्षेत्रों में दोबारा स्थापित किया। उन्होंने मदुरै को अपनी राजधानी बनाया।

पाण्ड्य शासन कुछ सदियों तक ठीक चला, लेकिन उसके बाद उनको फिर संघर्ष करना पड़ा। इस दौर में उनका सामना हुआ शक्तिशाली चोलों से। ये वह दौर था, जब चोल साम्राज्य का डंका सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में बज रहा था। नौवीं से 12वीं सदी में चोल शासकों के प्रभुत्व के कारण ही पाण्ड्य वंशजों को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझना पड़ा।

चोल राजा एक के बाद एक पाण्ड्य साम्राज्य के कई क्षेत्र जीतते चले गए और पाण्ड्य कमजोर पड़ते गए। 13वीं सदी की शुरुआत में, 1205 में चोल राजा कुलोत्तुंग तृतीय ने पाण्ड्यों की राजधानी पर ही हमला बोल दिया।

पाण्ड्य राजा जटावर्मन कुलसेकरा ने उस युद्ध में अपनी राजधानी मदुरै गंवा दी। चोल सेना पाण्ड्य राजमहल में घुस गई। इस दौरान चोल सेना ने कुछ ऐसा कर दिया, जिसकी कल्पना भी पाण्ड्य वंशजों ने नहीं की थी। चोल सेना ने अपने राजा के आदेश पर पाण्ड्यों के राजतिलक कक्ष को तहस-नहस कर दिया। दरअसल राजतिलक कक्ष राजवंशों के लिए गौरव का प्रतीक हुआ करता था। राजपरिवार के नए शासकों का राजतिलक इसी भव्य कक्ष में किया जाता था।

चोलों ने पाण्ड्यों के सम्मान के इस प्रतीक को नेस्तनाबूद कर दिया। इतना ही नहीं, चोल राजा ने आदेश दिया कि इस भव्य कक्ष को ढहाकर उस ज़मीन को खेती के लिए जोत दिया जाए। चोल राजा ने वहां मोटे अनाज की खेती के आदेश दिए। ऐसा करना यह संदेश था कि अब पाण्ड्य शासक न तो दोबारा कभी राजगद्दी पर बैठ सकेंगे और न ही किसी पाण्ड्य वंशज का अब राज्याभिषेक होगा।

अपने राजवंश की विरासत का यूं तोड़े जाना पाण्ड्यों के लिए बहुत बड़ा अपमान था। इसी घटना ने पांडयों में प्रतिशोध की आग भड़का दी। पाण्ड्य राजा कुलसेकरा के छोटे भाई मारवर्मन सुंदर पाण्ड्य तो इस अपमान से धधक उठे। लेकिन, हारे हुए पाण्ड्यों को उस समय अपना राज्य छोड़कर जाना पड़ा। हालांकि चोल राजा ने यह उदारता ज़रूर बरती कि अपने अधीन पाण्ड्य राजा जटावर्मन कुलसेकरा को जागीरदार बना दिया।

जागीरदारी मिलने से पाण्ड्य राजवंश को अपनी विरासत ज़िंदा रखने का मौका मिल गया। कुछ समय बाद राजा कुलसेकरा के भाई मारवर्मन सुंदर पाण्ड्य को पाण्ड्य राजवंश का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।

सुंदर ने राजा घोषित होते ही पाण्ड्य राजवंश के अपमान का बदला लेने के लिए चोलो पर आक्रमण की तैयारी शुरू कर दी। फिर 1235 ईसवी में मारवर्मन सुंदर पाण्ड्य ने चोल राजा कुलोत्तुंग तृतीय पर हमला कर दिया। प्रतिशोध की आग में झुलस रहे मारवर्मन सुंदर अपने पाण्ड्य राजवंश का सम्मान वापस पाने के लिए जी जान से लड़े। उन्होंने तंजौर और वोरैयुर जैसे चोल नगरों में भारी तबाही मचा दी।

इस भीषण युद्ध में कुलोत्तुंग तृतीय हार गए। राजा कुलोत्तुंग को बेटों के साथ महल छोड़कर भागना पड़ा। लेकिन, मारवर्मन सुंदर पाण्ड्य ने तंजौर में बने चोलों के राजतिलक कक्ष को ढहाया नहीं बल्कि उसी भव्य भवन में अपना वीराभिषेक कराया। यह मदुरै में हुए पाण्ड्यों के अपमान का जवाब था। और यहीं से पाण्ड्य राजवंश के दोबारा उदय की शुरुआत हुई। इसके बाद तो पाण्ड्य राजवंश दक्षिण में एक बार फिर महाशक्ति बनकर उभरा।

इतिहासकार मानते हैं कि इसी दौर में पाण्ड्य साम्राज्य ने अपना स्वर्णिम काल देखा और इसी दौर में पांडय वंशजों ने संगम काल जैसे समृद्ध पाण्ड्य शासन को फिर से स्थापित किया। यह वही समय था, जब सदियों बाद दक्षिण भारत में एक बार फिर पाण्ड्य राज्य की संपन्नता और कला साहित्य के विकास का सिलसिला शुरू हुआ। राजवंशों की इतिहास गाथा में उनकी विचारधारा और आस्थाओं का पहलू भी कम महत्व का नहीं होता। इतिहासकार गौर कराते हैं कि प्राचीन पाण्ड्य शासक शुरू में जैन धर्मावलंबी थे, इसलिए आज भी यह तर्क ढूंढा जाता है कि राज्य विस्तार के लिए युद्ध और उसमें अहिंसा का पालन वे किस हद तक कर पाते होंगे।

लेकिन, यह भी एक तथ्य है कि बाद में पाण्ड्यों ने शैव धर्म अपना लिया। इसके बावजूद वे जैन और बौद्ध धर्म के प्रति उदार रहे। बहरहाल बाद के पाण्ड्य शासकों ने कई शैव मंदिर बनवाए। अपने समय के ये भव्य मंदिर पाण्ड्यों के वैभव की भी गवाही देते हैं।आज के तमिलनाडु में पाण्ड्य राजवंश का बनवाया मीनाक्षी मंदिर पूरी दुनिया में मशहूर है। मीनाक्षी मंदिर जैसी कई संरचनाओं के आधार पर ही द्रविड़ वास्तुकला के विकास और प्रसार में पाण्ड्य राजाओं का बड़ा योगदान माना जाता है। ख़ासतौर पर रॉक कट वास्तुकला के विकास का मुख्य श्रेय पाण्ड्य शासकों को ही दिया जाता हैं।

हालांकि इस वास्तुकला के प्राचीन साक्ष्य पूर्वी भारत में भी मिले हैं, लेकिन वे ज़्यादातर बौद्ध गुफाएं हैं, जबकी पाण्ड्य काल की गुफाओं में मिले मंदिर हिंदू धर्म के। ऐसे में दक्षिण तमिलनाडु में रॉक कट वास्तुकला से बने गुफा मंदिर पुरात्तववेत्ताओं को आज भी गहराई से अध्ययन के लिए प्रेरित करते हैं। इनमें त्रिच्चिरापल्ली, तिरुवेल्लारई, मलयकोयिल, सित्तानावासल जैसे गुफा मंदिरों की वास्तुकला के कई पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन अब भी अधूरा है। आगे जो भी पुरातात्विक अध्ययन होंगे, उनसे दक्षिण भारत के इतिहास के नए तथ्य पता चलेंगे। अभी तो बारीकी से यह जानना भी बाकी है कि चोलों से बदला लेकर अपना साम्राज्य फिर खड़ा करने वाला पाण्ड्य राजवंश फिर क्यों ढह गया। वैसे इतिहास गवाह है कि राजपाट हमेशा के लिए किसी का नहीं रहा।

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