भारतीय संविधान : सत्य की विजय का उद्घोषक संविधान 

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डॉ घनश्याम बादल

आज संविधान दिवस है , 73 वर्ष पहले 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ ।  इस दिन की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए 2015 से संविधान दिवस मनाना शुरू हुआ । इससे पहले इसे राष्ट्रीय कानून दिवस के रूप में मनाया जाता था ।

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है और इसे तत्कालीन ब्रिटिश संविधान का ही संशोधित एवं परिष्कृत रूप माना जाता है ।

डॉ भीमराव अम्बेडकर भारतीय संविधान के वास्तुकार थे जबकि संविधान समिति के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद थे । संविधान सभा ने भारत के संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में पूरा कर राष्ट्र को समर्पित किया था । संविधान के निर्माण में करीब 284 लोग शामिल थे. जिसमें 15 महिलाएं भी थीं ।

भारतीय संविधान में एक उद्देशिका 470 अनुछेद व 25 भाग शामिल हैं । इसमें बारह अनुसूची एवं 105 अनुलग्नक हैं । अब तक 127 संविधान संशोधन विधेयक संसद में लाये गये हैं जिनमें से 105 संविधान संशोधन विधेयक पारित होकर संविधान संशोधन अधिनियम का रूप ले चुके हैं।

26 जनवरी 1950 से लागू भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक लोकतांत्रिक समाजवादी धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया गया है और इसमें  अधिकारों कर्तव्यों के साथ नीति निर्देशक तत्व भी शामिल हैं।

लोगों को यह तो पता है कि भारत का संविधान किसने बनाया, कब व कितने समय में बनाया और संविधान में क्या कर क्या है  मगर संविधान को मनोरम चित्रों से किसने सजाया यह विरले लोग ही जानते होंगे। विशेषज्ञ जब संविधान बना रहे थे तब जवाहर लाल नेहरू इन्हें सजाने वाले की खोज करवा रहे थे। यह खोज बंगाल के शांतिनिकेतन में आकर पूरी हुई जहां कलाभवन में प्राध्यापक नंदलाल बोस  काम करते थे । प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें संविधान को  चित्रों से सजाने का उनसे आग्रह किया, जिन्हें नंदू बोस ने स्वीकार कर लिया।

प्रारंभिक  संविधान में  22 भाग थे  और हर भाग की शुरुआत में 8 गुना 13 इंच के चित्र  हैं।  इन 22 चित्रों को बनाने में 4 साल लगे. इस काम के लिए नंदलाल बोस को 21 हजार रुपए मिले थे । दूसरी तरफ एक दूसरे कलाकार प्रेम बिहारी रायजादा ने मेहनताना लेने से इनकार कर दिया था।

भारत के संविधान से जुड़ी एक और रोचक जानकारी यह है कि इसकी मूल प्रति टाइपिंग या प्रिंट में उपलब्ध नहीं है। संविधान की मूल प्रति हिंदी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी गई है जिसे प्रेम बिहारी रायजादा ने लिखा है।  रायजादा ने पेन होल्डर निब से संविधान के हर पन्ने को बहुत ही खूबसूरत इटैलिक अक्षरों में लिखा है।  सुलेखन यानी कैलिग्राफी प्रेम बिहारी का खानदानी शौक था।

संविधान को  हाथों से लिखने में 6 महीने का समय लगा था. लेकिन इस काम से जु़ड़ा एक रोचक किस्सा है।  जब प्रेम बिहारी से सरकार ने इस काम को पूरा करने के लिए पारिश्रमिक के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, मुझे एक भी पैसा नहीं चाहिए । न ही कोई महंगा उपहार चाहिए। लेकिन उन्होंने संविधान के हर पृष्ठ पर अपना नाम और अंतिम पृष्ठ पर अपने दादाजी का नाम लिखने की शर्त रख दी, जिसे सरकार ने मान लिया।

भारत के संविधान को नंदलाल बोस के  अद्भुत चित्रों में मोहनजोदड़ो, वैदिक काल, रामायण, महाभारत, बुद्ध के उपदेश, महावीर के जीवन, मौर्य, गुप्त और मुगल काल, इसके अलावा गांधी, सुभाष, हिमालय से लेकर सागर आदि के सुंदर चित्र शामिल हैं । वास्तव में यें  चित्र भारतीय इतिहास की विकास यात्रा के प्रतीक हैं ।  इन चित्रो की शुरुआत भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ के शेर से हुई है ।

अगले भाग में भारत की प्रस्तावना लिखी है, जिसे सुनहरे बार्डर से घेरा गया है. मगर इससे जुड़ा एक विवाद भी है । दरअसल, भारतीय संविधान की मूल प्रति के कवर पेज पर अशोक स्तंभ के तीन शेर अंकित हैं। अंदर के पृष्ठों पर बॉर्डर उकेरे गए हैं । आरोप है कि इन्हें उकेरने वाले इंदौर के कलाकार दीनानाथ भार्गव और उनके साथी कलाकारो का संविधान में कहीं भी जिक्र नहीं किया गया है ।

शांति निकेतन के प्राचार्य नंदलाल बोस के परिवार के लोगों ने इन कलाकारों का हक छीनकर अपने परिवार के लोगों के नाम संविधान की सजावट करने वालों में लिखे हैं और इनका नाम गायब कर दिया है।  एक शोध कार्य के दौरान दीनानाथ भार्गव को इसकी जानकारी मिली और बाद में उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को इसकी लिखित शिकायत भी की थी । एक तरह से आरोप  है कि जिस तरह कानून की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बंधी हुई है उसी का लाभ उठा कर संविधान निर्माण की शुरुआत से ही आंखों में धूल झोंकने का कार्य भी किया गया जो आज तक किया जा रहा है।

आज संविधान में कई छिद्रों को तलाश करते हुए चतुर लोग संविधान की मूल भावना से हटकर इसका उपयोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए करने में लगे हैं अदालतों में सत्यमेव जयते का उद्घोष तो टंगा है मगर हालात बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते हैं । ‘जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड’ का उद्घोष तो है मगर न्याय में जितनी देरी भारत में की जाती है शायद ही कहीं और की जाती हो तो आज संविधान दिवस के उपलक्ष में इस बात की जरूरत है की संविधान की मूल भावना को समझने एवं उसका आदर करते हुए एक ऐसा भारत बनाएं जो इसे सचमुच विश्व का सिरमौर बना सकें।

आज हम दुनिया के सबसे बड़े संविधान वाली सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं और समय के साथ मजबूती से एक विकसित राष्ट्र के रूप में भी उभर रहे हैं लेकिन आज भी उच्च वर्ग एवं निम्न वर्ग के बीच जो बड़ी खाई है उसे पाटने में भारत का संविधान बहुत ज्यादा सफल नहीं रहा है तो इसमें दो संविधान का नहीं अपितु उसे लागू करने की नीति एवं नीयत का रहा है । आज समय की मांग है कि भारतीय संविधान को इस प्रकार से संशोधित परिष्कृत एवं किया जाए कि वह अपनी मूल भावना को संरक्षित रखते हुए देश के नागरिकों को दिए गए समानता के अधिकार को सचमुच यथार्थ के धरातल पर ला सके।

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