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महर्षि दयानन्द जी और दलित सुधार

महर्षि दयानंद ने जीवन भर हिन्दू समाज में फैली हुई जातिभेद की कुरीति का पुरजोर विरोध किया। उनके जीवन में से अनेक प्रसंग ऐसे मिलते हैं जिनसे जातिवाद को जड़ से मिटाने की प्रेरणा मिलती हैं। खेद है अपनी राजनैतिक महत्कांक्षा के चलते दलित समाज डॉ अम्बेडकर, ज्योति बा फुले आदि का नाम तो गर्व से लेता हैं मगर स्वामी दयानंद, स्वामी श्रद्धानन्द,लाला लाजपत राय आदि विभूतियों का नाम लेना पाप समझता हैं।
महर्षि दयानंद के जीवन से कुछ प्रेरणादायक संस्मरण –
महर्षि दयानन्द जी के एक जीवनी लेखक मास्टर लक्ष्मण आर्य जी के शब्दों में ही इसे उद्धृत कर रहे हैं-
‘दलितों से स्वामी जी का स्नेह
सफरमैना की पल्टन का एक मजहबी सिख (दलित वर्ग के सिख को मजहबी सिख कहते हैं) जो श्वेत वस्त्र पहने हुए था तथा सभा में बहुत सावधानी से बैठा हुआ स्वामी जी की प्रत्येक बात को दत्तचित्त होकर सुन रहा था, कि अकस्मात् उसी समय छावनी का पोस्टमैन मुनीर खां स्वामी जी की डाक लेकर आया। वह पोस्टमैन उस मजहबी सिख को देखकर शोर मचाने लगा। यहां तक कि वह उसे मारने पर उतारू हो गया तथा चिल्लाकर कहा-रे मनहूस नापाक (गन्दे अशुभ) तू ऐसे महान् पुरुष तथा युग प्रसिद्ध व्यक्तितत्व की सेवा में इतनी अशिष्टता से आकर बैठ गया है। तूने अपनी जाति की उन्हें जानकारी नहीं दी। उस समय पता करने पर ज्ञात हुआ कि वह मजहबी सिख था। वह बहुत लज्जित होकर पृथक् जा बैठा। मुनीरखां ने प्रयास किया कि उसे निकाल दिया जाए। तब स्वामीजी ने अत्यन्त कोमलता व सौम्यता से कहा निःसन्देह उसके यहां बैठकर उपदेश सुनने में कोई हानि नहीं और उस पर कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए। तिरस्कृत किये गये उस व्यक्ति ने नयनों में अश्रु भरकर तथा हाथ जोड़कर कहा कि मैंने किसी को कुछ हानि नहीं पहुंचाई। सबसे पीछे जूतियों के स्थान पर पृथक् बैठा हूं। स्वामीजी ने डाकिए को कहा कि इतना कठोर व्यवहार तुम्हारे लिए अनुचित है और समझाया कि परमेश्वर की सृष्टि में सब मनुष्य समान हैं। उस दलित को कहा तुम नित्यप्रति आकर यहां उपदेश सुनो। तुमको यहां कोई घृणा की दृष्टि से नहीं देखता। मुसलमानों के निकट भले ही तुम कैसे हो। स्वामीजी के ऐसा कहने से वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ अैर फिर प्रतिदिन व्याख्यान सुनने आता रहा।’
पण्डित चमूपति द्वारा लिखित स्वामी दयानन्द जी के जीवन का छुआछूत विषयक एक अन्य उदाहरण भी प्रस्तुत है-
‘स्वामी जी अनूपशहर में उपदेश दे रहे थे। इतने में उमेदा नाई भोजन का थाल लाया। स्वामी जी ने प्रेमपूर्वक सभा में ही भोजन करने लगे। सभा में कुछ ब्राह्मण बैठे थे। उन्होंने शोर मचा दिया कि-‘‘यह क्या? नाई भ्रष्ट है। उसके यहां का भोजन संन्यासी को नहीं करना चाहिए।” स्वामी हंसे और कहा, ‘‘रोटी तो गेहूं की है। नाई का तो केवल प्रेम-भाव है। शुद्ध पवित्र भोजन चाहे कोई लाए, खा लेना चाहिये।” पं. चमूपति जी लिखित ही छुआछूत विषयक एक अन्य घटना प्रस्तुत है-‘बम्बई में स्वामी जी के डेरे पर एक बंगाली आया। बातचीत करते-करते उसने पानी मांगा। बंगाली की दाढ़ी लम्बी थी। भक्तों ने समझा, कोई मुसलमान है। उन्होंने उसे गिलास देने की जगह पत्तों के दोनों में पानी दिया। स्वामी जी भड़क उठे और भक्तों को डांटकर कहा, ‘‘कोई किसी जाति का हो, उसका यह अनादर क्यों करो कि गिलास तक न दो ? यही तो कारण है कि इस जाति ने अपने में से लाखों-करोड़ों भाई-बहन निकाल तो दिए हैं, परन्तु अपने में मिलाया एक मनुष्य भी नहीं।” (इस घटना पर पं. चमूपति की टिप्पणी-मनुष्य से छिःछिः करने वाले स्वयं छिःछिः किये जाने के योग्य हैं। आदर से पराये अपने बनते हैं, निरादर से अपने पराये)। एक अन्य प्रश्नोत्तर भी पं. चमूपति जी ने ‘हमारे स्वामी’ नामी अपनी पुस्तक में दिया है। वह लिखते हैं, ‘भक्त-आपको जन्म से नीच कहते हैं। स्वामीजी-मैं भी तो यही कहता हूं कि जन्म से सब नीच हैं। जिसने पढ़ा-पढ़ाया वह ब्राह्मण हो गया, जो धर्म के लिए लड़ा वह क्षत्रिय हुआ, और जिसने व्यापार या खेतों का काम किया वह वैश्य हुआ, नहीं तो शूद्र है। मैंने ब्राह्मण के यहां जन्म लिया था। ब्राह्मण के बेटे को जन्म से नीच माना तो मेरे ही सिद्धान्त पर आए। मुझे ये सारी बातें सुनकर प्रसन्नता हो रही है। इस प्रकार के दुर्वचनों के भी स्वामीजी अच्छे अर्थ लेते रहे और क्रोध में न आए।’ पाठक इन घटनाओं से स्वामीजी का दलितों के प्रति प्रेममय दृष्टिकोण, धारणा व विचारों का ज्ञान कर सकते हैं।

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