Categories
इतिहास के पन्नों से

ओरछा के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी

ओरछा का हमारे गौरवपूर्ण हिंदू इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां की कई वीरता पूर्ण रोमांचकारी घटनाएं भारतीय इतिहास की धरोहर हैं। जिनका उल्लेख हम यहां पर करेंगे।
बेतवा नदी के किनारे पर बसा ओरछा कभी परिहार राजाओं की राजधानी हुआ करता था। गुर्जर प्रतिहार राजवंश को ही परिहार के नाम से जाना जाता है।ओरछा मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड सम्भाग में बेतवा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा सा शहर है। इसकी इतिहास की समृद्ध परंपरा बहुत ही उल्लेखनीय और प्रशंसनीय है। परिहार राजाओं के पश्चात ओरछा चंदेल राजाओं के आधिपत्य में रहा था। जब चंदेल राजाओं का पराभव हुआ तो उसके पश्चात ओरछा इतिहास की मुख्यधारा से दूर हाशिए पर चला गया। चंदेल ओं के पश्चात ओरछा को बुंदेला ने अपना पुराना वैभव प्रदान किया। आज के ओरछा पर बुंदेलों की वीरता और देशभक्ति का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। उन्हीं की वीरता और देशभक्ति के नाम से ओरछा इतिहास में विशिष्ट सम्मान पूर्ण स्थान रखता है। अकबर के शासनकाल में ओरछा के राजा मधुकर शाह थे। वह एक देशभक्त शासक थे। अपने देश के स्वाभिमान के लिए उन्होंने मुगलों से कई युद्ध किए थे। मधुकर शाह से पूर्व राजा रूद्रप्रताप का शासनकाल 1501 ईस्वी से 1531 ईस्वी तक रहा। माना जाता है कि उनके द्वारा ही वर्तमान ओरछा को बसाया गया था। बताया जाता है कि उनके शासनकाल में यहां का किला 8 वर्ष में बनकर संपन्न हुआ था।
सन 1509 से पहले राजा रूद्र प्रताप की राजधानी गढ़कुंडार हुआ करती थी। जिसे 1509 ईसवी में यहां स्थानांतरित किया गया।
राजा रूद्र प्रताप सिंह के बाद यहां पर अलग-अलग कई राजाओं ने अपने – अपने शासनकाल में अलग-अलग कई महल बनवाए। इन्हीं महलों में से एक है – जहाँगीर महल। इस महल का निर्माण राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने 1605 ई0 से 1627 ई0 के बीच करवाया था। राजा वीर सिंह बुंदेला ने अपने द्वारा निर्मित इस महल का निर्माण मुगल शासक जहांगीर के सम्मान में करवाया गया था। हमें हमारे गाइड द्वारा बताया गया कि यह महल बुंदेल और मुगल शिल्प कला का मिश्रित उदाहरण है। हमने उसको बताया कि कोई कला मिश्रित नहीं होती यह केवल भारतीय कला है और तथाकथित मुगल कला को इसके साथ जोड़कर अनावश्यक हम अपनी शिल्प कला को अपयश का पात्र बनाते हैं। इससे पहले भी भारतवर्ष में ऐसी कई इमारतें निर्मित की जा चुकी थीं जो केवल और केवल भारतीयों के द्वारा ही निर्मित की गई थीं। भारत में कम्युनिस्टों और मुसलमान इतिहासकारों ने जानबूझकर इस प्रकार की मिश्रित कलाओं का उल्लेख जानबूझकर किया है। उनकी ऐसी मानसिकता से केवल यही परिलक्षित होता है कि वह जबरदस्ती हमारी कलाओं पर अपनी मोहर लगाने के लिए उतावले हैं।

जहांगीर महल के प्रथम तल को सन1606 में जहांगीर के यहां आने से पहले ही पूर्ण कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त द्वितीय तल पर जो कक्ष, गुंबद और छतरियां बनी हैं, उनका निर्माण 1618 ई0 में संपन्न किया गया। राजा वीर सिंह देव और जहांगीर की गहरी मित्रता थी। यही कारण था कि जब 1605 ईस्वी में जहांगीर मुगल सत्ता पर काबिज हुआ तो उसे अपने यहां विशेष रुप से राजा वीर सिंह देव ने आमंत्रित किया और उसके सम्मान में इस महल का निर्माण कराया।
इन दोनों की मित्रता अकबर के समय से ही चली आ रही थी। अकबर ने अपने शासनकाल में जहांगीर को काबू में करने के लिए अपने विश्वसनीय अबुल फजल को भेजा था। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहांगीर ने अपने पिता अकबर के विरुद्ध उसके जीवन काल में ही विद्रोह कर दिया था। जिसको लेकर अकबर बहुत अधिक चिंतित रहता था। जहांगीर ने अपनी सत्ता अलग स्थापित कर अपने सिक्के भी ढाल लिए थे। मुगलों की यह खानदानी परंपरा थी कि हर पुत्र ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया। जहांगीर के बाद यह परंपरा और भी अधिक मुखर होकर स्थापित हुई।
अकबर ने अपने विद्रोही पुत्र को नियंत्रण में लेने के लिए जब अबुल फजल को भेजा तो उस समय राजा वीर सिंह देव ने अपने मित्र जहांगीर की सहायता करते हुए अबुल फजल को ही मरवा दिया था। बस यही कारण था कि जब जहांगीर मुगल शासक बना तो वह स्वयं भी अपने मित्र वीर सिंह देव बुंदेला के यहां आना चाहता था और वीर सिंह देव बुंदेला भी अपने मित्र मुगल शासक जहांगीर का अपने यहां विशेष सम्मान करना चाहता था। उसी मित्रता को इतिहास समय एक यादगार के रूप में स्थापित करने के लिए इस भवन का निर्माण कराया गया। जहांगीर ने मुगल शासन सत्ता को संभालते ही ओरछा को राजा वीर सिंह देव को सौंप दिया था। समय तक राजा वीर सिंह देव बुंदेला केवल ओरछा राज्य की एक छोटी सी बड़ौनी जागीर के स्वामी थे।
किले के भीतर स्थित राजा महल का निर्माण सन 1501 से 1531 के मध्य राजा रूद्र प्रताप ने ही आरम्भ करवाया था ।इसके बाद राजा रूद्र प्रताप सिंह के बड़े बेटे भारती चंद ने इस महल का कार्य 1531 से 1554 में मध्य में पूर्ण करवाया फिर इस महल में कुछ परिवर्तन भी हुए जो भारती चंद के अनुज मधुकर शाह ने 1554 से 1592 के मध्य करवाए ।
ओरछा के इसी महान और ऐतिहासिक किले से राजा चंपतराय की यादें जुड़ी हैं। जिनकी वीरांगना पत्नी सारंधा का बहुत ही गौरव पूर्ण इतिहास है। उन्हीं के पुत्र छत्रसाल ने तत्कालीन मुगल सत्ता को नाकों चने चबाये थे। उनके इतिहास के रोमांचकारी किस्से आज भी यहां पर सुने जाते हैं। औरंगजेब जैसे क्रूर मुगल बादशाह के शासनकाल में छत्रसाल की शक्ति का उद्भव उस समय भारत की शक्ति और शान का प्रतीक बन गया था। छत्रसाल का वास्तविक नाम शत्रुसाल था और उस महानायक ने इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़कर औरंगजेब जैसे क्रूर बादशाह को अपने सामने झुकने के लिए विवश कर दिया था। इतिहास से उसके सारे गौरव पूर्ण कार्यों को मिटाने का कार्य किया गया है। यदि छत्रसाल को भारत के इतिहास में सही सम्मान और स्थान प्राप्त हो जाता तो हमें पता चलता कि उस इतिहास पुरुष ने अपने काल में किस प्रकार शिवाजी महाराज से संपर्क साध कर राष्ट्रवादी कार्यों और गतिविधियों को तीव्रता प्रदान की थी ? 4 मई 1649 उज्जैन में छत्रसाल ने 1670 ईस्वी में अर्थात अपनी 21 वर्ष की अवस्था में छत्रपति शिवाजी से मुलाकात कर उनके हिंदवी स्वराज्य का मूल मंत्र ग्रहण किया था।
दोनों इतिहास नायकों की यह मुलाकात बहुत क्रांतिकारी सिद्ध हुई। क्योंकि उसके पहले छत्रसाल जहां मुगलों की नौकरी कर रहे थे , उसके पश्चात उन्होंने अपने आपको मुगलों की नौकरी से दूर कर देश के लिए और वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया।
अपने माता-पिता के गौरवपूर्ण बलिदान के संस्कार छत्रसाल के मन मस्तिष्क में रचे बसे थे। वह नहीं चाहते थे कि मुगलों की नौकरी करते हुए जीवन नष्ट किया जाए। उन्हें उस समय सचमुच किसी शिवाजी जैसे संरक्षक की आवश्यकता थी और शिवाजी भी उस समय किसी छत्रसाल को ही ढूंढ रहे थे जो उनके कार्यों को उत्तर भारत में पूर्ण करने का संकल्प व्यक्त करें।
इसलिए शिवाजी से हुई मुलाकात के पश्चात उन्हें अपने माता-पिता के अधूरे कार्यों को पूरा करने का अवसर और उचित मंच के साथ-साथ एक मार्गदर्शक भी उपलब्ध हो गया था। छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस नवयुवक के विचारों को नई धार दे दी थी। इन सारी बातों को अपने अंतर में समाए हुए ओरछा अपनी मौन वाणी में हम से आवाहन कर रहा है कि मेरे इतिहास को सम्मान दो, क्योंकि एक समय विशेष पर मैंने आपके लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था।
औरंगज़ेब के राज्य काल में छत्रसाल की शक्ति बुन्देलखण्ड में हिंदुत्व की शक्ति का प्रतीक बनकर सारे देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी। ओरछा के राजाओं ने अपनी वीरता की परंपरा को देर तक बनाए रखकर मां भारती की अप्रतिम सेवा की। देश की तथाकथित पराधीनता के काल में हिंदू समाज को बहुत बड़ा संबल इन राजाओं की वीरता से मिलता रहा। इस प्रकार ओरछा एक समय विशेष पर पूरे देश के लिए ऊर्जा का एक अक्षय स्रोत था। ऊर्जा के इस स्त्रोत से प्रेरणा की ऐसी किरणें निकलती थीं जो भारतवर्ष के कोने कोने में फैल कर हिंदुत्व को नई ऊंचाई देने में सहायता करती थीं। आज भी यहाँ पुरानी इमारतों के खंडहर बिखरे पड़े हैं। ये सारे खंडहर बता रहे हैं कि यहां पर कभी उजालों का साम्राज्य भी रहा है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet