क्या कागज के नोट अब इतिहास बनने वाले हैं ?

IMG-20221012-WA0013

धनेन्द्र कुमार

भारतीय समाज में नोट को धन के पर्यायवाची के रूप में देखा जाता है। हिंदी फिल्मों के बहुत सारे गाने इस पर आधारित हैं। जैसे ‘अपना सपना मनी-मनी’, ‘पैसा-पैसा करती है, तू पैसे पर क्यूं मरती है’, ‘सबसे बड़ा रुपैया’, ‘एक पैसा दे दो बाबू’, ‘पैसे की कहानी’, ‘छन-छन बाजे रुपैया’, ‘पैसा फेंक तमाशा देख’। काले धन पर भी आधारित बहुत खबरें छपती रहती हैं।

भारत में बैंक नोट का चलन लगभग 150 वर्ष पहले शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने 1861 में ‘पेपर करंसी एक्ट लागू किया और उसके बाद किसी प्राइवेट बैंक की करंसी जारी करने का चलन समाप्त हो गया। केवल सरकारी करेंसी, जो बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा छापी जाती थी, प्रचलित रह गई। इन पर इंग्लैंड की महारानी की फोटो रहती थी।
भारत में नोट छापने की पहली प्रेस 1928 में नासिक में स्थापित की गई। 1935 में रिजर्व बैंक की स्थापना हुई, जिसे यह पूरी जिम्मेदारी दी गई। 1938 में आरबीआई ने सर्वप्रथम नोट छापे, जिसमें इंग्लैंड के किंग जॉर्ज VI की फोटो थी।
1947 में देश के स्वतंत्र होने के बाद 1949 में भारत में पहला एक रुपये का नोट छपा, जिसमें अशोक की लाट का चित्र था। 1969 में महात्मा गांधी के चित्र के साथ पहली बार नोट छापे गए।
काले धन पर अंकुश लगाने के लिए नवंबर 2016 में नोटबंदी की घोषणा हुई, जिसके कारण पुराने बड़े नोट बंद हो गए और नए डिजाइन, आकार और रंगों के नए नोट बाजार में आ गए। इनका एक मकसद देश में नकली नोटों की समस्या से निपटना भी था, जिनका इस्तेमाल आतंकवाद और असामाजिक गतिविधियों के लिए होता था। साथ ही आधुनिक डिजिटल तरीके से लेन-देन को बढ़ावा देना था। इससे बैंकों में भी डिजिटल तकनीक और लेन-देन का अधिक प्रयोग प्रारंभ हो गया। आगे जाकर इसका लाभ विशेष रूप से कोरोना महामारी के दिनों में हुआ, जब देश-विदेश में व्यापार के लिए भारत में भी व्यापक रूप से डिजिटल देन-लेन का प्रचलन चालू हो गया।

मैले-कुचैले होते नोट
फिर भी भारत में आम जनता द्वारा, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में और अनौपचारिक/असंगठित सेक्टर में अभी भी मुख्यतः बैंक नोट द्वारा ही लेन-देन होता है। व्यापक प्रचलन और लापरवाही में मैल, नमी और गंदगी से और मौसम के कारण भी नोट समय के साथ पुराने और मैले-कुचैले हो जाते हैं। देखा गया है कि कुछ लोग नोट के ऊपर कुछ लिख भी देते हैं, जिससे नोट और भी गंदे दिखने लगते हैं। ज्यादा गंदे नोटों को रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों के माध्यम से बदल दिया जाता है। पिछले कुछ वर्षों के आरबीआई के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि देश में गंदे नोटों की भरमार हो गई है। आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट 2021-22 के अनुसार, इस तरह के नोट के निपटान की मात्रा वित वर्ष 2020 में 1,46,530 लाख से बढ़कर वित वर्ष 2022 के दौरान 1,87,801 लाख हो गई।

हल क्या है
आजकल विश्वभर में कागज के नोटों की जगह पॉलिमर के नोटों का चलन तेजी से बढ़ रहा हैं। ये कागज के नोटों के मुकाबले, अधिक सुंदर, चमकदार, स्मार्ट, मजबूत, वॉटरप्रूफ और टिकाऊ होते हैं। इन्हें बार-बार बदलने की आवश्यकता नहीं होती। विश्व में 75 से अधिक देश पॉलिमर के नोटों का उपयोग कर रहे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, इस्राइल, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फिलिपींस आदि शामिल हैं। इसके कुछ फायदे बेहद अहम हैं।

पॉलिमर नोट जाली मुद्रा की समस्या का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जो आतंकवाद के वित्तपोषण का एक प्रमुख आधार बना हुआ है।
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार 20, 200, 500 और 2000 रुपये के जाली नोटों में क्रमशः 16.5 फीसदी, 11.7 फीसदी, 101.9 फीसदी और 54.6 फीसदी की वृद्धि हुई है।
जाली नोटों में यह वृद्धि एक चिंताजनक मुद्दा है। पॉलिमर नोटों को अपनाने से बेहतर सुरक्षा मिलने के साथ इस समस्या को हल करने में मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए, सिंगापुर का मौद्रिक प्राधिकरण (एमएएस) पॉलिमर नोटों को प्रिंट करने के लिए विशेष पॉलिप्रोपाइलिन प्लास्टिक का उपयोग करता है, जिससे मल्टी-टोनल इमेज के साथ ‘व्यू-थ्रू’ (आर-पार दिखने) की सुविधा मिल जाती है।
अद्वितीय और अतिरिक्त सुरक्षा सुविधाओं के कारण पॉलिमर नोटों की नकली कॉपी बनाना मुश्किल है। पॉलिमर नोट पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में भी मदद करते हैं। ये लंबे समय तक चलन में रहते हैं। कागज के नोटों की तुलना में इनके निर्माण की प्रक्रिया भी अधिक सरल होती है। ऐसे समय में जब दुनिया पानी, ऊर्जा और कच्चे माल की कमी से जूझ रही है, ये नोट सस्टेनेबिलिटी में महत्ववपूर्ण योगदान कर सकते हैं।

सही समय
अब जबकि हमारा देश विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और बहुत तेजी से सभी क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीक अपना रहा है, यह पॉलिमर के नोटों को अपनाने का सही समय है। यह भी हो सकता है कि शुरू में कुछ विशेष मूल्यवर्ग के बैंक नोटों में प्रयोगात्मक स्विचिंग कर ली जाए, जैसे 2000, 500, 100, रुपये आदि और धीरे-धीरे अन्य बैंक नोटों में भी इसे लागू किया जाए। अब जैसे भारत विश्व की चौथी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, इस बारे में भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

(लेखक वर्ल्ड बैंक के पूर्व एक्जीक्यूटिव डॉयरेक्टर हैं और कम्पटीशन कमीशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन रह चुके हैं)

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
solobet giriş
solobet giriş
hititbet giriş
vdcasino
vdcasino
xslot giriş
xslot giriş