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भारतीय संस्कृति

तो क्या भारत के आदिवासियों को हिंदू नहीं मानना चाहिए ?

अभिषेक

जिन 5 राज्य के आदिवासी खुद को सरना धर्म के बता रहे हैं, उनकी तादाद ज्यादा जरूर है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी आदिवासी खुद को सरना धर्म के मानते हैं। दरअसल, इस धर्म के मानने वाले प्रकृति के उपासक होते हैं। ये ईश्वर या मूर्ति की पूजा नहीं करते हैं। सरना धर्म के लोग धर्मेश यानी पिता, सरना यानी मां और प्रकृति यानी जंगल की पूजा करते हैं। इस धर्म को मानने वाले ‘सरहुल’ त्योहार मनाते हैं। झारखंड की सरकार ने ‘सरना आदिवासी धर्म कोड बिल’ पास कर दिया है। अंग्रेजों के जमाने में 1871 में जब पहली बार जनगणना हुई थी तो आदिवासियों के लिए अलग से धर्म कोड था। 1941 तक इस नियम को लागू रखा गया। 1951 में आजादी के बाद जब पहली जनगणना हुई तो आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति कहा जाने लगा और जनगणना में ‘अन्य’ नाम से धर्म की श्रेणी बना दी गई। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में अनुसूचित जनजाति की आबादी 10 करोड़ से ज्यादा है। इनमें से 86 लाख से ज्यादा झारखंड में हैं। इस जनगणना में 79 लाख लोगों ने धर्म के कॉलम में अन्य भरा था। 49 लाख ने अन्य की जगह सरना लिखा था। इनमें से 42 लाख लोग झारखंड के थे।

चोल राजवंश का इतिहास जान लीजिए
चोल राजवंश की स्थापना तीसरी सदी में हुई थी 13वीं सदी तक इस राजवंश का राज चला था। कहा जाता है कि देश में चोल राजवंश का शासन सबसे लंबे समय तक रहा था। राजेंद्र तृतीय इस राजवंश के आखिरी शासक हुए थे। चोल राजाओं में राजाराज प्रथम और उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम सबसे पराक्रमी चोल राजा हुए थे। अशोक के 13वें शिलालेख में चोल राजाओं का जिक्र है। चोलों के अपने शासनकाल के दौरान विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया था। तंजौर चोल राजाओं की राजधानी रही थी। इतिहास में चोल राजाओं को शैव (Saivites) माना जाता रहा है। ये राजा भगवान शिव की पूजा करते थे। चोल राजाओं ने अपने शासनकाल के दौरान कई शिव मंदिर बनाए थे।

शैव और भक्ति साहित्य का भी जिक्र
परांतका I, राजेंद्र I, राजेंद्र राजा गांदिरित्या और उनकी पत्नी सांबियान मादेवी के शासनकाल के दौरान शैव और भक्ति साहित्य को काफी बढ़ावा दिया गया था। परांतका I के शिव मंदिर को सोने से मढ़ने का भी जिक्र कई जगह मिलता है। राजेंद्र -I ने अपने शासनकाल के दौरान कुछ जगहों पर शिव मंदिर बनाए थे। उन्होंने इन मंदिरों को जमीन और आभूषण भी दान किए थे। हालांकि, चोल राजा अन्य धर्मों के प्रति भी सहिष्णु थे। इनके शासनकाल के दौरान विष्णु की भी पूजा होती थी। मंदिरों और मठों का निर्माण के साथ ही चोल समाज में आर्थिक समृद्धि और लोगों का जीवन स्तर काफी बढ़ा था। चोल राजाओं ने कई मंदिरो और मठों का निर्माण करके कला, संस्कृति आदि को बढ़ावा दिया था। चोल राजाओं के दौरान हिंदुत्व का प्रभाव बढ़ा था। ऐसे में हासन का बयान कि चोल राजाओं के दौरान हिंदू धर्म नहीं था, इतिहास के तथ्यों के साथ मेल नहीं खाता है।

लिंगायत समुदाय का क्या इतिहास?
कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को अगड़ी जातियों में गिना जाता है। राज्य में 17 फीसदी से ज्यादा आबादी लिंगायतों की मानी जाती है। राज्य में लिंगायत और वीरशैव दो बड़े समुदाय हैं। इतिहास के अनुसार इन दोनों समुदायों का जन्म समाज सुधार आंदोलन के दौर में 12वीं सदी में हुआ था। इस दौरान पारंपरिक मूल्यों (ब्राह्मण वैल्यू) के खिलाफ लोग आवाज उठा रहे थे। इस दौरान वासव (Basava) जो खुद ब्रह्माण थे इन कुरीतियों का विरोध करना शुरू कर दिया। जल्द ही उनके पीछे बड़े पैमाने पर लोग जुड़ने लगे। दर्जी का काम करने वाले, मोची, कुम्हार का काम करने वाले लोग वासव के साथ जुड़ने लगे। इस दौरान ब्राह्माण व्यवस्था का जबरदस्त विरोध हुआ था। लिंगायत समुदाय शुरू में तो वैदिक धर्म का ही पालन करता था लेकिन बाद में लिंगायत समुदाय की स्थापना की गई।

हिंदू धर्म की प्रथाओं से अलग है लिंगायत समुदाय की प्रथा
लिंगायत धर्म को मानने वाले लोग वेद, पुराणा, मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते हैं। ये इष्टलिंग की पूजा करते हैं। इष्टलिंग अंडे के आकार की आकृति होती है। ये समुदाय पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता है। ये समुदाय अपने शवों को दफनाता है। वासव के अनुयायियों का मानना है कि उनके गुरु ने वैदिक परंपरा और जाति व्यवस्था का विरोध किया था। ये समुदाय खुद को हिंदू धर्म से अलग पहचान देने की लगातार मांग करती रही है। 2018 विधानसभा चुनाव से पहले भी लिंगायत समुदाय ने खुद को अलग धर्म देने की मांग उठाई थी। ये मांग अभी भी जारी रहती है।

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