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इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू

( ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया की डिस्कवरी’ )

अध्याय 1

नेहरू जी और धर्म की परिभाषा

वर्तमान में धर्म , मजहब और रिलीजन – इन तीनों को एक मानने की अवैज्ञानिक, अतार्किक और सृष्टि नियमों के सर्वथा प्रतिकूल अवधारणा कार्य कर रही है। भारत की राजनीति में जिस धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाया गया है, उसमें विश्वास रखने वाले सभी राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल धर्म की वास्तविक परिभाषा को समझने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उन्होंने धर्म को मजहब का पर्यायवाची मान लिया है। भारत में इस अवधारणा को स्थायित्व और सुदृढ़ता नेहरू जैसे इतिहास लेखकों ने दी है। इस्लामी तुष्टिकरण वास्तव में नेहरू जी की ही देन है। इस्लाम के प्रति उनका आकर्षण क्यों था ? इस पर यह भी कहा जा सकता है कि उनका मूल इस्लाम से था ? उनके पूर्वज इस्लाम को मानने वाले थे ? इसीलिए उन्होंने हिंदी भाषा को ‘ हिंदुस्तानी ‘ कहकर उसमें उर्दू के शब्दों का भरपूर प्रयोग करने पर बल दिया।
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ हिंदुस्तान की कहानी ‘ के पृष्ठ संख्या 28 पर वह लिखते हैं :-

” धर्म’ शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है, जिनकी ठीक-ठीक माप नहीं हुई है, यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आये हैं। एक मानी में इसे हम जाने हुए और पैमाइश किये हुए प्रदेश का विस्तार भी कह सकते हैं, अगरचे विज्ञान और मज़हब या धर्म के तरीके बिल्कुल जुदा हैं और बहुत हद तक दोनों के माध्यम अलग-अलग हैं।”

नेहरू जी धर्म और विज्ञान दोनों को अलग-अलग मानते हैं। जबकि भारतीय परंपरा में धर्म का विज्ञान से अन्योन्याश्रित संबंध है। विज्ञान के शुद्धतम स्वरूप का नाम धर्म है। यही कारण है कि भारत ने अपने धर्म का नाम सनातन रखा। सनातन अर्थात सार्वभौम सत्य। शाश्वत सत्य। सदा और अमिट रहने वाला सत्य। यह सनातन मनुष्य के अंतःकरण से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार धर्म अंतःकरण की पवित्रता का नाम भी है। जिसका अंतःकरण पवित्र हो वही धार्मिक हो सकता है। यही भारतीय परंपरा है। इसके विपरीत नेहरू जी ( धर्म को रिलिजन से कुछ अधिक मानने के उपरांत भी ) ने मजहबी चोले को ही धर्म मान लिया है और मत, पंथ ,संप्रदाय ,मजहब ,रिलिजन – इन सबको धर्म के अनुकूल मान लिया या कहिए कि वे इनको ही धर्म के समानार्थक मानते रहे।

भारतीय सनातन परंपरा में विज्ञान का सुधरा हुआ सुंदरतम स्वरूप ही धर्म है। धर्म हमारी आंतरिक शुचिता का प्रतीक है। धर्म मजहब और रिलिजन का समानार्थक नहीं है। इनका पर्यायवाची नहीं है।

मजहब और रिलिजन में छद्मवाद है। जबकि धर्म में किसी भी प्रकार का छद्मवाद नहीं हो सकता। धर्म हमारे आंतरिक जगत से जुड़ा है , जबकि मजहब या रिलिजन हमारे बाह्यजगत से जुड़ा है। मजहब कोरा भौतिकवाद या स्थूलवाद है, जो झगड़ों, फसादों और विवादों को जन्म देता है ,जबकि धर्म हमारे आंतरिक जगत की शुद्धता का प्रतीक है। जिसकी पवित्रता के कारण हम झगड़ों और फसादों से दूर होते जाते हैं। संसार में मनुष्य मात्र को ही नहीं, प्राणीमात्र को भी हम आत्मीय भाव से देखते हैं । उसके भीतर भी उसी आत्मा के दर्शन करते हैं, जो स्वयं हमारे भीतर है। प्रत्येक जीव को ईश्वर की अनिवार्य और श्रेष्ठतम कृति मानते हैं।

‘धर्म’ संस्कृत-भाषा का शब्द है और संस्कृत-कोशों में इसकी व्युत्पत्ति यों दी गई है ‘धियते लोकोऽनेन, घरति लोकं वा (घ्ञ धारणे मन्) ।’ तात्पर्य यह कि जो लोक का धारण करता है, वह धर्म है। ‘लोक’ में व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व सभी समाविष्ट हैं। इसलिए जो पदार्थ इन सभी को स्वस्थ, स्थिर व पवित्र बनाए रखता है, वही धर्म है। धर्म का मुख्य अर्थ यही है। अमरकोश में लिखित पुण्य, श्रेय, सुकृत आदि तथा महाभारत (१४।१८।२१) में उपन्यस्त न्याय, स्वभाव, आचार, ऋतु आदि अर्थ उक्त अर्थ के विस्तार-मात्र हैं। उक्त मुख्यार्थ का प्रतिपादन महर्षि वेदव्यास ने निम्नलिखित श्लोक में स्पष्टतः कर दिया है-

धारणाद् धर्ममित्याहुः धमों धारयते प्रजाः ।
यः स्याद् धारण-संयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।।

(महाभारत, शान्तिपर्व १०८/११)

भाव यह है कि धर्म को धर्म इस कारण कहते हैं कि वह प्रजाओं का धारण करता है।
इस प्रकार यह कहना कि अमुक व्यक्ति ने अमुक धर्म ग्रहण कर लिया, उचित नहीं है। क्योंकि धर्म को हम धारण नहीं करते, इसके विपरीत धर्म ही हमें धारण करता है। संसार में हम जिसको धर्म ग्रहण करना कहते हैं, वह किसी संप्रदाय को अपना लेना होता है।
जैन धर्म-शास्त्र भी मानो व्यास जी के उक्त कथन का समर्थन करते हुए ही कहते हैं-

दुर्गतिप्रसृतान् जीवान् यस्माद् धारयते ततः ।
धत्ते चैतान् शुभस्थाने तस्माद् धर्म इति स्थितः ।।

(दश वै. जिन. चू. पृ. १५) अर्थात् धर्म इस कारण धर्म कहलाता है कि वह दुर्गति की ओर बढ़ते हुए जीवों को धारण कर (थाम) लेता है तथा उन्हें शुभ स्थिति में स्थापित कर देता है।

वैशेषिक दर्शन के आरम्भ में महर्षि कणाद ने धर्म का सूत्र-रूप में लक्षण इस प्रकार किया है-

यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ।

अर्थात् जिससे लोक-परलोक में कल्याण हो, वही धर्म है। ”
( सर्व धर्मकोश )
भारतीय सनातन धर्म की इस उच्चता से नेहरू कोसों दूर खड़े रह गए। इसका कारण यह भी था कि नेहरू जी को संस्कृत का ज्ञान नहीं था। वह वैदिक आर्ष ग्रंथों से सदा दूर ही रहे और यदि उन्होंने कहीं उनका अध्ययन भी किया तो संस्कृत ज्ञान के अभाव में वह सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए।

नेहरू धर्म और विज्ञान को जानने की कसरत करते ही रह गए। तभी तो उन्होंने लिखा :- ” यह जाहिर है कि हमारे गिर्द एक विस्तृत अनजाना प्रदेश है और विज्ञान के जो भी कारनामे हों, वह इसके बारे में कुछ नहीं जानता। हां, जानने की कोशिश में जरूर है। शायद विज्ञान के साधारण तरीके और यह बात कि उसका संबंध दृश्य जगत और उसकी क्रियाओं से है, उसे उन बातों में पूरी तरह कारगर न होने दें, जो आत्मिक, कलात्मक, आध्यात्मिक और अदृश्य जगत से संबंध रखनेवाली हैं। जो हम देखते, सुनते और अनुभव करते हैं, यानी दिखाई पड़नेवाली और समय और अंतरिक्ष के भीतर परिवर्तनशील दुनिया तक ही जिंदगी महदूद नहीं है। यह बराबर स्पर्श कर रही है एक अनदेखी दुनिया को, जिसमें दूसरे संभवतः ज्यादा टिकनेवाले या उतने ही परिवर्तनशील तत्त्व हैं और कोई विचारवान आदमी इस अनदेखी दुनिया की अवहेलना नहीं कर सकता। विज्ञान हमें जिंदगी के मक़सद के बारे में ज्यादा नहीं बताता, सच पूछिये, तो कुछ भी नहीं बताता। यह अब अपनी सीमा को फैला रहा है और मुमकिन है कि बहुत जल्द उस संसार पर धावा बोले, जिसे हम अदृश्य संसार कहते रहे हैं, और इस तरह यह विस्तृत अर्थ में जिंदगी के मकसद को समझने में हमारी मदद करे, या कम-से-कम कुछ ऐसी झलक दे, जिससे इन्सान के अस्तित्त्व या वजूद के मसले पर रोशनी पड़े। धर्म और विज्ञान के बीच का पुराना झगड़ा एक नया रूप धारण करता है- यानी विज्ञान के तरीकों को धार्मिक और भावात्मक अनुभवों पर लागू करता है।

धर्म का रहस्यवाद, आधिभौतिकवाद और फ़िलसफे से मेल है। बड़े-बड़े सूफ़ी जरूर हो गए हैं, ( नेहरू सूफियों से प्रभावित रहे, ऋषि मुनियों से नहीं, इसलिए सूफियों का उल्लेख कर रहे हैं। मुस्लिम सूफियों को उन्होंने आध्यात्मिक जगत का सबसे बड़ा जानकार माना । ) जिनकी शख्सियतों में कशिश रही है, जिन्हें हम यह कहकर नहीं टाल सकते कि वे अपने को भुलावे में डाले हुए बेवकूफ थे। फिर भी रहस्यवाद को संकुचित अर्थ में लीजिये, तो उससे मुझे खीझ होती है। यह एक अस्पष्ट, ढीली और गिलगिली चीज जान पड़ती है, इसके पीछे मन का कठोर संयम नहीं, बल्कि मानसिक शक्तियों का त्याग है और यह भावात्मक अनुभव के समुंदर में रहना है। यह अनुभव कभी-कभी ऐसी क्रियाओं के बारे में, जो भीतरी हैं और कम जाहिर है, कुछ जान दे सकता है, लेकिन इसके जरिये आदमी अपने को भुलावे में भी डाल सकता है।”

नेहरू चीजों को जानने – समझने के पालने में झूलते रह गए। इसका कारण केवल एक था कि वह भारत और भारतीयता को समझ नहीं पाए । सनातन को नहीं समझ पाए । धर्म के मौलिक स्वरूप को समझने से भी वह वंचित रहे । अपने मौलिक स्वरूप में नेहरू जी कम्युनिस्ट थे। उस विचारधारा को उन्होंने स्थान स्थान पर कहीं खुलकर तो कहीं दबे शब्दों में अपना समर्थन दिया है। यही कारण है कि उनके लेखन में वैदिक ज्ञान की निर्मलता कहीं दूर-दूर तक भी दिखाई नहीं देती। धर्म का वैज्ञानिक स्वरूप क्या होता है ?- इस बात को नेहरू और नेहरू के पश्चात उनके उत्तराधिकारी आज तक भी नहीं समझ पाए हैं। यही कारण है कि मजहब की भांति ये धर्म को भी लड़ाई का कारण मानते हैं। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेहरू धर्म को लगभग अफीम के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि उनके उत्तराधिकारी धर्म की राजनीति को देश के लिए घातक मानते हैं। यद्यपि वह मजहब के आधार पर लोगों में विभाजन बनाए रखना चाहते हैं। सांप्रदायिक मान्यताओं को दूध पिलाने का भी काम करते हैं। उनकी राजनीति में दोगलापन है। उनकी सोच में सांप्रदायिक तुष्टिकरण है।

अपनी पुस्तक ‘ हिंदुस्तान की कहानी ‘ अर्थात ‘ डिस्कवरी ऑफ इंडिया ‘ के पृष्ठ 85 पर वह लिखते हैं कि ” हिंदुस्तान में मजहब के लिए पुराना व्यापक शब्द ‘ आर्य धर्म ‘ था। दरअसल धर्म का अर्थ मजहब या रिलिजन से ज्यादा विस्तृत है । इसकी व्युत्पत्ति जिस धातु शब्द से हुई है, उसके मानी हैं ‘ एक साथ पकड़ना ‘। यह किसी वस्तु की भीतरी आकृति उसके आंतरिक जीवन के विधान के अर्थ में आता है। इसके अंदर नैतिक विधान, सदाचार और आदमी की सारी जिम्मेदारियां और कर्तव्य आ जाते हैं। आर्य धर्म के भीतर वे सभी मत आ जाते हैं जिनका आरंभ हिंदुस्तान में हुआ है। वह मत चाहे वैदिक हों, चाहे अवैदिक। इसका व्यवहार बौद्धों और जैनियों ने भी किया है और उन लोगों ने भी जो वेदों को मानते हैं। बुद्ध अपने बनाये मोक्ष के मार्ग को हमेशा आर्य – मार्ग कहते थे।”

इस कथन में नेहरू जी कुछ-कुछ आर्य धर्म की पवित्रता और उत्कृष्टता को स्पष्ट करने में सफल हुए हैं। परंतु उनकी राजनीति के व्यावहारिक स्वरूप में ऐसा कहीं नहीं दिखाई दिया कि वह आर्य धर्म को श्रेष्ठ और पवित्र मानते थे और इसीलिए वह उसकी पवित्रता को राजनीति में बनाए रखने पर बल देते थे।

मेरी यह पुस्तक अक्षय प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है जिसका मूल्य ₹360 है। आपको डाक खर्च सहित ₹300 में भेजी जा सकती है।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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