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संपादकीय

पीएफआई पर प्रतिबंध : जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं

केंद्र सरकार द्वारा पीएफआई(PFI) पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय सचमुच ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या संविधान के किसी भी प्रावधान के अंतर्गत देश को तोड़ने की गतिविधियों में संलिप्त रहने वाला चाहे कोई भी संगठन हो और चाहे किसी भी संप्रदाय का हो, उसे सहन करना राष्ट्र के हितों से खिलवाड़ करना है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि देश में कांग्रेस के समय में ऐसी गतिविधियों में संलिप्त लोगों या संगठनों को सरकारी स्तर पर सहन करने की प्रवृत्ति ने तेजी से विकास किया। उसी का परिणाम है कि देश में देश विरोधी संगठन सैकड़ों की संख्या में पैदा हो गए।
वर्तमान में केंद्र सरकार ने जिस प्रकार पीएफआई को प्रतिबंधित किया है उससे आशा की एक किरण यह भी जगी है कि भविष्य में ऐसे अन्य संगठनों पर भी लगाम लगाई जाएगी। इस संगठन को सरकार की ओर से अभी 5 वर्ष के लिए ही प्रतिबंधित किया गया है, हमारा मानना है कि देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने वाले ऐसे संगठनों को जन्म भी न लेने दिया जाए। इसके लिए भी कठोर कानूनी प्रावधान देश में होने चाहिए । उन लोगों की भी जवाबतलबी होनी चाहिए जो ऐसे संगठनों को देश में काम करने के लिए मान्यता देते हैं। इसके अतिरिक्त जिन लोगों या संगठनों के द्वारा ऐसे देशविरोधी संगठनों को किसी भी प्रकार से सहायता दी जाती है या संरक्षण दिया जाता है या उनकी बातों का प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समर्थन किया जाता है उन पर भी देश के कानून की कड़ी नजर होनी चाहिए । इसके लिए सुरक्षा एजेंसियां जितनी भी अधिक मजबूती से काम कर सकती हैं ,उन्हें करना चाहिए। इसके लिए बेशक चाहे केंद्र सरकार पर तानाशाही का आरोप लगे, उससे घबराना नहीं चाहिए। देश के सभी राष्ट्रवादी लोगों को इस बात पर एक मत होना चाहिए कि हमें सचमुच देश विरोधी शक्तियों के विरुद्ध कठोरता के साथ काम करने के लिए एक तानाशाही सरकार की ही आवश्यकता है। जब भी सरकार की ओर से कोई बड़ी कार्यवाही होती है अर्थात देश के हितों के अनुकूल कोई कदम उठाया जाता है तो उन लोगों को ऐसे कदम से परेशानी होना स्वाभाविक है जो इस प्रकार की गतिविधियों में संलिप्त रहे हैं। अतः ऐसे लोगों की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए और ना ही उनकी किसी प्रकार की आलोचना से परेशान होना चाहिए। हम जहां सरकार के इस कदम की सराहना करते हैं वहीं सरकार से अपेक्षा करते हैं कि भविष्य में वह देश विरोधी शक्तियों के विरुद्ध इसी प्रकार के कठोर कदम उठाती रहेगी।
यह बहुत ही अच्छी बात है कि दो गैर भाजपा राज्यों ने भी अधिसूचना जारी कर इस संगठन को एक गैरकानूनी संघ घोषित कर दिया है। तमिलनाडु और केरल सरकार ने अधिसूचना जारी कर PFI और उससे संबंधित संगठनों को अवैध घोषित किया है। हालांकि इसके बाद महाराष्ट्र ने भी अधिसूचना जारी कर दी है। अधिसूचना जारी होने के बाद कई शहरों में पीएफआई के दफ्तरों को सील किया जा रहा है। बिना किसी राजनीतिक विद्वेष के जिस प्रकार केरल और तमिलनाडु की सरकारों ने केंद्र सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हुए अपनी ओर से भी सहयोग किया है हम उनके इस प्रकार के आचरण को भी राष्ट्र हित में उठाया गया सराहनीय निर्णय और आचरण मानते हैं ऐसा ही प्रत्येक प्रांत की सरकार को करना चाहिए।
  पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा जारी नोटिफिकेशन में इस संगठन की आतंकी, हिंसक और मजहबी कट्टरता फैलाती गतिविधियों और अवैध तरीकों से जुटाई रकम के बारे में जानकारी दी गई है। इससे साफ होता है कि पीएफआई ने लगभग हर वह देश-विरोधी काम किया जो भारत को कमजोर कर सकता है। इन गतिविधियों से समझा जा सकता है कि पीएफआई न केवल समाज को नुकसान पहुंचा रहा था, बल्कि खुद को तेजी से बढ़ा कर मजबूत भी कर रहा था। इस समय हम सबके लिए यह बहुत ही गौरव का विषय है कि अजीत डोभाल जैसे लोग देश के सुरक्षा तंत्र को गति देने का काम कर रहे हैं। उन्हें किसी प्रकार के प्रचार प्रसार की आवश्यकता नहीं है। एक ईमानदार राष्ट्रभक्त की भांति राष्ट्र की गहरी साधना में लगे ऐसे लोगों का जितना अभिनंदन किया जाए उतना कम है। सचमुच देश में देश विरोधी शक्तियों का जंजाल इतना व्यापक हो चुका था कि उसे काटने के लिए ऐसे ही राष्ट्र संतों की आवश्यकता बहुत देर से अनुभव की जा रही थी जो एकांत में बैठकर राष्ट्र साधना करते हुए इस बीमारी का उपचार करने वाले हों। हमारे विदेश मंत्री जयशंकर भी इसी प्रकार की श्रेणी के राष्ट्र आराधक हैं। वह भी समय-समय पर देश के हितों को बहुत मजबूती के साथ विश्व मंचों पर उठाते रहे हैं। इसके उपरांत भी वह किसी प्रकार से अपने आप को हर प्रकार से अपने आप को प्रचार से दूर रखते हैं।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई का गठन विशेष रुप से दक्षिण भारत में इस्लामिक गतिविधियों को तेजी से बढ़ाने के लिए 17 फरवरी 2007 को हुआ था। ये संगठन दक्षिण भारत के तीन मुस्लिम संगठनों का विलय करके बना था। यह एक बहुत ही आश्चर्यजनक तथ्य है कि इतने कम समय में इस संगठन ने अपने मिशन में आशातीत सफलता प्राप्त की। इसका बढ़ता हुआ शिकंजा देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा कर रहा था। जिन तीन संगठनों ने मिलकर इस संगठन का गठन किया था उनमें गठन किया था उनमें केरल का नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु का मनिथा नीति पसराई शामिल थे। इस समय देश के 23 राज्यों में यह संगठन सक्रिय है। जब देश में सिमी पर प्रतिबंध लगाया गया तो उसके सदस्यों ने बड़ी शीघ्रता से देश में पनपते इस इस्लामिक संगठन का समर्थन करते हुए इसकी सदस्यता प्राप्त की। 23 राज्यों में इस विनाशकारी तूफान के पहुंच जाने से ही स्पष्ट है कि देश के भीतर ही भीतर देश विरोधी गैंग किस प्रकार काम करता रहा है ? यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि इस प्रकार के संगठनों को सेकुलर कहे जाने वाले राजनीतिक दल भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से अपना समर्थन देते हैं। कई राजनीतिक दल ऐसे हैं जिन्हें केवल भाजपा सत्ता से बाहर चाहिए , इसके लिए उन्हें चाहे जो करना पड़े – वह करने को तैयार हैं। ऐसे आपियों पापियों की दृष्टि में देश विरोधी शक्तियों को समर्थन देना या उनका समर्थन लेना भी कोई पाप नहीं है।
कर्नाटक, केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में इस संगठन की काफी पकड़ बताई जाती है। इसकी पकड़ के चलते हुए ही दक्षिण भारत में इस्लामिक आतंकवाद की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। जबकि दक्षिण के राज्य उत्तरी राज्यों की अपेक्षा शांत रहते थे। इसका कारण एक यह भी था कि इस्लामिक गतिविधियों के माध्यम से अफरा-तफरी फैलाने वाले इस्लामिक संगठन उत्तरी भारत के राज्यों में ही अधिक सक्रिय रहते थे। पर इस संगठन के माध्यम से उनका ध्यान दक्षिण की ओर गया।इस संगठन की कई शाखाएं भी हैं। गठन के बाद से ही पीएफआई पर समाज विरोधी और देश विरोधी गतिविधियां करने के आरोप लगते रहते हैं।
अब इस संगठन से जुड़े हुए कुछ चेहरों के बारे में जानकारी लेते हैं। इनमें सबसे पहला नाम है – ओएमए सलाम, अध्यक्ष- केरल राज्य विद्युत विभाग के कर्मचारी सलाम फिलहाल निलंबित हैं और उनके खिलाफ पीएफआई से जुड़े होने के कारण विभागीय जांच चल रही है। वह रिहैब इंडिया फाउंडेशन से भी जुड़े हैं। दूसरा नाम है अनीस अहमद का जो कि राष्ट्रीय महासचिव है। बंगलूरू से पढ़ाई करने वाला अहमद, संगठन की साइबर गतिविधियों को विस्तार देने में अहम भूमिका निभाता है। वह एक वैश्विक दूरसंचार कंपनी में काम करता है और फिलहाल निलंबित है। जांच एजेंसियों ने पाया कि अहमद सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव है।  
मौसम का तीसरा प्रमुख नाम है पी कोया, राष्ट्रीय कार्यकारी काउंसिल सदस्य- प्रतिबंधित सिमी का पूर्व सक्रिय सदस्य कोया 1986 में काम के लिए कतर चला गया था। तीन साल वहां एक निजी कंपनी में काम करने के बाद लौटा कोया कोझिकोड विश्वविद्यालय में लेक्चरर है। वह कोझिकोड की इस्लामिक यूथ सेंटर का निदेशक भी रहा। इसी क्रम में चौथा नाम है मोहम्मद शाकिब उर्फ शफीफ, राष्ट्रीय सचिव (मीडिया एवं जनसंपर्क)- शाकिब पीएफआई का संस्थापक सदस्य है। वह रियल एस्टेट का कारोबार करता है।
संगठन का पांचवा चर्चित चेहरा है ईएम अब्दुर रहीमन, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष- रहीमन कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का सेवानिवृत्त लाइब्रेरियन है। वह सिमी का पूर्व अध्यक्ष रहा था। पीएफआई का एक प्रभावी नेता है और संगठन के बड़े फैसलों में उसकी अहम भूमिका रहती है। संगठन का छठा चेहरा है अफसर पाशा, राष्ट्रीय सचिव- पेशे से कारोबारी पाशा, 2006 में स्थापना के समय से पीएफआई का सक्रिय सदस्य है।
इसी प्रकार एक और चेहरा है मिनारुल शेख, पीएफआई पश्चिम बंगाल का अध्यक्ष- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पीएचडी शेख अपनी कोचिंग चलाता है। वह संगठन के लिए रिसर्च का काम करता है। अंतिम प्रमुख चेहरा है मोहम्मद आसिफ, अध्यक्ष पीएफआई राजस्थान- आसिफ कॉलेज में ही कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया में शामिल हो गया। कुछ दिन बाद राष्ट्रीय महासचिव भी बन गया। 2013-14 में प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया गया। वह बेहद सक्रिय है और प्रदेश में संगठन को विस्तार देने में उसकी अहम भूमिका है।
देश के सामाजिक स्वरूप को विकृत करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर जितने भी इस्लामिक संगठन देश में काम कर रहे हैं उन सब का एक ही उद्देश्य है कि भारत को दारुल हरब से निकालकर दारुल इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाए। यदि धर्मनिरपेक्षता का अंतिम उद्देश्य यही है कि भारत को दारुल इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाए तो हमें ऐसी धर्म निरपेक्षता से निसंकोच दूरी बनानी चाहिए । देश ने यदि अपने आपको पंथनिरपेक्ष घोषित किया था तो उसका अभिप्राय केवल एक था कि भारत की मौलिक चेतना के साथ खिलवाड़ न करते हुए सभी संप्रदाय अपनी अपनी स्वतंत्रता का उपभोग करते हुए अर्थात अपने अपने धार्मिक कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी धार्मिक स्वतंत्रता स्वीकार करते हुए काम करेंगे। पर यदि कुछ संगठन भारत की मौलिक चेतना को छिन्न-भिन्न कर भारत को ही मिटाने पर लगे हों तो उसके विरुद्ध भारत को उठ खड़ा होना चाहिए। यदि हमने अपने देश की आत्मा की पीड़ा को नहीं समझा तो फिर हमारा भारतीय होना ही व्यर्थ है। किसी भी मूर्खतापूर्ण धारणा का शिकार होकर अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति बेपरवाह हो जाना मरते हुए समाज और मरते हुए देशों की पहचान होती है। भारत ने अपने आप को अंधकार के उस काल में भी जीवंत बनाए रखा था जिसमें आशा की किरण दूर-दूर तक भी दिखाई नहीं दे रही थी। आज जबकि देश की सत्ता हमारे हाथों में है तो हमें समय रहते अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए देश की स्थिति के प्रति पूर्ण सावधान रहना चाहिए । इसके लिए कोई भी सरकार यदि कोई राष्ट्रवादी कदम उठाती है तो सभी देशवासियों को उसका अभिनंदन करना चाहिए। जहां तक बात पीएफआई की है तो उसके बारे में हम इतना ही कहना चाहेंगे कि :-

जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

 

 

 

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