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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 55 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

ईश्वर को जानो कण-कण में ,

विभूति होती देन योग की हर किसी को नहीं मिला करती।
जिनकी बने साधना ऊंची उनका ही अवलंब लिया करती।।

विभूति संपन्न अनेकों जन संसार में सम्मानित हुआ करते।
जिन पर कृपालु की कृपा नहीं, वे अपमानित हुआ करते।।

जिनकी कथनी करनी में भेद रहे , वे ही पिशाच बना करते।
असुर , दैत्य, राक्षस उनको ही, वेदादि ग्रंथ कहा करते ।।

आचरण जिनका हो दुर्गन्धित वे मोक्ष को नहीं पाया करते।
अंधकार जिन्हें प्रिय रहता -आगे भी उसी में भटका करते।।

ऊंचा सोचे – ऊंचा करते और ऊंचा बनने का व्यवहार करें।
वही ‘ऊंचे’ को पा सकते हैं जो सदा ऊंचे का सत्कार करें।।

ऊंचा बनना आसान सदा , है ऊंचे बने रहना बड़ा कठिन।
करो साधना ऊंचेपन की, है ऊंचे से मिलना बड़ा कठिन ।।

आत्महत्या करते वे पापी जन, जो राक्षस बन जीवन जीते।
आत्मा का हनन करते हैं सदा, वेदामृत कभी नहीं पीते।।

आत्मा की बातों को माने और आवाज सुने हृदय भीतर।
उसको ही उन्नत मानव मानो जो कान लगाए अपने अंतर।।

सृष्टि के पालक ईश्वर का, जो अपमान करें -तिरस्कार करें।
आत्महत्यारे उनको भी मानो, जो ईश्वर को अस्वीकार करें।।

भोगों के पीछे भगते जाना तो पागलपन की सीमा होती।
विषय भोगी मानव की जग में, ना इच्छा कभी पूरी होती।।

जो विषय भोगों में सुख खोजा करते, मोक्ष के भागी ना होते।
मोक्ष उन्हीं को मिल सकता , जो क्रोधी – कामी ना होते ।।

विषय भोगी मानव फंस जाता , काम – क्रोध के व्यसनों में।
तामस उनको ही घेरा करता, फंसते राजरोग के व्यसनों में।।

दुर्योधन के दुर्दिनों का दौर दिखाई देता दूर तक प्रकाश नहीं।
दंड पाती दिव्यता दुष्टता से, दानव दल का रहना ठीक नहीं।।

ईश्वर को जानो कण-कण में ,सर्वव्यापक भी समझो उसको।
आत्मोन्नति होती है अर्जुन ! जब उसको सदा निकट समझो।।

मेरी सभी विभूति अर्जुन ! मिल सकतीं तुझको सरलता से।
तू साधक बन जा , मत बाधक बन,शत्रु को मिटा गरलता से।।

यह गीत मेरी पुस्तक “गीता मेरे गीतों में” से लिया गया है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है । पुस्तक का मूल्य ₹250 है। पुस्तक प्राप्ति के लिए मुक्त प्रकाशन से संपर्क किया जा सकता है। संपर्क सूत्र है – 98 1000 8004

डॉ राकेश कुमार आर्य

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