Categories
भ्रांति निवारण

प्रयागराज, तीर्थराज और त्रिवेणी संगम की वास्तविकता, भाग – 4

(ईशोपनिषद के आधार पर )

मोक्ष प्राप्ति की साधना भारत के ऋषियों की अनुपम साधना है। शेष विश्व के विद्वान आज तक मोक्ष प्राप्ति की साधना के रहस्य को समझ नहीं पाए हैं । यद्यपि एक काल ऐसा भी था जब संपूर्ण भूमंडल पर सनातन का डंका बजा करता था। संपूर्ण भूमंडल पर वैदिक सनातन मूल्यों में विश्वास रखने वाले ऋषियों के श्री चरणों में बैठकर लोग मोक्ष की साधना का पाठ पढ़ा करते थे। महाकुंभ का आयोजन भारत के प्राचीन गौरव की पुनर्स्थापना के लिए एक अच्छा सेतु बन सकता है, परंतु इसके लिए शर्त केवल एक है कि महाकुंभ के अवसर पर वैदिक विद्वानों के द्वारा सनातन सिद्धांतों की समीक्षा का कार्य संपादित किया जाए और जो लोग सनातन सिद्धांतों की अवहेलना करते हुए या उनमें किसी प्रकार की मिलावट करते हुए सनातन की गलत व्याख्या करते पाए जाते हैं, उनके विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए।

सनातन सिद्धांतों को लेकर महाकुंभ के संबंध में चल रही इस अपनी लेखमाला की तीसरी किस्त में कर्तव्य -पंचक को हमने स्पष्ट किया था, जो ईशोपनिषद में दिए हुए हैं। पांच कार्य मनुष्य के लिए कर्तव्य बताये कि वे अपनी आत्मा के अनुकूल कार्य करें। मोक्ष प्राप्ति के साधन में यह भी सहायक हैं।

1 . संपूर्ण ब्रह्मांड में ईश्वर का सर्वव्यापक मानना।
2 . जगत के भोग्य पदार्थ में ममता को छोड़कर अपना प्रयोगाधिकार समझना।
3 . किसी की वस्तु या स्वत्व का अपहरण न करना।
4 . सदैव कर्म करना, उन्हें निष्कामता को लक्ष्य में रखकर धर्म या कर्तव्य समझकर करना।
5 . आत्मा के अनुकूल मन, वाणी और शरीर से आचरण करना। ‌‌

कर्तव्यपंचक का जो विवरण दिया गया है यह मनुष्य को मनुष्य बनाने में और ब्रह्मविद्या में प्रवेश करने में सहायक होते हैं। इसके लिए आत्मा के परिष्कार का मार्ग बताते हैं।
अब प्रश्न यह है कि ब्रह्मविद्या क्या है ? इस संदर्भ में ऋषियों की व्यवस्था है कि जिसमें प्रवेश की इच्छा कम से कम आस्तिक जगत को रहती है। जिस विद्या में ब्रह्म का वर्णन हो, वह ब्रह्मविद्या कही जाती है। ब्रह्म का वर्णन उसके गुणों के द्वारा होता है । उसके गुण वर्णनातीत हैं। सदैव ब्रह्म विद्या के विद्यार्थी को उपनिषदों में इसका समाधान मिलता है ।इस ब्रह्मविद्या को प्राप्त करने का उद्देश्य क्या है ? ब्रह्मविद्या के समक्ष समस्त सांसारिक विद्या तुच्छ मानी जाती हैं। यहां तक कि अध्यात्म विद्या भी इसके समक्ष तुच्छ है। ब्रह्मविद्या का उपयोग हम अपनी उन्नति के लिए करते हैं। इसके परे कोई और ऐसी विद्या शेष नहीं रह जाती जो जानने के योग्य हो।

उन्नति की चरम सीमा यह हो कि ब्रह्म को प्राप्त कर लें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिन साधनों की अपेक्षा है, उनको प्राप्त करना चाहिए। ब्रह्म की पहचान कैसे हो, ? वह कैसा होता है ? इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए वैदिक ऋषियों ने हमको बताया है कि वह ब्रह्म मन से भी अधिक वेगवाला है। क्योंकि वह प्रत्येक जगह पहले से ही पहुंचा हुआ होता है। इसलिए सर्वदेशी है। वह इंद्रियों से प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि इंद्रियां एक देसी वस्तु का ही ज्ञान करा सकती हैं।
स्पष्ट हुआ कि गंगाजल में स्नान करने से इंद्रियों का मल साफ होता है मन का मल साफ नहीं होता। कहा गया है कि :-

अद्भर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति मनः सत्येन शुद्धयति।
विद्या तपोभ्याम भूतात्मा बुद्धि र्ज्ञानेनशुद्धयति।।

अर्थात्- ” जल से शरीर, सत्य से मन, विद्या और तप से भूतात्मा तथा ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है।”

साधारण रूप से सत्य विचार सत्य व्यवहार और सत्य वचन से सत्य की परिभाषा की जाती है। वेदादि सत्शास्त्र भी मनुष्य को ‘सत्यं वद’ का आदेश करते हैं। मन की तीन अवस्थाएं जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति हुआ करती हैं। जागृत और स्वप्न में भी मन काम करना बंद कर दे। तब मन की स्थिति निर्विषय होती है और सुषुप्ति अवस्था मन की हो जाती है। आत्मा की दोनों प्रकार की शक्तियां बहिर्मुखी और अंतर्मुखी होती हैं। जब आत्मा सूक्ष्म और स्थूल शरीर द्वारा जगत के काम करती है तो वह उसकी बहिर्मुखी वृत्ति होती है और जब वह अंदर के काम करती है तो वह उसकी अंतर्मुखी वृत्ति होती है। जब बहिर्मुखी वृत्ति बंद कर दी जाए तो अंतर्मुखी वृत्ति स्वयं काम करने लगती है। बहिर्मुखी वृत्तियों को बंद करने का नाम ही मन का निर्विषय होना है जो अभ्यास से ही संभव है। ‌ उपरोक्त कितने गूढ रहस्य की बातें हैं। इनको कोई साधारण बुद्धि वाला कैसे समझ अथवा समझा सकता है ? जो व्यक्ति स्वयं सत्य को नहीं जानता वह दूसरों को क्या सत्य समझाएगा ? वह तो समाज को भ्रमित करना चाहेगा कि मोक्ष बड़े आराम से मिल जाता है, गंगाजल में स्नान करने मात्र से। ‌ वर्तमान में ज्ञान और कर्म का कोई उद्देश्य नहीं है । उपासना को तो कोई बताता ही नहीं। इसलिए ज्ञान, कर्म और उपासना के अभाव में मृत्यु के बंधन को छुड़ाने के स्थान पर उस बंधन को और भी दृढ़ करने के काम में ऐसे पौराणिक साधु लगे हुए हैं।
केवल वेदों के ज्ञान और कर्म के द्वारा मनुष्य को अमर बनाने के उत्कृष्ट संसाधन है । इसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। वैदिक वांग्मय में जो प्रथम शिक्षा दी है वह कर्म की है क्योंकि कर्म का बहुत ऊंचा स्थान है ।अध्यात्म विद्या के लिए कर्म सर्वप्रथम है। कर्म के साथ-साथ ज्ञान का सेवन भी आवश्यक है लेकिन जो लोग केवल ज्ञान का सेवन करते हैं वह भी अधिक अंधकार में पड़ते हैं। क्योंकि ऐसे लोग कर्म का आश्रय लेते हैं। ज्ञान होने मात्र का कोई फल नहीं मिलता परंतु कर्म जितना भी करेगा चाहे वह कितना भी उल्टा सीधा क्यों ना हो ,उसका कुछ ना कुछ फल अवश्य ही मिलता है। कर्म और ज्ञान का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। ‌‌ पांच ज्ञानेंद्रियों ,पांच तन्मात्राऐं, (शब्द, स्पर्श, रूप, रस ,गंध) पांच प्राण( प्राण ,अपान,व्यान , समान, उदान) एक मन , एक बुद्धि और अहंकार। ये 18 तत्व हैं , जिनसे मिलकर सूक्ष्म शरीर की उत्पत्ति होती है। सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर साधन है । इसी के द्वारा विषय में जगत से सूक्ष्म शरीर का संबंध होता है। सूक्ष्म शरीर के विकसित होने से मानसिक उन्नति होती है। परंतु कारण शरीर के विकसित और पुष्ट होने से मनुष्य में ईशप्रेम आता है ,और वह भक्त और योगी बना करता है। इस प्रकार तीनों ही शरीर पुष्ट होने चाहिएं।

मनुष्य महानता को कब प्राप्त होता है:-

आपदा को परिणत करे,अवसर में इन्सान।
सोने से कुन्दन बने,कीमत होय महान्।।

भावार्थ :- इस दृश्यमान संसार में आज तक जितने भी महापुरूष हुए हैं, उनके जीवन में विषम और भयावह परिस्थिति अवश्य आई है। चाहे आदि गुरु शंकराचार्य हों, युग प्रर्वतक महर्षि देव द‌यानन्द हों । यहाँ तक कि भगवान राम अथवा भगवान कृष्ण हों। सभी के जीवन में विषम से भी विषम परिस्थिति आती रहीं हैं। किन्तु जैसे एक चट्‌टान नदी के प्रवाह को रोकने का असफल प्रयास करती है लेकिन नदी अपनी रास्ता बदल कर आगे बढ़ती है और अपने गन्तव्य पर पहुंचती है, ठीक इसी प्रकार जो लोग मार्ग में आने वाली बाधाओं को अवसर में परिणत करके निर्बाध रूप से आगे बढ़ते हैं, वे एक दिन अपनी मंजिल पर अवश्य पहुँचते हैं और दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बनते है। जिस प्रकार सोना अग्नि में तपने के बाद कुन्दन बन जाता है, ठीक इसी प्रकार मुसीबतों के बावजूद भी जो अपने लक्ष्य को हासिल करते हैं, उनका महत्व अधिक हो जाता है।
ध्यान रहे, आत्मस्वरूप का दिग्दर्शन केवल मात्र तीन अवस्थाओं में होता है- सुषुप्ति, समाधि और मोक्ष । यह मनुष्य के विवेक और अभ्यास पर निर्भर है कि वह कौन सी अवस्था को प्राप्त होता है ? कुल मिलाकर कहने का भी अभिप्राय यह है कि साधना अपने आप करनी पड़ती है , तपना भी अपने आप पड़ता है। कर्म का फल भी अपने आप भोगना पड़ता है। इन्हें किसी के दिए गए प्रमाण पत्र से समाप्त नहीं किया सकता। इसलिए कर्म की पवित्रता पर ध्यान दो। यदि कर्म पवित्र है तो मन और हृदय की गंगा अपने आप पवित्र हो जाती है। जिससे आत्मा को परमात्मा से मिलने में सरलता हो जाती है।

क्रमश :

– देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट,
ग्रेटर नोएडा।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
hititbet
hititbet
Tuzla İpek Kirpik
betnano
hititbet giriş
hititbet
betnano
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betkom giriş
betkom giriş
grandpashabet
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş