गीता मेरे गीतों में , गीत 54 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

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मेरी विभूतियां अनंत हैं

मेरी विलक्षण शक्तियां , हैं मेरी तरह ही अनंत।
दिव्यताओं का मेरी ना हो सकता कभी अंत।।

जो कुछ भी यहां हो रहा सबका ईश्वर मूल।
किसी को कांटे मिल रहे , किसी को मिलते फूल।।

प्रारब्ध प्रबल होत है , खिला रहा सब खेल।
किसी का जीवन स्वर्ग सम किसी का बन गया जेल।।

ईश्वर सब में व्याप्त है , देखे बिरला कोय।
कण-कण में जो देखता, सचमुच पंडित होय।।

जीव सदा अल्पज्ञ है , सर्वज्ञ विधाता एक।
जीव अल्प सामर्थ्य है , समर्थ विधाता एक ।।

सुना नहीं – देखा नहीं , जो उससे बढ़कर होय।
सबका पालन कर रहा , नहीं दिखता मोय ।।

दूर कहीं बैठा हुआ , है फिर भी मेरे पास।
मिलन की आशा भरी हृदय में है प्यास।।

प्राणायाम करते रहो और करो योग अभ्यास ।
धीरे – धीरे मन रुके , ज्यों- ज्यों बढ़े अभ्यास ।।

लौ – दीपक रहती अचल, जब हवा हो शांत।
वैसे तन स्थिर करो , करके मन को शान्त ।।

मन में यदि जन्में कभी घातक नीच विचार।
धक्का दे बाहर करो , लाओ शुध्द विचार ।।

मन के मैल मिटाइये , करो योग उपचार ।
निर्मल चित्त बनाइए, करें कृपा करतार।।

बलदात: परमेश्वर , रखे दीन – हीन की लाज।
शत्रु का संहार कर और कहना मेरा मान।।

ध्यान लगा अर्जुन सुनो ! मेरे मन की पुकार।
शांति के हित धार ले , अपने सब हथियार ।।

विलक्षणता मेरी यही , ना रहे नीच के पास।
दीन – हीन की सेविका , भरे जीवन में उल्लास।।

यह गीत मेरी पुस्तक “गीता मेरे गीतों में” से लिया गया है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है । पुस्तक का मूल्य ₹250 है। पुस्तक प्राप्ति के लिए मुक्त प्रकाशन से संपर्क किया जा सकता है। संपर्क सूत्र है – 98 1000 8004

डॉ राकेश कुमार आर्य

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