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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से देश विदेश

क्या महारानी एलिजाबेथ के अंतिम संस्कार में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को नहीं जाना चाहिए ?

ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय 70 वर्ष तक अपने देश पर शासन करने के पश्चात ( 8 सितंबर 2022 को निधन होने के पश्चात ) अब इस संसार में नहीं रही हैं। उनका अंतिम संस्कार ब्रिटिश शाही परंपरा के अनुसार करने के लिए तैयारी की जा रही है। भारत ने उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने के लिए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को भेजने का निर्णय लिया है।
ब्रिटेन में इस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है। महारानी के निधन पर भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।  विदेश मंत्री एस जयशंकर 12 सितंबर को ब्रिटिश उच्चायोग जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देकर आए थे। इसके अलावा भारत ने रविवार 11 सितंबर को एक दिन का राजकीय शोक भी घोषित किया था।
द्रौपदी मुर्मू के ब्रिटेन की महारानी के अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने पर कुछ लोगों ने आपत्ति करनी आरंभ कर दी है। उनका कहना है कि जिस ब्रिटेन ने भारत पर इतने दिनों तक शासन किया और इस देश की अकूत संपदा को लूट कर ले गया, उसके साथ इस प्रकार के संबंध रखना उचित नहीं है।
किसी विदेशी राजा या राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु पर देश में इस प्रकार की चर्चा पहली बार हो रही है। ऐसा शोर मचाने वाले वही लोग हैं जिन्होंने ना तो अंग्रेजी को छोड़ा है और ना अंग्रेजियत को छोड़ा है। जिन्होंने सनातन को मिटाने वाली ब्रिटिश परंपरा को निभाने में अपनी शान समझी है। विदेशी भाषा और विदेशी भूषा को अपनाने में जिन्हें गर्व और गौरव की अनुभूति होती है। आधुनिकता दिखाई देती है। विदेशी सोच को अपनाकर देसी बातों को करना उचित नहीं लगता। इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिनके व्हाट्सएप संदेश भी अंग्रेजी भाषा में आते हैं। इन लोगों को हिंदी या भारतीय भाषा में बात करना अच्छा नहीं लगता।
जहां तक भारत के संस्कारों की बात है तो मृत्यु के उपरांत किसी भी प्रकार का वैर रखना भारत की संस्कृति और संस्कारों में नहीं है। बात उस समय की है जब श्री राम चंद्र जी महाराज के द्वारा दुरात्मा रावण का वध कर दिया गया था तो उसकी पत्नी मंदोदरी विलाप कर रही थी। वह कह रही थी कि मैं तो समझती हूं कि आपने अर्थात रावण ने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करके तीनों लोकों पर विजय पाई थी । अतः आप की इंद्रियों ने उस वैर का स्मरण कर अब तुम्हें परास्त किया है। मैंने आपसे पहले ही कहा था कि आप श्रीराम से वैर मत करो। परंतु आपने मेरी बात नहीं मानी ।आज आपको उसी का फल भोगने को मिला है।
सीता पृथ्वी से भी बढ़कर क्षमाशील समस्त संपदाओं की अधिष्ठात्री देवी और पतिव्रता है। हे स्वामी ! निश्चय ही आप उस पतिव्रता की तप रूप अग्नि से भस्म हो गए। संसार में बिना कारण के कोई भी नहीं मरता, सो यह सीता ही आपकी मृत्यु का कारण बनी है। इस प्रकार विलाप करती हुई और आंखों से आंसू बहाती हुई मंदोदरी स्नेह के कारण घबराकर मूर्छित हो गई।
तब श्रीराम ने विभीषण से कहा कि अब तुम स्त्रियों को समझा-बुझाकर लंका में भेज दो। अपने भाई का अंत्येष्टि संस्कार करो।
श्री राम के ऐसे वचन सुनकर धर्मात्मा विभीषण ने श्री राम जी के हृदयगत विचारों को जानने के लिए कुछ देर सोच विचार कर नम्रता पूर्वक और धर्मार्थ युक्त वचन कहे। उन्होंने कहा कि महाराज ! अपने धर्मव्रत का परित्याग करने वाले क्रूर, अत्याचारी, मिथ्यावादी और परस्त्रीगामी इस रावण का अन्त्येष्टि संस्कार करना मुझे उचित नहीं है। रावण यद्यपि मेरा बड़ा भाई रहा है, मेरा पूज्य है, परंतु यह इस योग्य नहीं कि मैं उसका अंत्येष्टि संस्कार करूं। क्योंकि यह भाई रूप में मेरा शत्रु था और सदैव सब की बुराई करने में लगा रहता था।
हे राम ! इसका अंतिम संस्कार न करने पर संसार के लोग पहले मुझे निष्ठुर और हृदयहीन कहेंगे, परंतु इस रावण के बड़े-बड़े दुर्गुणों को सुन वही लोग मेरे इस कार्य की प्रशंसा करेंगे।
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, वाक्यविशारद श्री राम विभीषण के इन वचनों को सुनकर परम प्रसन्न हुए और वाक्यचतुर विभीषण से बोले – राक्षसेश्वर ! आपकी सहायता से मैंने रावण पर विजय प्राप्त की है। अतः मुझे भी आपका प्रिय कार्य करना है अर्थात आपको लंका के राज्य सिंहासन पर बैठना है। अतः जो बात तुम्हारे लिए उचित और हितकर होगी, वह भी मैं तुमसे अवश्य कहूंगा।
यद्यपि यह रावण पापी और मिथ्यावादी था, तथापि यह बलवान ,तेजस्वी और शूरवीर था और युद्ध में कभी पराजित नहीं होता था। अतः आपको इसका अंतिम संस्कार करना ही चाहिए। जब तक मनुष्य जीवित होता है तभी तक उसके साथ वैर रहता है। मरने पर वैर समाप्त हो जाता है। यह मर चुका है और हमारा प्रयोजन भी पूरा हो गया है। अब तो यह जैसा तुम्हारा भाई था, वैसा ही मेरा भाई भी है। अतः अब तुम इसका सम्मान पूर्वक अंत्येष्टि संस्कार करो।
हे धर्मज्ञ विभीषण ! तुम्हारे हाथ से रावण का विधिपूर्वक अन्तिम संस्कार होने से तुम यश के भागी बनोगे।
स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती के द्वारा बाल्मीकि रामायण का भाष्य करते हुए उनकी इस प्रकार की उदारता पर यह विमर्श प्रस्तुत किया गया है कि – ‘यह है राम का आदर्श! राम रावण के मरने के पश्चात विभीषण से उसका अंत्येष्टि संस्कार कराते हैं और सारे वैर विरोध को भुला देते हैं। परंतु आज राम के वंशज क्या कर रहे हैं? राम का गुणगान करने वाले प्रतिवर्ष रावण का बुत बना कर उसे जलाते हैं। मैं पूछना चाहता हूं क्या यह कृत्य श्री राम के आदर्श के अनुरूप है? यदि नहीं तो यह निंदनीय कर्म शीघ्र समाप्त होना चाहिए। क्या रामलीला रचाने वाले ठेकेदार इस ओर ध्यान देंगे?”
कहने का अभिप्राय है कि मृत्यु के उपरांत मरने वाले से संसार के लोगों के सारे वैर विरोध समाप्त हो जाते हैं। तब हम ब्रिटेन की महारानी के अंतिम संस्कार में देश के राष्ट्रपति को न भेजने की मांग करके श्री राम के आदर्शों के अनुरूप कार्य कर रहे हैं या उसके विपरीत आचरण कर रहे हैं? इस पर चिंतन अवश्य होना चाहिए। अभी कुछ समय पश्चात दशहरा आने वाला है। उस समय अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए हम फिर रावण के पुतले जलाएंगे । इस पुतले जलाने की परंपरा पर भी श्री राम के आदर्श के अनुरूप चिंतन होना चाहिए कि यदि श्री राम स्वयं जीवित होते तो क्या वह ऐसा करते ? निश्चित रूप से वह कदापि ऐसा नहीं करते और करने वालों से भी कह देते कि जिससे वैर था वह अब इस संसार में नहीं है। अतः उसके जाने के पश्चात किसी प्रकार के वैर विरोध का प्रदर्शन करना उचित नहीं।
इसी संदर्भ में एक दूसरा उदाहरण भी हम ले सकते हैं। राजा मानसिंह को एक बार लंका विजय करने की जिद हो गई। मानसिंह ने यह विचार नहीं किया कि इतने लंबे चौड़े विशाल सागर को उसकी थल सेना के सैनिक किस प्रकार पार करेंगे? जिद के वशीभूत होकर वह लंका विजय के सपने बुनता जा रहा था। लोगों ने उसे समझाने का भरसक प्रयास किया । उसके मंत्रिमंडल के सदस्यों और अन्य विद्वान अनुभवी लोगों ने भी उसे समझाने का प्रयास किया। पर उस पर तो राजहठ सवार हो चुकी थी, इसलिए किसी के समझाने के उपरांत भी वह समझने को तैयार नहीं था। तब लोगों ने उसके भाट से इस समस्या का समाधान करने के लिए अनुरोध किया। लोगों को आशा थी कि मानसिंह का भाट उसे निश्चय ही किसी प्रकार समझाने में सफल होगा। तब उस भाट ने ऐसा तीर मारा जो सही निशाने पर लगा। उसने एक दोहा रच कर राजा मान सिंह से कहा कि राजन ! दिया हुआ दान वापस लेना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है, ऐसा शास्त्रों का कहना है। यह लंका नगरी आपके पूर्वज श्रीराम ने जीतकर विभीषण को दान में दी थी। आज अपने पूर्वजों की दी हुई दान की चीज को आप वापस लेने चले हो, इससे आपके पूर्वज श्री राम को अपयश का भागी बनना पड़ेगा। अतः मेरा आपसे अनुरोध है कि आप श्री राम को अपयश का भागी ना बनाएं और लंका विजय करने के अपने अभियान को यही रोक दें। मानसिंह को अपने भाट की बात समझ में आ गई और उसने लंका विजय करने की अपनी योजना को पूर्ण विराम दे दिया। इस प्रकार उस भाट के शास्त्रगत बौद्धिक चातुर्य से उस समय अनेक लोगों की प्राण रक्षा हो गई।
आज जब पग पग पर भारत के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का संकट खड़ा दिखाई दे रहा है तब श्रीराम के आदर्शो को अपनाकर चलने की नितांत आवश्यकता है। ब्रिटेन की महारानी के अंतिम संस्कार में न जाने की बात को तूल देना श्री राम जी के आदर्श के विपरीत आचरण करके अपने महान पूर्वज की यशोगाथा को कलंकित करने के समान है। इसलिए ऐसी मांग करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। यदि मांग करनी है तो ब्रिटेन के नए राजा से इस बात की की जाए कि भारत को उसका कोहिनूर वापिस दिया जाए और ऐसा कोई भी प्रतीक जो भारत की गुलामी को प्रकट करने वाला या दर्शाने वाला हो, वह भी भारत को ससम्मान लौटा दिया जाए। ब्रिटेन के नए राजा से मांगों की एक लंबी सूची हो सकती है परंतु जो संसार में नहीं रही उसके लिए अब किसी प्रकार का असम्मान प्रकट करना, अपने सांस्कृतिक मूल्यों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की महान परंपराओं के विपरीत होगा।
ऐसे में यदि यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के अंतिम संस्कार में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को नहीं जाना चाहिए ? हमारी दृष्टि में इसका यही उत्तर है कि भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को महारानी एलिजाबेथ के अंतिम संस्कार में अवश्य जाना चाहिए। ऐसा करके भारत की राष्ट्रपति भारत के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा कर रही होंगी। वह उस समय भारत की राष्ट्रपति के रूप में ही वहां उपस्थित नहीं होंगी अपितु समग्र राष्ट्र की ओर से उसकी सांस्कृतिक संदेशवाहिका भी होंगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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