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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से महत्वपूर्ण लेख

ब्रिटेन जैसी विश्व शक्ति को पीछे छोड़ कर : आर्थिक शक्ति के रूप में उभरता भारत


केवल नकारात्मक चिंतन को प्रस्तुति करते रहना और उसी में डूबे रहना अपनी मानसिकता को संकीर्ण करने के समान होता है। आज जब देश अपनी स्वाधीनता के 75 वर्ष पूर्ण कर चुका है और इस राष्ट्रीय पर्व को सारे देश ने अमृत महोत्सव के रूप में मनाया है तब हमारे लिए यह समाचार बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत ने 75 वर्ष की इस अवधि में उस ब्रिटेन जैसी विश्व शक्ति को आर्थिक क्षेत्र में पीछे छोड़ दिया है जिसने कभी भारतवर्ष को लुटने का कीर्तिमान कायम किया था। अंग्रेजों के भारत पर साम्राज्य के लिए सामान्यतया यह कह दिया जाता है कि उन्होंने भारत वर्ष पर 200 वर्ष शासन किया। हमारा इस पर तथ्यात्मक और प्रमाणिक आधार पर स्पष्ट कहना है कि भारतवर्ष पर अंग्रेजों का सीधे मात्र 89 वर्ष शासन रहा। महारानी विक्टोरिया के 1858 के घोषणा पत्र से लेकर से लेकर 1947 तक की इस अवधि में भी भारतवर्ष की लगभग 200 रियासतें ऐसी थीं जो अंग्रेजों से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखती थीं अर्थात वे अपनी स्वाधीनता को बचाए रखने में सफल रही थीं। इस प्रकार लगभग 60% भाग पर ही अंग्रेजों का भारत पर शासन था। इन 200 रियासतों में से भी 20 रियासतें ऐसी दिन जो ब्रिटेन और फ्रांस से भी बड़ी थीं।
भारत के इतिहास को विकृत करने की प्रक्रिया को अपनाने वाले इतिहासकार या दूसरों की जूठन को लोगों के सामने परोसने के काम में लगे लोगों ने यह भ्रम या भ्रांति फैलाई है कि 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद ही अंग्रेजों का भारत पर निर्णायक साम्राज्य स्थापित हो गया था। ऐसे मूर्खों से यह पूछना चाहिए कि क्या 1757 की उस लड़ाई में लड़ रहे भारत के नवाब या राजा संपूर्ण भारत पर शासन करते थे ? जिससे उनके हारने से सारा भारत अंग्रेजों के अधीन हो गया था। यदि नहीं, तो फिर इस भ्रांति को फैलाने की आवश्यकता क्या है ?
इस संदर्भ में हमें गूगल पर जाकर आज भी सर्च करना चाहिए 1800 ईसवी के लगभग भारतवर्ष पर मराठों का साम्राज्य कितने क्षेत्रफल पर था ? आपकी आंखें खुल जाएंगी कि मैसूर से लेकर सहारनपुर तक के बड़े भूभाग पर उस समय मराठों की शासन सत्ता बेधड़क शासन कर रही थी। 1757 ईसवी के पलासी युद्ध के पश्चात 1800 ई 0 तक भी यदि मराठा साम्राज्य भारत के बड़े भूभाग पर शासन कर रहा था तो ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत पर शासन का आधार 1757 के प्लासी के युद्ध को क्यों बनाया जाना चाहिए?


हां इतना अवश्य है कि 1757 के युद्ध के पश्चात अंग्रेजों के भारत में पांव जम गए थे। इसके पश्चात के 190 वर्ष के काल में अंग्रेजों ने जितने भी भारत पर अपना शासन स्थापित करने में सफलता प्राप्त की उतने में से उन्होंने लगभग 45 ट्रिलियन की संपत्ति लूटने में सफलता प्राप्त की थी। इसका अभिप्राय है कि अंग्रेज भारत से लगभग 3000 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति लूट कर ले गए थे। यह राशि यूनाइटेड किंगडम की जीडीपी से 17 गुना अधिक है। बताया जाता है कि 1765 ईसवी से 1938 तक अंग्रेजों ने कुल 9 .2 मिलीयन पाउंड का खजाना भारत से लूटा था। हमारे वर्तमान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस बात की जानकारी कुछ समय पहले अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में अटलांटिक काउंसिल की बैठक को संबोधित करते हुए दी थी।
भारत के विद्वान विदेश मंत्री ने अपनी निर्भीकता को प्रकट करते हुए कई मंचों पर बहुत कुछ ऐसा बोला है जिससे भारत के सम्मान में वृद्धि हुई है। निश्चित रूप से उन्हें देश के विदेश मंत्री का दायित्व देकर प्रधानमंत्री ने एक अच्छे हीरे को सही स्थान पर फिट किया है। श्री जयशंकर ने यह आंकड़े सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सव पटनायक की इकोनामी स्टडी रिसर्च रिपोर्ट के आधार पर उल्लेखित किए थे। फर्स्ट होता है कि उनके बोलने का स्पष्ट प्रमाणिक आधार था।
ब्रिटिश सत्ताधीश भारत में जब शासन कर रहे थे तो वे भारत के पैसे को भारत से लूट कर भारत को बर्बाद करने में भी खर्च किया करते थे। देश में सांप्रदायिक हिंसा फैला कर सामाजिक स्तर पर लोगों को दूर करने के खेल में अंग्रेज बहुत अधिक सिद्धहस्त थे। उन्होंने भारत में सांप्रदायिक शक्तियों को तो प्रोत्साहित किया ही साथ ही साथ भारत में जातिवाद को भी हवा देने का हर संभव प्रयास किया। इसके लिए भारत के इतिहास का विकृतिकरण करते हुए जातिवाद, छुआछूत, ऊंच-नीच के लिए मनु जैसे वैज्ञानिक ऋषि को भी बदनाम करने का उन्होंने काम किया। उसी आधार पर आज भी देश में कई लोग मनु महाराज की वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था का आधार मानते हैं। भारत से लूटे गए धन को अंग्रेजों ने 1840 में चीनी घुसपैठ और 1857 की क्रांति को दबाने में भी उपयोग किया था।
दूसरे के धन को लूट लूट कर अपनी तिजोरी या भरने के लिए प्रसिद्ध रहे ब्रिटेन आज को आज निरंतर पतन का सामना करना पड़ रहा है।
कभी संसार के बहुत बड़े भूभाग पर अपनी चतुरता की धाक जमा कर शासन करने वाला ब्रिटेन धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर जा रहा है। तीसरा विश्वयुद्ध यदि हुआ तो इस देश का पूर्णतया पतन होना निश्चित है। अब भी यदि हम देखें तो मार्गरेट थैचर के बाद ब्रिटेन का कोई भी ऐसा नेता नहीं हुआ है जो विश्व नेता का सम्मान प्राप्त कर सका हो। यह स्थिति बताती है कि विश्व राजनीति में इस समय भी ब्रिटेन धीरे-धीरे फीका पड़ता जा रहा है। वास्तव में उसके इस पतन की प्रक्रिया का केवल एक कारण है कि उसने पाप से दूसरे देशों का धन लूटा है, जिसका परिणाम अब उसे भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।
।अब हमारे देश के लिए यह बहुत बड़ी प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने ब्रिटेन को पछाड़कर संसार की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सम्मान प्राप्त किया है। ब्रिटेन का भारत से आर्थिक क्षेत्र में इस प्रकार पिछड़ना उसके लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। जिस भारत देश के बड़े भूभाग पर अधिकार करके और उसकी अकूत संपदा को लूटकर ब्रिटेन कभी गर्व से फूला नहीं समाता था वही आज अपने स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर उससे पीछे रह गया है। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए किसी एक पार्टी की सरकार या किसी एक प्रधानमंत्री को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक को और देश की सत्ता में बैठे प्रत्येक उस प्रधानमंत्री को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए जिसने इस दिशा में अपने अपने समय पर महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस संबंध में प्रकाशित खबर के अनुसार वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत के आगे अब सिर्फ अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी हैं। ब्रिटेन इन दिनों कई तरह की दुश्वारियों से गुजर रहा है जिनमें महंगाई, कम ग्रोथ और राजनीतिक अस्थिरता शामिल है। वहीं, भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है।
हाल ही में वित्त सचिव टी वी सोमनाथन ने कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष में 7 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर हासिल करने की ओर बढ़ रही है। उन्होंने पहली तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर के आंकड़ों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अर्थव्यवस्था महामारी-पूर्व के स्तर के मुकाबले 4 प्रतिशत ऊपर है। उन्होंने आयात बढ़ने से राजकोषीय स्थिति पर दबाव पड़ने की चिंताओं को दूर करते हुए कहा कि सरकार चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 6.4 प्रतिशत पर बनाए रखने के लिए आश्वस्त है।
कृषि और सेवा क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन से देश की GDP चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 13.5 प्रतिशत रही। इस वृद्धि के साथ भारत दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। चीन की वृद्धि दर 2022 की अप्रैल-जून तिमाही में 0.4 प्रतिशत रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के बुधवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, इससे पिछले वित्त वर्ष (2021-22) की अप्रैल-जून तिमाही में GDP की वृद्धि दर 20.1 प्रतिशत रही थी। जीडीपी वृद्धि दर 2021 की जुलाई-सितंबर तिमाही में 8.4 प्रतिशत, अक्टूबर-दिसंबर में 5.4 प्रतिशत और जनवरी-मार्च, 2022 में 4.1 प्रतिशत रही थी।
निश्चय ही इस प्रकार के आंकड़े हम सब के लिए गर्व और गौरव का विषय हैं। परंतु इसके उपरांत भी देश के भीतर जिस प्रकार भुखमरी गरीबी फटेहाली और बेरोजगारी की समस्या है उसकी ओर से हम आंखें नहीं फेर सकते हैं। इसके लिए भी हम सब को सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है। देश को विश्व गुरु बनाने के संकल्प के साथ यदि लेकर आगे बढ़ना है तो हम सबको कई प्रकार के मतभेदों को भुलाकर केवल और केवल एक लक्ष्य पर दृष्टि केंद्रित करके काम करना होगा। विकल्पविहीन संकल्प के साथ आगे बढ़ना किसी भी देश और समाज के लिए बहुत आवश्यक होता है। इस समय भारत के लिए यह बहुत ही अच्छी बात है कि राष्ट्र की संकल्प शक्ति एक दिशा में एक नेता के संकेत पर आगे बढ़ रही है। हमें इस प्रवृत्ति को स्थाई संस्कार के रूप में स्थापित करना होगा।

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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