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आज का चिंतन

हमारे जीवन में गुरु का महत्व

सब धरती कागद करूँ लेखनी सब बन राय ॥
सात समुन्द्र की मसि करूँ , गुरु गुण लिखा न जाय ॥
तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे ना करि सकै , गुरु करे सो होय ॥ (वाणी कवीर साहिब)
‘गुरुदेव ‘ का अर्थ जो अन्धकार से प्रकाश में ले जावे , अथवा गुरुदेव गुरु के प्रकाशवान नूरी स्वरूप को कहते हैं । थियोसाफी वाले भी कहते हैं सूक्ष्म और कारण मण्डलों पर मासटर सोल्ज ( गुरुमुख आत्मा ) का स्वरूप अत्यन्त प्रकाशवान होता है ।
‘ गुरुदेव ‘ पद का सतगुरू के अन्तरी नूरी ( ज्योतिर्मय ) स्वरूप के लिए प्रयोग किया गया है । ‘ गु ‘= अन्धकार और ‘रू ‘ = प्रकाश परमार्थ का आत्मिक मार्ग सुगम नहीं , अति कठिन है । कठोपनिषद में आया है : –
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्नि बोधयत ।
क्षुरस्य धारा निशानाम दरत्यया ,
दुर्गम पथस्तत कवयो वदन्ति ॥

अतार्थ – उठो , जागो , महापुरुषों के पास जाकर उनसे ज्ञान प्राप्त करो । बुद्धिमान लोग कहते हैं कि यह मार्ग छुरे की धार की तरह तीक्ष्ण और विकट है तथा उस पर चलना कठिन है । कुरान शरीफ में इसको ‘पुल सिरात ‘ कहा है । जो उस्तरे की धार की भांति तीखा बाल से भी बारीक है । गुरवाणी में कहते हैं कि गुरसिक्खी वालो ! निक्की ते खडिओ तिखखी है ।
वेदों शास्त्रों में भी यम – नियमों की कठिन विधियों तथा संयमों को पढ़कर रोगटे खड़े हो जाते हैं । फिर कहाँ एक अकेला , समर्थ हीन मोहमाया का शिकार मनुष्य और मनुष्य के साथ पांच बली शत्रु ( काम , क्रोध , लोभ , मोह और अहंकार) ! मनुष्य इस भवसागर से पार हो तो किस प्रकार ? सच तो यह है कि ईश्वर या परमात्मा हमारे उध्दार के लिए उस दुनिया में सतगुरू ‘ को भेजता है । हजरत ईसा कहते है कि ” मैं और मेरा पिता एक हैं । ‘
इसी प्रकार अपने मुर्शिद या गुरुके विषय में बुल्लेशाह कहते हैं कि –
” मौला आदमी बण आया ,
ओह आया जग जगाया॥
आदि गुरु ग्रंथ –
हरि का सेवक सो हरि जेहा भेद न जाणहु माणस देहा ।
ज्यों जल तरंग उठह बहु भांति फिर सललै सलल समाइदा॥

गुरू मनुष्य देह का आवरण ( चोला ) धारण किये होने के कारण उसे हम मनुष्य समझते हैं । हमें उन्हें परमात्मा से भिन्न नहीं समझना चाहिए । लहर समुन्द्र में से उठती है , और समुन्द्र में ही समा जाती है Iदेखने में वह समंदर से अलग लगती है लेकिन असल में उसे जाती है । देखन में वह समुद्र से अलग लगती है , लेकिन असल में उसे समुद्र अलग नहीं किया से जा सकता ।

स्वामी जी महाराज कहते हैं –

राधा – स्वामी धरा नर रूप जगत में ,
गुरु होय जीव चिताये ।
( सार वचन , वचन | शब्द . 2)
हमारा सच्चा है वर्ड ,नाम , शब्द , चेतन धन , दिव्य प्रकाश या अनुभूति के आधार पर जो भी नाम उसे देना चाहे । सतगुरू उस शक्ति का देहचारी रूप है ।
गुरु को जानना या उसकी वास्तविक सत्ता समझना अति कठिन है । उसको समझने के लिए उसके जैसी ही आंखों की आवश्यकता है । किसी वली ( महात्मा ) को कोई वली ही जान सकता है । तन – मन के पिंजरे में केंद्र मनुष्य उसको क्या समझ सकते हैं । जो आत्मिक उन्नति में या रूहानी मार्ग में जितने ऊंचाईयों पर होगा , यह उसे उतना ही समझ सकता है।
कूँजों ( पक्षि का नाम ) की सार उसके साथ उड़ने वाली वाली कुँजें ही जान सकती हैं , नीचे जमीन पर रहने वाले चिडियो या कौओं को क्या पता कि कूंजे कौन से देश से आती है और किस और उड़ानें भरती हैं । सार वचन में गुरु की पहचान इस प्रकार दी गई है –
गुरू सोई जो शब्द सनेही , शब्द बिना दूसर नहि सेई ।
शब्द कमावे सो गुर पूरा उन चरनन की हो जा धूरा ।
(सार वचन 105 )
बाइबिल –
” वह शब्द देह चारण करके हमारे बीच में रहता है । ‘
पलटू साहब –
पलटू घर में राम के और न करता कोय॥
नाम सनेही संत है , वोह जो करे सो होय ”
परमार्थ विकट मार्ग है , बिना गुरु के इस पर चला नहीं जा सकता है –
गुरु वाणी में बड़े जोरदार शब्दों में संत या गुरु की अवश्यकता के बारे में कहा गया है कि कोई संसार भ्रम न करे , बिना गुरु के कोई संसार सागर से पार नहीं उतर सकता –
” मत को भरम भूले संसार , गुरु बिन कोई न उतरस पार I
(गौड म .५ , ८६४)
कहु नानक प्रभि इहै जनाई ,
बिन गुरु मुक्ति न पाइये भाई।
गुरू के बगैर धर्मपुस्तकों के उपदेश समझ में नहीं आते शवेता शवेतर उपनिषद छठा अध्याय श्लोक 23 में आया है ‘ जिसकी परमात्मा में परम भक्ति हो और जैसी परम भक्ति परमात्मा से हो वैसी गुरु से हो ऐसे महात्मा ही को इस उपनिषद के उपदेश समझ में आएंगे’
श्लोक 116 – जो लोग बिना गुरु के वेद को सुन सुना कर सीखते हैं वह वेद के चोर है क्योंकि वेद का ठीक अर्थ गुरु के बिना समझ में नहीं आ सकता और वेद के गलत अर्थ लगाने वाला नरकों में जाता है।
श्लोक 192 – शरीर , जिहवा , बुद्धि. कामनाओं और हृदय को वश में रखकर हाथ जोड़कर गुरु को देखता हुआ सम्मुख खड़ा रहे ।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के तत्कालीन समय गुरु स्वामी विरजानंद जी महाराज थे । गुरु जी ने महर्षि जी को सत्य असत्य आदि का प्रकाश व उचार के लिए समयनुसार उपदेशित किया था । यह सब गुरू जी का ही प्रताप है कि समाज में फैली कुरुतियां , भ्रान्तियां , सत्य असत्य का मान ( अहसास ) महर्षि जीने समाज को कराया।
क्रमशः

ऋषि राज नागर एडवोकेट

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