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इतिहास के पन्नों से

राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा की कांग्रेस के इतिहास का काला सच भाग – 5

आठवां प्रश्न

मूल संविधान में सेकुलर शब्द नहीं था। इंदिरा गांधी ने इस शब्द को भारत के संविधान में 1976 में संविधान के 42 वें संशोधन के अंतर्गत स्थापित किया। इस शब्द का अर्थ हिंदी में यदि पंथनिरपेक्ष रखा गया होता तो बहुत ही अच्छा होता परंतु कांग्रेसियों ने इसका अर्थ धर्मनिरपेक्ष कर दिया। जिस एक शब्द से कांग्रेस की हिंदू विरोधी राजनीति को चार चांद लग गए। इसके साथ ही उसे मुस्लिम तुष्टिकरण करने का खुला प्रमाण पत्र भी प्राप्त हो गया। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में झूठ और मक्कारी इतनी परोसी गई कि भारतवर्ष की 80 प्रतिशत जनता अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगी।

नौवां प्रश्न

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत वर्ष के कुल प्रांतों की संख्या 16 थी। (कभी-कभी संख्या कुछ लोग कम या अधिक बताते रहते हैं) उनमें से तेरह प्रांतों से कांग्रेस कार्यसमिति की यह मंशा प्रस्ताव के द्वारा थी कि सरदार बल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री बने नेहरू कैसे? क्यों? 13 बनाम 3 के मुकाबले पर
तीन की जीत। लोकतंत्र का गले घोटने की प्रक्रिया कांग्रेस ने 1947 में देश की आजादी के एकदम बाद ही आरंभ कर दी थी। लोकतंत्र की प्रक्रिया को बाधित करना और लोकतांत्रिक संस्थानों का अपमान करना इस प्रकार कांग्रेस को आजादी की भोर में ही प्राप्त हो गया था। कांग्रेस की इस प्रकार की गला घोटने की नीति और लोकतांत्रिक संस्थानों का अपमान करने की प्रक्रिया का पालन देश के अन्य राजनीतिक दलों ने भी किया। इस प्रकार कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व के कारण देश में एक नई लोकतांत्रिक तानाशाही ने जन्म लिया।
यह फार्मूला कांग्रेस के अतिरिक्त क्या किसी और पर भी आता है? 13 हार जाएं और तीन जीत जाएं? यदि कांग्रेस में हिम्मत है तो आज भी इस बात का स्पष्टीकरण इस देश को दे दे कि 13 प्रांतीय कांग्रेस की वर्किंग कमेटी प्रस्ताव के बावजूद नेहरू को किन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री बनाया गया था?
इसके अतिरिक्त एक प्रश्न यह भी है कि तत्कालीन उप प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल को राजा हरिसिंह की मदद करने के लिए नेहरू तत्कालीन प्रधानमंत्री क्यों रोकते रहे?
जब पाकिस्तानी सेना कबायलियों की वेशभूषा में जम्मू कश्मीर का बहुत अधिक क्षेत्रफल अपने आधिपत्य में कर चुकी थी तब अक्टूबर के महीने में सरदार वल्लभ भाई पटेल के द्वारा जम्मू कश्मीर में आक्रमण करके पाकिस्तानी फौज को रोका गया तो नेहरू ने यथास्थिति क्यों लागू की ? देश के गंभीर राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे केवल एक कारण मानते हैं कि ऐसा करके नेहरू मुस्लिमों को लाभ पहुंचा देना चाहते थे।
नेहरू उस समय कश्मीर समस्या के समाधान के प्रति असावधान दिखाई देते थे। वह राजा हरिसिंह की अपेक्षा शेख अब्दुल्ला को अधिक से अधिक लाभ देना चाहते थे। अपनी इसी नीति को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर और अपने आप को अंतरराष्ट्रीय नेता सिद्ध करने के लिए उन्होंने कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया। फलस्वरूप इस समस्या को वह यूएनओ में ले गए।
क्या इसके पीछे यही कारण था की वर्ष 1943 में राजा हरि सिंह के विरुद्ध जो षड्यंत्र नेहरू की शेख अब्दुल्ला के साथ साजिश से प्रारंभ हुआ था, उसी योजना पर यह कार्य हो रहा था? शेख अब्दुल्ला को नेहरू ने जम्मू कश्मीर स्टेट को अलग करते हुए वहां का प्रधानमंत्री घोषित क्यों किया?
जब जिन्ना यह कह रहा था कि मुझे 2 वर्ष के लिए अथवा कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री बना दीजिए और भारत का विभाजन नहीं होगा तो इसमें नेहरू इस बात पर क्यों अड़े कि नहीं प्रधानमंत्री उन्हीं को बनना है। अगर जिंन्ना को प्रधानमंत्री साल 2 साल के लिए बना दिया गया होता , जो उस समय टी0बी0 का मरीज था, उसकी मृत्यु हो जाती तो यह सारा क्षेत्र अपना होता। पाकिस्तान दूसरा राष्ट्र न बना होता। उसी में से जो अलग बना बांग्लादेश न बना होता। जो आज हमारे लिए नासूर बन गए हैं। तीसरी स्टेट जम्मू कश्मीर को भी अलग से शेख अब्दुल्ला को न दिया गया होता। भारत के बहुत बड़े भूभाग को इन दोनों देशों को देना बहुत बड़ी मूर्खता थी। यह बात तब और भी अधिक विचारणीय हो जाती है जब विदेशी धर्म को या उसके मानने वाले लोगों को भारत का अपना भूभाग काट कर दिया जा रहा हो और उसी पैटर्न पर जम्मू कश्मीर को भी अलग देश बनने की खुली छूट दी जा रही हो। यदि देश में आज ईसाईकरण की प्रक्रिया को गति दी जा रही है तो उसका उद्देश्य भी यही है कि भारत विदेशी धर्मावलंबियों को भी कुछ समय बाद अलग भूभाग देने पर तैयार हो जाता है। पाकिस्तान का उदाहरण देकर यह काम धड़ल्ले से किया जा रहा है। यह भी एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि कांग्रेस ईसाईकरण की इस प्रक्रिया के प्रति भी असावधान बनी रही है। उसकी इस प्रकार की चुप्पी या असावधानी ने देश को तोड़ने की और ईसाई धर्म को ईसाई मिशनरियों द्वारा फैलाने की खुली छूट प्रदान की है।
मुस्लिम रियासत हैदराबाद के नवाब के प्रति सहानुभूति रखने वाले नेहरू के बारे में यह भी एक सुविख्यात तथ्य है कि वह हैदराबाद तथा जिन्ना की मूल रियासत को भारतवर्ष में शामिल करने के लिए सरदार बल्लभ भाई पटेल को आक्रमण करने से रोकते रहे। ऐसा करके क्या नेहरू सारे भारत को ही मुस्लिमों के हाथों में सौंप देना चाहते थे या उनके भीतर शत्रु के प्रति कठोरता का व्यवहार करने की हिम्मत नहीं थी?
सरदार वल्लभभाई पटेल जब सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार एवं पुनरुद्धार करा रहे थे तो नेहरु उसका विरोध क्यों कर रहे थे !क्या इसलिए कि वह नेहरू के पूर्वजों के द्वारा तोड़ा गया था और सरदार वल्लभ भाई पटेल के पूर्वजों सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार अथवा राजा भोज परमार के द्वारा पुनरुद्धार कराया गया था?
भारत के संविधान में जब भारत की सामासिक संस्कृति को वैश्विक संस्कृति के रूप में स्थापित करने का राष्ट्रीय कर्तव्य अंतर्निहित किया गया हो तब भारतीयता के प्रतीक सोमनाथ मंदिर के प्रति संविधान की शपथ लेकर प्रधानमंत्री बने नेहरू की ऐसी सोच निश्चय ही उनके चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार होने के पश्चात उसको जनता को समर्पित करने के लिए मना कर दिया था।
जैसा कि विदित है कि नेहरू मंदिर को जनता को समर्पित करने के अवसर पर स्वयं नहीं गए थे । इतना ही नहीं, उन्होंने इस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को भी जाने से रोका था। परंतु उन्होंने नेहरू के मना करने के उपरांत भी सोमनाथ मंदिर का लोकार्पण किया था।
डॉ राजेंद्र प्रसाद के इस ‘दुस्साहस’ को नेहरू पचा नहीं पाए थे और उन्होंने देश के इस महान राष्ट्रपति के साथ उपेक्षा और अपमान का व्यवहार करना आरंभ कर दिया था। अपनी ओछी मानसिकता का परिचय देते हुए नेहरू ने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को रिटायर हो जाने के पश्चात पटना के एक कमरे में असहाय जीवन जीने के लिए बाध्य कर दिया था।
नेहरू अपने विरोधियों के प्रति बहुत ही घृणा का व्यवहार करते थे। उन्होंने सरदार पटेल को भी उपेक्षित करने का हर संभव प्रयास किया था। जिस प्रकार पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की उपेक्षा की गई थी, वैसे ही सरदार वल्लभ भाई पटेल को भी उपेक्षित किया गया। सरदार वल्लभ भाई पटेल के अंतिम संस्कार में कोई भी केंद्रीय मंत्री नहीं गया था।
जिस सरदार बल्लभ भाई पटेल ने वर्ष 1947 में 562 रियासतों का एकीकरण किया हो, भारतवर्ष को अखंड राष्ट्र बना दिया हो, उसके लिए 562 वर्ग गज भूमि भी दिल्ली में यमुना के किनारे पर स्मारक के रूप में नहीं मिली। देश के इस महान सपूत के साथ इस प्रकार उपेक्षा का व्यवहार किया जाना निश्चय ही नेहरू की ओछी मानसिकता को प्रकट करता है।
1936 में जब सुभाष चंद्र बोस और पट्टाभि सीतारमैया कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे थे और उसमें सुभाष चंद्र बोस की जीत हो गई थी, गांधी ने पट्टाभिसीता रमैया की हार को अपनी हार बताया था । देश के क्रांतिकारियों के प्रति नेहरू गांधी का इसी प्रकार का व्यवहार रहा। गांधी को कभी भी ऐसा व्यक्ति पसंद नहीं आया जो उनकी बात को काटता हो। उन्होंने उसी व्यक्ति को पसंद किया जो उनके हर निर्णय को आंख मूंदकर अपना समर्थन देता था।
गांधी नेहरू की उपेक्षा पूर्ण नीतियों से दुखी होकर सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़कर काबुल के रास्ते देश से बाहर जाना पड़ा। यदि गांधी नेहरू नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ समन्वय स्थापित कर कांग्रेस को क्रांतिकारी मार्ग पर डाल देते तो निश्चय ही भविष्य की कई घटनाएं घटित ना होती।
इसके उपरांत भी अब यह बात एक तथ्य के रूप में स्थापित हो चुकी है कि सुभाष चंद्र बोस के कारण भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। क्योंकि उन्होंने जर्मन और जापान जैसे देशों के तत्कालीन प्रभावशाली नेताओं से मिलकर उनसे सहायता प्राप्त करके भारत पर सिंगापुर की तरफ से अंग्रेजों को परास्त करने के लिए आक्रमण कर दिया था।
उसी सुभाष चंद्र बोस को नेहरू गांधी ने युद्ध अपराधी मानकर माउंटबेटन को सौंपने का अनुबंध कर लिया था।
क्रमश:

देवेन्द्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत समाचार पत्र

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