भारत शक्ति का प्रस्फुटन और ओबामा

सुरेश हिन्दुस्थानी

दिल्ली के राजपथ पर इस बार का दृश्य पिछली बारों की तुलना में काफी बदला हुआ था। कहा जाए तो इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में सारे देश को एक शक्ति का आभास हुआ, एक अद्भुत और विराट शक्ति का दर्शन। जिसे महाशक्ति अमेरिका ने भी टकटकी लगाकर देखा। कुछ देर नहीं पूरे दो घण्टे तक देखा। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा हालांकि यह शक्ति नवीनता लिए नहीं थी, लेकिन भारत के बारे में जो धारणा सांसारिक वातावरण में बनी थी, यह शक्ति का प्रस्फुटन उसके धारणा के एक दम विपरीत ही थी। सारा विश्व आज भी भारत को शक्तिहीन ही मानकर चलता था। शांति का दूत मानकर ही चलता था। लेकिन भारत में जो सामथ्र्य है, उसका दर्शन किसी को भी नहीं था। हालांकि पाकिस्तान और चीन ने इस शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव किया है, इसलिए यह दोनों देश इस शक्ति से परिचित होंगे, ऐसा कहा जा सकता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा का सफलतम अध्याय यह माना जा सकता है कि बराक ओबामा ने भारत के साथ बड़ा भाई बनकर नहीं वरन दोस्ताना व्यवहार किया। इस यात्रा से भारत को प्रत्यक्ष रूप से भले ही उतनी उपलब्धि नहीं मिली हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से समस्त विश्व भारत की इस उपलब्धि पर हैरान भी है, तो कई देश परेशान भी हैं। सच कहा जाए तो आज भारत अमेरिका के बगल में खड़ा नजर आ रहा है। विश्व की महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के दूसरी बार भारत आगमन के चलते जहां सम्पूर्ण विश्व की निगााहें भारत के राजनीतिक कदमों पर टिक गईं हैं, वहीं स्वयं अमेरिका द्वारा भारत के साथ एक मित्र की भांति व्यवहार करने पर भारत की उम्मीदों के मार्ग खुलते हुए दिखाई देने लगे हैं। हालांकि अमेरिका इस बात को भली भांति जानता है कि भारत के पास विश्व को दिशा देने की क्षमता है, लेकिन इस क्षमता का उपयोग अब तक हमारे देश की सरकारें नहीं कर पाईं। वर्तमान में अमेरिका में जिस प्रकार के भारतवंशियों को महत्व के स्थान मिले हुए हैं, इस बात को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी जानते हैं। इसलिए भारत की शक्ति का प्रदर्शन तो जगजाहिर है। कहते हैं कि भारत की बौद्धिक प्रतिभाएं जिस दिन अमेरिका से भारत चली आएं उस दिन अमेरिका के समक्ष गंभीर संकट की स्थिति निर्मित हो जाएगी।

वर्तमान केन्द्र सरकार ने देश की जनता के समक्ष जो आशाएं जगाईं हैं, वे कपोल कल्पित नहीं कही जा सकती। क्योंकि पूर्व में भारत के लिए जिस राह की तलाश थी, उस राह को न तो ढूढने का प्रयास किया गया और न ही विश्व को इस बात का अहसास कराया गया कि हम भारत हैं। वही भारत जिसने विश्व को ज्ञान दिया, वही भारत जो कभी विश्व गुरू बनकर विश्व का नेतृत्व कर रहा था। इस स्वर्णिम अतीत को भुलाकर भारत को केवल उसी राह पर ले जाया गया, जो अंग्रेजों ने बनाई थी। यानि भारत को इंडिया मानकर ही सरकारों की भूमिकाएं निर्धारित की जाती थीं। वास्तव में इंडिया में स्वत्व का बोध नहीं है। विश्व के देश जो देश जिस भारत से ज्ञान प्राप्त करते थे, वह भारत कहीं खो गया था। आज भारत में एक बार फिर से स्वत्व का जागरण होता दिख रहा है। विश्व के अनेक देश आज के भारत को देखकर अभिभूत हैं, इतना ही नहीं विश्व के अनेक देश आज भारत से दोस्ती करने को व्याकुल दिखाई दे रहे हैं। बराक ओबामा के भारत आगमन से कई प्रकार के निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। खुद ओबामा ने कहा है कि भारत के गणतंत्र दिवस पर अतिथि बनकर मैं स्वयं को सम्मानित महसूस कर रहा हूं। भारत के पड़ौसी देश पाकिस्तान आतंक फैलाने की योजना बनाकर कई ऐसे प्रयास किए कि ओबामा का दौरा रद्द हो जाए, या फिर भारत के साथ पाकिस्तान का भी दौरा करें। लेकिन भारत दौरे से पूर्व बराक ओबामा ने पाकिस्तान को यह साफ संकेत कर दिया था कि पाकिस्तान, भारत में आतंक फैलाना बन्द करे, या फिर अंजाम भोगने को तैयार रहे।

ओबामा की इस धमकी का पाकिस्तान पर कितना असर हुआ होगा यह तो भविष्य में देखने को मिलेगा, लेकिन भारत की सीमा पर ओबामा की भारत यात्रा के दिनों में भी गोलाबारी की गई। जिससे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि पाकिस्तान आतंक फैलाने के मुद्दे पर अपनी नीतियों में कोई परिवर्तन लाने वाला नहीं है। इसके विपरीत महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति अपनी भारत यात्रा के दौरान कई जगह भारतीयता के रंग में दिखाई दिए, राजघाट पर जब महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद बराक ओबामा ने पीपल के पेड़ के प्रति जो सम्मान प्रदर्शित किया, वह भारतीयता का प्रभाव ही है, इसके पश्चात ओबामा ने भारतीय परंपरानुसार हाथ जोड़कर अभिवादन किया। इन दोनों भावों को देखकर यह कहा जा सकता है कि ओबामा के जीवन पर भारत के दर्शन की गहरी छाप है। इससे पूर्व जब पालम विमान तल ओबाम की स्वागत परंपरा चल रही थी, ओबामा ने भारत के प्रधानमंत्री को खींचकर गले लगा लिया। यह प्रसंग भी एक मायने में हाय हैलो से बढ़कर ही है। ओबामा के भारत आगमन और दोस्ताना व्यवहार से निश्चित ही भारत की धाक बढ़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तो वह कई बार तारीफ कर चुके हैं। इस सबसे यह बात तो तय है कि भारत के लिए फिर से उम्मीदों के मार्ग खुले हैं और भारत एक बार फिर महाशक्ति बनने की दिशा में अपने कदम बढ़ा रहा है।

ओबामा का आगमन जहां भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की धाक में कूटनीतिक सफलता वाला कदम है, वहीं भारत के दुश्मन देश चीन और पाकिस्तान की चिन्ता बढ़ाने वाला कदम भी है। इन दोनों देशों ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि अमेरिका भारत के साथ दोस्ताना व्यवहार करेगा। इससे विश्व जगत में यह भी संदेश प्रसारित हुआ है कि भारत आज एक ऐसी उभरती हुई शक्ति के रूप में अवतरित हो रहा है, जिसका मुकाबला करना आसान नहीं है। यह सत्य है कि अभी तक भारत की शक्ति बिखरी हुई दिखाई देती है, जिसमें सामूहिकता का अभाव साफ दिखता था, लेकिन मोदी ने इस बिखरी हुई शक्ति को सांघिकता प्रदान की है। अप्रवासी भारतीयों का दिल शत प्रतिशत भारत के लिए धड़कने लगा है। विश्व में स्थापित पदों पर कार्यरत भारतीयों के मन में यह भाव जाग्रत हुआ है कि वे भारत के भी हैं। इसे सीधे तौर पर कहा जाए तो यही कहना होगा कि विश्व का हर कोना आज भारत को उभारने में सहयोग करने के लिए खड़ा हो गया है। ऐसे में यह भी स्पष्ट है कि जब इस प्रकार का भाव पैदा हुआ तो तब भारत की प्रगति को कौन रोक सकता है। इस बात को भले ही किसी ने नहीं समझा हो, लेकिन अमेरिका इस सत्य को पूरी तरह जान चुका है कि भारत को अपने स्वत्व का ज्ञान हो चुका है और आने वाला समय भारत का है।

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