ओबामा यात्रा पर पाक-चीन खिसियाहट

ओबामा की भारत-यात्रा से पाकिस्तान और चीन बुरी तरह से खिसिया गए हैं। उन्हें लग रहा है कि अमेरिका और भारत के बीच कोई गुप्त समझौता हो गया है। दुनिया के ये दो सबसे बड़े लोकतंत्र सबसे तगड़े दोस्त बन गए हैं। ऐसी हालत में अब चीन एशिया की ‘धुरी’ नहीं रह गया है और पाकिस्तान अब अमेरिकी गठबंधन से बाहर हो गया है। दोनों राष्ट्रों ने भारत-अमेरिकी संयुक्त वक्तव्य पर ऐसी कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसका विश्लेषण करना जरुरी है।

 सबसे पहले चीन को लें। जब ओबामा भारत में थे, तब पाकिस्तान के असली शासक सेनापति शाहिल शरीफ चीन में थे। पता नहीं, ऐसा संयोगवश हुआ था, या यह जान-बूझकर किया गया था। सेनापति शरीफ के चीन-प्रवास के दौरान चीन-पाक की शाश्वत और सुदृढ़ मैत्री के तराने तो गाए ही गए लेकिन चीनी प्रवक्ता ने भारत-अमेरिकी संबंधों पर भी कटु टिप्पणी की। उसने इस बात की आलोचना की कि अपने संयुक्त-वक्तव्य में भारत और अमेरिका ने दक्षिण चीनी समुद्र में मुक्त परिवहन का मामला क्यों उठाया? पूर्व एशिया के इस क्षेत्रीय और स्थानीय मामले में भारत और अमेरिका को दखलंदाजी क्यों करनी चाहिए?

चीन ने कहा है कि इस इलाके के सभी राष्ट्र अपने मामले आपस में सुलझाना चाहते हैं। ‘एसियान’ संगठन के देशों और चीन के बीच परिवहन को लेकर कोई विवाद नहीं है। अमेरिका और भारत संपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र में कोई नई आपसी रणनीतिक समझ बनाना चाहते हैं, यह चीन के लिए चिंता का विषय है।

 चीन की यह चिंता मुझे निराधार लगती है। जो उक्त बात संयुक्त-वक्तव्य में कही गई है, वह भारत के पहले अमेरिका कई देशों के साथ दोहरा चुका है। इस घिसी-पिटी बात को चीन अनावश्यक तूल दे रहा है। चीन के साथ अमेरिका का व्यापार भारत के मुकाबले लगभग छह गुना है, अमेरिकी कारखानों में बेशुमार चीनी पूंजी खपी हुई है और चीनी मूल के लोगों की संख्या और महत्व अमेरिका में बहुत ज्यादा है। अमेरिका की हिम्मत नहीं है कि वह चीन को नाराज़ कर सके। हां, भारत को अपनी खटारा परमाणु भट्ठियां टिकाने के लिए वह कुछ-कुछ ठकुरसुहाती बातें कर रहा है।

 इसी तरह पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार (विदेश मंत्री) सरताज़ अजीज़ का यह बयान भी अतिरेक पर आधारित है कि अमेरिका सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भारत को दिलवा रहा है। संयुक्तराष्ट्र संघ अमेरिका की कोई ‘काउन्टी’ नहीं है कि वह किसी को भी उसकी सदस्यता दिलवा सकता है। जहां तक ‘परमाणु सप्लायर्स क्लब’ की सदस्यता का सवाल है, भारत उसके लिए पूर्ण योग्य है और उसे वह मिलना ज्यादा कठिन नहीं है। उसे लेकर पाकिस्तान जले, इसकी बजाय यह अच्छा हो कि वह अपने आपको भी उसके योग्य बनाए। चीन और पाकिस्तान दोनों को, ओबामा की इस भारत-यात्रा का असली अर्थ समझने की कोशिश करनी चाहिए।

 इसमें शक नहीं है कि भारत की शक्ति और प्रतिष्ठा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है लेकिन चीन और पाकिस्तान को अपना दुश्मन बनाकर या उनको नीचा दिखाकर भारत महाशक्ति नहीं बन सकता।

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