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इतिहास के पन्नों से

धारा ३७० के गुनहगार कौन..?


– प्रशांत पोळ

(3 वर्ष पहले कश्मीर से धारा ३७० हटाने पर यह लेख प्रकाशित हुआ था। )
आज के इस ऐतिहासिक दिवस पर डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अटल बिहारी बाजपेयी जी के स्वर्गस्थ आत्माओं को निश्चित रुप से शान्ति मिली होगी..!
डॉ. मुखर्जी, कश्मीर में, धारा ३७० के कारण बने, दो प्रधान – दो निशान – दो संविधान इस व्यवस्था के खिलाफ थे. इसके विरोध में सत्याग्रह करते हुए कश्मीर के कारागृह में ही दिनांक २३ जून, १९५३ को इनकी मृत्यु हुई थी. इस कश्मीर सत्याग्रह में अटल बिहारी बाजपेयी भी डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ थे. और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने इस धारा ३७० का पुरजोर विरोध किया था.
दिनांक २६ अक्टूबर, १९४७ को कश्मीर का भारत में विलय हुआ था. पूरे कश्मीर का, गिलगिट – बाल्टिस्तान के साथ, बिनाशर्त विलय. कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने गृह मंत्रालय के सचिव, वी. पी. मेनन के सामने विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किये थे. इस विलय पत्र में कोई मांग नहीं थी. कोई शर्त नहीं थी. तो फिर ये धारा ३७० आई कहाँ से..?
ये धारा ३७० लागू हुई, १७ नवंबर १९५२ से. अर्थात मूल संविधान में भी इसका समावेश नहीं था. २६ अक्टूबर १९४७ से तो १७ नवंबर १९५२ तक, अर्थात पांच वर्ष कश्मीर में किसी को, भारतीय गणराज्य को लेकर कोई समस्या नहीं थी. अपवाद था एक व्यक्ति – शेख अब्दुल्ला. उसे लग रहा था कश्मीर में स्वतंत्र रूप से राजनीति करने के लिए कुछ अलग से प्रावधान चाहिए. इसलिए जवाहर लाल नेहरु से बात करके, शेख अब्दुल्ला ने राज्य के विशेष प्रावधान की धारा डालने का आग्रह किया.
धारा ३७० की पूरी ड्राफ्टिंग शेख अब्दुल्ला ने जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर की थी. इसमें बड़ी भूमिका थी एन. गोपालस्वामी अय्यंगार की. ये अय्यंगार महाशय आय सी एस थे. सन १९३७ से १९४३ तक कश्मीर संस्थान के प्रधानमंत्री थे. स्वतंत्रता के बाद राज्यसभा में कांग्रेस के नेता और बिना किसी मंत्रालय के मंत्री थे. बाद में उन्हें रेल मंत्री बनाया गया.
नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को सलाह दी थी की धारा ३७० के प्रावधान को यदि संविधान में लाना हैं, तो गोपालस्वामी अय्यंगार योग्य व्यक्ति हैं, क्यूंकि वे संविधान निर्माण सभा के सदस्य हैं. बाद में, जब नेहरू कश्मीर के मुद्दे को राष्ट्रसंघ में ले गए, तो इन्ही अय्यंगार महोदय ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था, और मुंह की खायी थी.
चूँकि सरदार पटेल गृहमंत्री थे, तो उनकी मंजूरी भी इस धारा के लिए आवश्यक थी. इस सन्दर्भ में दिनांक २७ दिसंबर, १९४७ को नेहरू लिखते हैं –
“Gopalaswamy Ayyangar has been especially asked to help in Kashmir matters. Both for this reason and because of his intimate knowledge and experience of Kashmir, he had to be given full latitude. I really do not know where the States Ministry (Sardar Patel’s ministry) comes into the picture except that it should be kept informed for the steps taken. All this was done at my instance and I do not propose to abdicate my functions in regard to matters for which I consider myself responsible. May I s ..

इस पूरे कालखंड में व्ही. शंकर यह आई ए एस अफसर सरदार पटेल के निजी सचिव थे. उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम के सारे दस्तावेज सम्हल कर रखे हैं. इन दस्तावेजों के अनुसार कश्मीर से कोई भी मांग न उठते हुए भी, नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के साथ, सरदार पटेल को न बताते हुए, धारा ३७० का ड्राफ्ट फाइनल किया. गोपालस्वामी अय्यंगार को यह दायित्व दिया की इस धारा को संविधान सभा से पारित करवाना हैं.
जब इस विषय पर संविधान सभा में चर्चा का समय आया, तो उन दिनों नेहरू विदेश दौरे पर थे. न चाहते हुए भी, उन्होंने सरदार पटेल को फोन किया, और इस धारा को संविधान सभा में पारित करने का आग्रह किया. सरदार पटेल ने अनमने भाव से, लेकिन पूर्ण अनुशासन निभाते हुए यह विषय संविधान सभा में रखने का निर्णंय किया. लेकिन व्ही शंकर लिखते हैं, पटेल ने उनसे कहाँ – “जवाहरलाल रोएगा….!”
पहले इस ड्राफ्ट को कांग्रेस वर्किंग कमिटी में रखा गया. वहां इसका जबरदस्त विरोध हुआ. इस पर सरदार पटेल ने बीच बचाव करते हुए वर्किंग कमिटी से इसे पारित करने का आग्रह किया.
जब यह मामला गोपालस्वामी अय्यंगार ने संविधान सभा में उठाया, तो डॉ. बाबासाहब आंबेडकर बिथर गए. उनको, यह राष्ट्र तोड़ने वाली धारा कतई मंजूर नहीं थी. उन्होंने इसका डटकर विरोध किया. दुर्भाग्य से नेहरू का व्यक्तित्व उन दिनों ‘लार्जर देन लाइफ’ था. इसलिए नेहरू के आग्रह पर धारा ३७० को संविधान में जोड़ा गया. बाद में नेहरू के आग्रह पर १४ मई १९५४ को संविधान में धारा 35A को जोड़ा गया. इस सारे प्रकरण में डॉ. बाबासाहब अंबेडकर जबरदस्त नाराज थे. उन्होंने धारा ३७० को अस्थायी रखने की व्यवस्था की. लोकसभा में चर्चा समय में भी वे इस धारा पर कुछ नहीं बोले.
जवाहरलाल नेहरु, शेख अब्दुल्ला और गोपालस्वामी अय्यंगार इस तिकड़ी ने पिछले सत्तर वर्षों से कश्मीर को भारत से अलग रखने का जो ढांचा बनाकर रखा था, उसे आज मोदी – शहा – डोवाल की तिकड़ी ने ध्वस्त किया..! आज सही अर्थों में भारत एकजुट हुआ, एक हुआ..!
#Article370
#Article370Revoked
#KashmirIntegrated
#JammuAndKashmir

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