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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

देश पर बलिदान देने का अनूठा प्रसंग फांसी पर लटके वीर माता के तीनों पुत्र

अमृत महोत्सव लेखमाला
सशस्त्र क्रांति के स्वर्णिम पृष्ठ — भाग 5
(नरेन्द्र सहगल)

भारतीयों का कल्याण अंग्रेज शासकों का उद्देश्य कभी नहीं रहा। भारत को लूटकर अपने देश इंग्लैण्ड को समृद्ध बनाने कि लिए उन्होंने प्रत्येक प्रकार के अनैतिक, पाशविक एवं अमानवीय हथकंडे अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत के सनातन धर्म, गौरवशाली इतिहास, शिक्षा प्रणाली, सामाजिक व्यवस्था और स्वदेशी उद्योग धंधों को पूर्णतया नष्ट करने के लिए अंग्रेजों ने सैन्यबलों, चापलूसों, धनकुबेरों, रियासती राजाओं, देशद्रोही अफसरों और गद्दारों का भरपूर सहयोग लिया। आम जनता भूख से, बीमारी से या पुलिसिया कहर से भले ही मरती रहे, इससे उनका कोई वास्ता नहीं था।

सन् 1897 में महाराष्ट्र विशेषतया पूना महानगर में प्लेग का विनाशकारी रोग फैल गया। लोग मरने लगे। सरकार ने एक कठोर और निर्दयी प्रशासक रैण्ड को पूना का प्रशासक बना दिया। इस अंग्रेज ने आते ही निहत्थे एवं रोग-ग्रस्त लोगों को डरा धमकाकर ईसाइयत अपनाने के लिए बाध्य करना प्रारम्भ कर दिया। घरों की तलाशी लेने के बहाने लोगों की सम्पति जब्त करने, पूजा स्थलों में घुसकर देवताओं की मूर्तियों को तोड़ना और उन्हें उठा ले जाना और परिवार की महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करने जैसी अनैतिक हरकतों से पूना और इसके आसपास के इलाकों में दहशत फैल गई।

इसी समय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की रहनुमाई में गणेश उत्सव जैसी धार्मिक गतिविधियां चल रही थीं। ‘हिन्दू संरक्षण सभा’ नामक युवकों की एक संस्था इन गतिविधियों का संचालन कर रही थी। लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में एक लेख लिखा – ‘‘बीमारी तो एक बहाना है। वास्तव में सरकार लोगों की आत्मा को ही कुचलना चाहती है। रैण्ड अत्याचारी है वह अंग्रेज सरकार के कहने पर यह सब कर रहा है। परन्तु यह दमनचक्र सदा के लिए नहीं चल सकता। यह रैण्डशाही समाप्त होकर रहेगी।’’

इसी वर्ष 12 जून 1897 को पूना नगर में छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने भारत को स्वाधीन करवाने के संकल्प किए। शिवाजी द्वारा यवन राक्षस अफजल खाँ को मारने के कुकृत्य को महान बताया गया। युवकों को सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर चलने के लिए तैयार किया जाता था। इस तरह के राष्ट्रभक्तिपूर्ण कार्यक्रमों का मराठा युवकों पर असर होने लगा।

लोकमान्य तिलक के मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद से कुछ युवकों ने अत्याचारी रैण्ड को यमलोक भेजने की योजना बनाई। धन इत्यादि की व्यवस्था भी तिलक जी के सहयोग से हो गई। इन्हीं दिनों दामोदर हरि चाफेकर नामक एक नवयुवक एक क्लब बनाकर युवाओं को राष्ट्रभक्ति, समाज-सेवा और स्वतंत्रता का महत्व जैसे विषयों का पाठ पढ़ाने का कार्य करता था। गम्भीरतापूर्वक विचार विमर्श करने के पश्चात दामोदर चाफेकर को ही रैंण्ड की हत्या की जिम्मेवारी सौंपी गई।

पूना नगर में 22 जून को एक भव्य आयोजन करके महारानी विक्टोरिया का राज्याभिषेक दिवस धूम-धाम से मनाने का निश्चय सरकार ने किया। इसी दिन रैंण्ड को मृत्युलोक पहुंचाकर रैंण्डशाही को अलविदा कहने का निश्चय किया गया। दामोदर चाफेकर के छोटे भाई बालकृष्ण चाफेकर ने भी इस काम में बड़े भाई का पूरा साथ देने का निश्चय किया। दामोदर चाफेकर द्वारा अपने एक अभिन्न मित्र भिड़े को समारोह स्थल की रेकी करने का कठिन कार्य सौंपा गया। भिड़े ने यह कार्य कुशलतापूर्वक सम्पन्न किया।

महारानी विक्टोरिया का राज्याभिषेक उत्सव पूरे सरकारी जश्न के साथ मनाया गया। रात भर यह अंग्रेजी नाटक चलता रहा। दोनों चाफेकर भाई इस जश्न के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद रैण्ड अपनी सजी हुई गाड़ी पर सवार होकर अपने घर के लिए निकले। थोड़ी दूर जाने पर सड़क किनारे वृक्ष की ओट में छिपा हुआ दामोदर चाफेकर निकला और उसने कूदकर गाड़ी (बग्गी) में सवार रैण्ड पर दो-तीन पिस्तोल की गोलियां दाग दीं। काम करके दामोदर आराम से गायब हो गया। रैण्ड की बग्गी के पीछे एक ओर कुख्यात अंग्रेज अफसर भी अपनी गाड़ी से घर जा रहा था। एम्हर्स्ट नामक इस दैत्य को दामोदर के छोटे भाई बालकृष्ण ने गोली से उड़ा दिया। यह भाई भी अपने हिस्से का काम करके चुपचाप भागने में सफल हो गया। इन दोनों भाइयों को गिरफ्तार करने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। जब प्रशासन को जरा भी सफलता नहीं मिली तो दोनों भाइयों को पकड़वाने वाले को 20 हजार रुपया ईनाम देने का ऐलान कर दिया गया। अंग्रेज सरकार की यही तो प्रशासनिक नीति थी। देशभक्तों को फांसी का फंदा और देशद्रोहियों को पुरस्कार।

उन दिनों शिवाजी एवं गणेश के धार्मिक आयोजनों के माध्यम से युवकों को सशस्त्र क्रांति के लिए तैयार कर रहे लोकमान्य तिलक को सरकार ने रैण्ड तथा एम्हर्स्ट की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। तिलक के जेल में जाने से युवकों में पहले से जल रही क्रांति की आग और भी ज्यादा तेज हो गई। सर्वविदित है कि लोकमान्य की उपाधि से सम्मानित किए जाने वाले बाल गंगाधर तिलक सशस्त्र क्रांति के ना केवल समर्थक ही थे बल्कि वो युवकों को क्रांतिपथ पर चलने में प्रत्येक प्रकार की सहायता भी करते थे।

उधर 20 हजार के ईनाम के बदले अपने स्वत्व को बेचने वाले भी सक्रिय हो गए। उन्हीं गद्दारों में से एक गणेश शंकर द्रविड़ भी था। इसका भाई बालकृष्ण चाफेकर का मित्र था। यह दोनों रैण्ड की हत्या के सब राज जानते थे। इन्होंने स्थानीय पुलिस अफसर मि. ब्रुइन को सारी जानकारी देकर ईनाम की राशि प्राप्त कर ली। कितनी दयनीय स्थिति थी उस समय हमारे देश की। एक ओर देश के लिए अपने जीवन को कुर्बान करने वाले दो भाई और दूसरी ओर अंग्रेजभक्त दो गद्दार भाई।

दामोदर चाफेकर को पुलिस ने गिरफ्तार करके न्यायालय में पेश किया। इस क्रांतिकारी देशभक्त ने स्वाभिमानपूर्वक अपने पर लगे सभी आरोपों को निडर होकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसने न्यायालय में जोरदार ढंग से अपनी बात रखते हुए कहा कि बेकसूर भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचारों का बदला लेने के लिए और अत्याचारी रैण्ड को दंड देने के लिए उसकी हत्या की है। ताकि देशवासी इस हत्या से प्रेरणा लेकर क्रांति के पथ पर चलने के लिए तैयार रहें।

18 अप्रैल 1898 को दामोदर चाफेकर को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। लोकमान्य तिलक द्वारा भेजी गई गीता को हाथ में लेकर दामोदर स्वयं ही जेल में बनी कत्लगाह में चल दिया। गीता के श्लोकों को बोलते हुए यह वीर क्रांतिकारी स्वर्गलोक को गमन कर गया। इस तरह एक वीर माता का बड़ा पुत्र भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के सीने पर प्रहार करके शहीद हो गया।

इसी वीर माता का दूसरा सुपुत्र बालकृष्ण एम्हर्स्ट की हत्या करने के बाद हैदराबाद रियासत में भाग गया। भूखा प्यासा जंगलों की खाक छानता रहा। कुछ दिन बाद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस क्रांतिकारी देशभक्त की रहने एवं भोजन इत्यादि की व्यवस्था करवाई थी। बालकृष्ण चाफेकर इस व्यवस्था के तहत भूमिगत रहते हुए घुटन महसूस करने लगा। इस तंग जिंदगी से छुटकारा पाने के लिए वह चुपचाप महाराष्ट्र में आ गया। कुछ ही दिनों बाद महाराष्ट्र की पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। न्यायालय में नाटकीय कानूनी प्रक्रिया चलाई गई।

वीरमाता का 18 वर्षीय तीसरा सपूत वासुदेव चाफेकर भी भारतमाता की बेड़ियों को काटने के लिए शहादत प्राप्त करने के लिए तैयार हो गया। वह अपनी माँ के पास इस पवित्र कार्य की स्वीकृति लेने गया। कल्पना कीजिए उस वीरमाता की मनोस्थिति की जिसका एक बेटा वतन के लिए शहीद हो गया। दूसरा शहीद होने वाला है और तीसरा बेटा भी देश के लिए शहादत पाने के लिए माँ के आदेश की प्रतीक्षा में उसके सामने खड़ा है। वीर माता ने अपनी ममतामयी भावनाओं पर नियंत्रण करके बेटे का मत्था चूमा और आंखों में प्यार के आंसू भर कर उसे इस जोखिम भरे महान कार्य की स्वीकृति दे दी।

तीसरे भाई वासुदेव चाफेकर ने अपने दो मित्र साठे और रानाडे के साथ मिलकर उन दोनों द्रविड़ भाइयों को ठिकाने लगाने का निश्चय किया जिन्होंने दामोदर चाफेकर को पकड़वाकर इनाम की 20 हजार रुपये की राशि प्राप्त की थी। यह दोनों देशद्रोही भाई इनाम की भारी भरकम राशि से मस्तियां मार रहे थे। वासुदेव चाफेकर और उसके दोनों साथी इन गद्दारों की दिनचर्या पर पैनी नजर टिकाए हुए थे। 1896 के फरवरी मास के एक दिन दोनों द्रविड़ भाई मंदिर के पीछे वाले बगीचे में ताश खेल रहे थे। इनको मौत के घाट उतारने का यही अवसर उचित था। इन्हें यमलोक भेजने की प्रतीक्षा कर रहे वासुदेव चाफेकर ने भिखारी का वेश बनाया और दृविड़ भाइयों से कहा कि उन्हें पुलिस स्टेशन में बुलाया गया है। दोनों द्रविड़ भाई अभी मंदिर के मुख्य द्वार से बाहर निकले ही थे कि इनकी राह देख रहे साठे और वासुदेव ने इन्हें गोलियों से भून डाला।

यह हत्या इतनी चतुराई से की गई कि किसी को भी इन कथित हत्यारों के बारे में एक भी सुराग नहीं मिला। वासुदेव, रानाडे और साठे खुले में भागते घूमते फिरते रहे। उधर बालकृष्ण चाफेकर पर न्यायालय में क़त्ल का मुकदमा चल रहा था। सरकार को लाख प्रयास करने के बाद भी कोई साक्षी या गवाह ना मिला। एक सोची समझी चाल के तहत सरकार ने वासुदेव को बड़ी राशि का लालच देकर अपने भाई के खिलाफ गवाही देने का विफल प्रयास किया। परन्तु सरकार को क्या पता था कि यह तीनों भाई तो अपनी वीर माता का आशीर्वाद लेकर ही देश के लिए बलिदान होने के लिए घर से निकले हैं।

वासुदेव को गद्दारी की राह पर चलाने के लिए रोज पुलिस स्टेशन बुलाया जाता था। एक दिन एक पुलिस अफसर ने तीनों भाइयों के प्रति अपशब्दों से उनका अपमान किया। यहीं तक नहीं उस अफसर ने भारत को गुलामों का देश कहकर लोकमान्य तिलक जैसे प्रखर राष्ट्रवादी नेता को भी एक गंदी गाली दे दी। अपने गुरु तथा देश के अपमान को यह युवा क्रांतिकारी सह न सका। उसने तुरंत अपनी जेब से भरी हुई पिस्तोल निकाली और उस अफसर को वहीं गोलियों से भून डाला। वासुदेव को पुलिस ने जंजीरों में जकड़ लिया।

न्यायालय में इस 18 वर्षीय तरुण देशभक्त ने सीना तानकर अपने कथित अपराध को स्वीकार करते हुए, अपना बयान दर्ज करवाते हुए कहा – “मैंने देशद्रोही द्रविड़ भाइयों को अपने देशभक्त भाई के साथ किए गए जघन्य द्रोह की सजा देने के लिए मारा है। मैं अपने भाई के विरुद्ध गवाही देने का नीच काम नहीं कर सकता। मैं फांसी के तख्ते पर हँसते-हँसते अपना बलिदान दे दूंगा।”

क्रूर न्यायालय के आदेश से बालकृष्ण चाफेकर और वासुदेव चाफेकर को फांसी की सजा दी गई। बड़ा भाई दामोदर चाफेकर पहले ही फांसी के फंदे को चूम चुका था। इतिहास के पन्नों को हजार बार पलटने से भी देश पर बलिदान होने वाला ऐसा स्वर्णिम अध्याय नहीं मिल सकता। जंजीरों में जकड़ी हुई भारतमाता को स्वतंत्र करवाने के लिए एक वीरमाता ने अपने तीनों युवा पुत्रों को तिलक लगाकर फांसी के तख्ते की ओर भेजा।

तीनों चाफेकर बंधुओं के बलिदान ने देश की तरुणाई को झकझोर कर रख दिया। क्रांति शिरोमणि वीर सावरकर जैसे तरुणों ने बलिदान की इस अमर गाथा से प्रेरणा ली। देश के कोने-कोने में अंग्रेजों को धराशाही करने के गगनभेदी स्वर सुनाई देने लगे। सशस्त्र क्रांति की ज्वाला शतगुणित होकर भभकने लगी। इस क्रांति गाथा का एक और महत्वपूर्ण परिणाम यह भी हुआ कि देशभक्त क्रांतिकारियों को पुलिस के शिकंजे में डलवाने और न्यायालय में उनके विरुद्ध गवाही देने वाले नीच देशद्रोहियों को सजा-ए-मौत देने की परम्परा शुरु हो गई। ……….…….. जारी

नरेन्द्र सहगल
पूर्व संघ प्रचारक, लेखक – पत्रकार

बंधुओं मेरा आपसे सविनय निवेदन है कि इस लेखमाला को सोशल मीडिया के प्रत्येक साधन द्वारा आगे से आगे फॉरवर्ड करके आप भी फांसी के तख्तों को चूमने वाले देशभक्त क्रांतिकारियों को अपनी श्रद्धान्जलि देकर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाएं।
भूलें नहीं – चूकें नहीं।

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