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इतिहास के पन्नों से

जब सद्दाम हुसैन के व्यवहार को देखकर तमतमा गए थे प्रणब मुखर्जी

टीएसआर सुब्रमणियन
(पूर्व कैबिनेट सचिव, भारत सरकार)

सन 1980 में मैं तत्कालीन वाणिज्य मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बनकर बगदाद गया। मौका बाथ क्रांति की 12वीं जयंती पर मनाए जाने वाले उत्सव का था। मेरे अलावा प्रतिनिधिमंडल में कांत भार्गव थे, जो कि विदेश मंत्रालय से थे। यह इराक-ईरान युद्ध से कुछ पूर्व की बात है। उस समय तक सद्दाम की सत्ता पर पकड़ बन चुकी थी। प्रतिनिधिमंडल के सदस्य एक शाम दिल्ली से मुंबई के लिए हवाई जहाज से रवाना हुए, जहां से उन्हें इराकी विमान से बगदाद पहुंचना था। उड़ान के दौरान कांत भार्गव ने मंत्री महोदय को उस पत्र की प्रतिलिपि दिखाई, जो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सद्दाम हुसैन के लिए लिखा था। यह पत्र श्रीमती गांधी की ओर से सद्दाम हुसैन को दिया जाना था। पत्र कुछ इस प्रकार था, ‘प्रिय राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन, मैं सरकार और भारत की जनता की ओर से बाथ क्रांति की बारहवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आपको और इराक की जनता को बधाई देना चाहती हूं। हम आपको इस सुअवसर पर अपनी शुभकामनाएं भेज रहे हैं। भारत इराक के तेल का बहुत बड़ा आयातक है। नीचे दिया गया विवरण आपको हमारी वार्षिक आवश्यकताओं और आयात से अवगत करा देगा। कृपया उचित शर्तों पर हमें और अधिक तेल देने का कष्ट करें।’ प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर के बाद इस पत्र के नीचे की खाली जगह में एक छोटा-सा चार्ट था, जिसमें हमारी तेल की आवश्यकताओं का विवरण दिया गया था। जैसे ही मैंने यह पत्र पढ़ा, मैं पीड़ा-भाव से कराह उठा। प्रणब मुखर्जी ने जब मुझसे इसका कारण पूछा तो मैंने उनसे कहा कि इराकी राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की ओर से ऐसे असंगत ढंग से पत्र लिखा जाना शोभा नहीं देता।

बड़ा रूखा सा था वह पत्र
मेरे विचार में यह पत्र दोनों देशों के आपसी संबंधों की निकटता और गहराई की अभिव्यक्ति का एक दस्तावेज होना चाहिए था और इसमें सद्दाम हुसैन के लिए प्रशंसा से भरे शब्दों के साथ ‘प्रिय भाई’ जैसा कोई आत्मीय संबोधन होना चाहिए। पत्र के अंत में बस इतना उल्लेख करना काफी होता कि हमारा प्रतिनिधि तेल के संबंध में कुछ अनुरोध करेगा, उसमें आप हमारी सहायता करने की कृपा करें। मेरा यह दृष्टिकोण इंदिरा गांधी और सद्दाम हुसैन के गहरे और मैत्रीपूर्ण संबंधों पर आधारित था, किंतु पत्र में कोई बदलाव अब संभव नहीं था।
हम सुबह के तीन बजे बगदाद पहुंचे, हवाई अड्डे पर इराक के तेल मंत्री हमारे स्वागत के लिए आए। जब यह कहा गया कि प्रणब मुखर्जी स्वयं इंदिरा गांधी का एक पत्र सद्दाम हुसैन को देना चाहेंगे तो तेल मंत्री तुरंत इस मुलाकात का प्रबंध कराने को तैयार हो गए। प्रोटोकॉल के अनुसार उस पत्र की एक प्रतिलिपि इराकी अधिकारियों को भी दे दी गई। हमारी आशंका निर्मूल साबित नहीं हुई। बाद के उन तीनों दिन हम प्रणब मुखर्जी के लिए सद्दाम के बुलावे की आतुरता से प्रतीक्षा करते रहे। हम प्रातः से रात्रि तक टीवी पर सद्दाम हुसैन को स्कूली बच्चों, स्थानीय नागरिकों से मिलते हुए और असंख्य विदेशी प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत करते हुए देखते। प्रणब मुखर्जी की बेचैनी प्रतिक्षण बढ़ती जा रहा थी। ऐसे में वह लगभग हर घंटे भारत के राजदूत पीटर सिनॉय से पूछते, ‘क्या आपने इराकी अधिकारियों को याद दिला दिया है कि मैं सद्दाम से मिलने का इंतजार कर रहा हूं?’ पीटर विनम्रतापूर्वक उत्तर देते, ‘श्रीमन, मैं अपनी ओर से पूरा प्रयत्न कर रहा हूं। वे भलीभांति जानते हैं कि आप सद्दाम के बुलावे की प्रतीक्षा में बैठे हैं।’ एक बार प्रणब ने पीटर से यह तक कह दिया, ‘क्या आपने इराकी अधिकारियों को बता दिया है कि मैं इंदिरा गांधी के बाद भारत का दूसरा सबसे प्रमुख व्यक्ति हूं?’ पीटर ने कूटनीतिक शैली में जवाब दिया, ‘जी हां, उन्हें यह सब अच्छी तरह मालूम है।’ हमारे साथ एक दूसरा दल भी गया था। इराकी सरकार ने अनेक देशों से एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल और एक पार्टी प्रतिनिधिमंडल को निमंत्रित किया था। हमारे प्रतिनिधिमंडल के अतिरिक्त सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व जो शिष्ट-मंडल कर रहा था उसके सदस्य एसएस महापात्र और आरिफ मोहम्मद खान भी थे। महापात्र जो अब इस संसार में नहीं हैं, उस समय भारतीय कांग्रेस के ‘युवा मोर्चा’ के अध्यक्ष थे, जबकि आरिफ मोहम्मद खान उस समय कांग्रेस सांसद थे।
तीसरे दिन शाम छह बजे के आसपास हम टीवी स्क्रीन पर महापात्र और आरिफ मोहम्मद खां को देखकर चकित रह गए। वहां वे सद्दाम के निकट एक पंक्ति में खड़े थे और जब उनकी बारी आई तो उनका सद्दाम से परिचय कराया गया। सद्दाम ने महापात्र को जोश से गले लगाकर उनके साथ देर तक बातचीत की। यह देखकर प्रणब एकदम खड़े हो गए और हमसे टीवी तुरंत बंद कर देने को कहा। उन्होंने सिनॉय से बड़ी रुखाई के साथ कहा, ‘पहली फ्लाइट से हमारी भारत वापसी का इंतजाम करो।’ देर रात तक हम विमान में बैठे भारत वापस लौट रहे थे।
तौलिया लपेटे रहते महापात्र
इसी यात्रा के दौरान वहां जब हम लोग पहुंचे थे तो महापात्र ने मुझसे कहा कि उनका सामान दिल्ली से आते समय कहीं खो गया है। मैंने प्रतिनिधिमंडल की आकस्मिक निधि से दो सौ अमेरिकन डॉलर निकालकर उन्हें दिए ताकि वह कपड़े और दूसरे आवश्यक सामान खरीद सकें। महापात्र ने इस पैसे से कपड़े खरीदने के बजाय कुछ इलेक्ट्रॉनिक सामान और मनोरंजन की विदेशी वस्तुएं खरीद लीं।
उनका सामान अगले तीन दिनों तक नहीं आया और वह पूरी यात्रा के दौरान अपना वही खुरदुरा ऊनी, बंद गले का, खादी सूट पहने रहे। बड़ी-बड़ी अजीब धारियों वाला उनका यह सूट बड़े भड़कीले रंग का था। इससे भी ज्यादा मजे की बात यह थी कि उनकी पैंट की धारियां उनके जैकेट की धारियों से तनिक भी मेल नहीं खा रही थीं, इसलिए बहुत ही अजीब लग रही थीं। महापात्र रोज शाम ढले मेरे होटल के कमरे में ड्रिंक के लिए आ जाते। उस समय वे एक तौलिया लपेटे होते, क्योंकि उनका इकलौता सूट हवा में सूख रहा होता।
(स्वर्गीय सुब्रमणियन की पुस्तक ‘बाबूराज और नेतांचल’ प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन से साभार)

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